आम जन का मीडिया
The voices of Dalit Muslims buried in the noise of Patel?

क्या पटेलों के शोर में दब गई है ,गुजराती दलित मुस्लिमों की आवाज ?

– सुरेश मेघवंशी करजालिया
जैसे जैसे गुजरात विधानसभा चुनाव की मतदान तारीख निकट आ रही है .वैसे-वैसे गुजरात का सियासी पारा भी चढ़ता जा रहा है .चुनाव भले ही गुजरात राज्य में हो रहे हैं लेकिन दिल्ली के सियासी पंडित गुजरात मे नजरें गड़ाए हुए हैं .भाजपा एवं कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दल गांधीनगर की कुर्सी हथियाने की जोर आजमाइश कर रहे हैं .इस राज्य में भाजपा 22 वर्षों से सत्ता का सुख भोग रही है ,वही कांग्रेस 22 वर्षों के वनवास को खत्म करने की आस में लगातार दिन रात एक कर रही हैं .
जब 2015 में 22 साल के युवा हार्दिक पटेल के नेतृत्व में  पटेल आरक्षण आंदोलन का आगाज हुआ ,तब से भाजपा की मुश्किलें लगातार बढ़ती गई .पटेल आरक्षण आंदोलन के बाद पंचायत के चुनाव में जहां-जहां पटेल मतदाताओं की संख्या अधिक है उन इलाकों में भाजपा को काफी नुकसान पहुंचा .दावा किया जाता है कि पूरे देश में पटेल समुदाय की आबादी 27 करोड़ से अधिक हैं ,यह गुजरात ,मध्य प्रदेश ,राजस्थान सहित अन्य राज्य में निवास करते हैं, गुजरात में पटेल समुदाय  की करीब 17% आबादी निवास करती हैं .
पाटीदार अनामत आरक्षण समिति के मुखिया हार्दिक पटेल ने भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोला है, तब से ही भाजपा एवं कांग्रेस दोनों ही मुख्य राजनीतिक दल पटेल समुदाय को अपनी ओर खींचने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं .वैसे तो पटेल समुदाय परंपरागत रूप से भाजपा का वोट बैंक माना जाता  रहा .लेकिन पटेल मतदाताओं की नाराजगी के चलते कांग्रेस के नेता अपने परंपरागत दलित एवं मुस्लिम समुदाय के मतदाताओं के प्रति  ज्यादा गंभीर नहीं दिखाई दे रहे हैं  .
गुजरात की 6 करोड़ से अधिक आबादी में  56% ओबीसी समुदाय, 7% दलित समुदाय ,10% मुस्लिम समुदाय  तथा 14% एसटी वर्ग सहित अन्य समुदाय भी यहां निवास करते हैं .इतने बड़े परंपरागत वोट बैंक होने के बावजूद भी भाजपा एवं कांग्रेस लगातार दलित एवं अल्पसंख्यक समुदाय  के प्रति ज्यादा गंभीर नहीं होकर दोनों ही राजनीतिक पार्टियां सिर्फ पटेल समुदाय को ही साधने में लगी हुई है .
उना कांड में दलित समाज के युवाओं की पिटाई के बाद  उपजे दलित आंदोलन की कमान युवा दलित नेता  जिग्नेश मेवानी के नेतृत्व में पूरे गुजरात में दलित आंदोलन चलाया जा रहा है .इस घटना के वक्त तो कांग्रेसी नेताओं ने दलित समाज के साथ पूरे गंभीरता से दलित आंदोलन में भागीदारी निभाई ,लेकिन अभी दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने सार्वजनिक रूप से कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण नहीं की. वह कांग्रेस का आधिकारिक रूप से प्रचार भी नहीं कर रहे हैं ! केवल दलित समाज के मुद्दों पर ही ज्यादा फोकस डाल रहे लेकिन भाजपा को सता से बेदखल करने की कोशिश जरुर कर रहे हैं !
यही दूसरा हाल मुस्लिम समाज का भी हो रहा है, 10% की आबादी के बावजूद भी अहमद पटेल के अलावा किसी भी मुस्लिम नेता को राहुल गांधी की रैलियों में नहीं देखा गया.शायद कांग्रेसी नेता राहुल गांधी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हिंदुत्व के एजेंडे  पर चलने को मजबूर हो रहे हैं .क्योंकि पूरे चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेसी नेता राहुल गांधी लगातार मंदिरों में जाकर आरती, भजन -कीर्तन में भाग लेकर अपनी हिंदू समर्थक छवि बनाने की ओर से अग्रसर हो रहे हैं .चुनाव के नतीजे जो भी रहें ,मगर एक बात स्पष्ट रूप से इस चुनाव में उभर आई है कि गुजराती पटेलो के स्वर में दलित एवं मुस्लिम समाज की आवाज जरूर दब गई !

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