इंसाफ की देरी बन रही अन्याय की वजह…!

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(भोपाल, 23 जून)

 

प्रदेश से लेकर देशभर की जेलों में अपने फैसलों के इंतज़ार में घुट रहे हज़ारों लोगों के मानवाधिकार के लिए आवाज़ें तेज होने लगी हैं। नेशनल कांफेडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन(एनसीएचआरओ) ने इसका बीड़ा उठाया है। एनसीएचआरओ ने आज भोपाल में इस मामले में एक सेमिनार का आयोजन किया। सेमीनार की संयोजक खुशबू चौरसिया ने बताया कि गांधी भवन में हुए इस सेमिनार का विषय ‘देरी से मिला न्याय,अन्याय है’ था। जिसमे वक्ताओं ने विचाराधीन कैदियों के सवाल को उठाया।

सेमीनार में  बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता एल.एस. हरदेनिया ने कहा कि आज देश में जिस तरीके से न्याय प्रणाली में सुधार की जरूरत है वह सुधार नहीं किया जा रहा है ऐसा नहीं होने की वजह से विचाराधीन कैदियों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है उन्होंने कहा कि जेलों पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ और कर्मचारियों की कमी के चलते भारतीय जेलें राजनीतिक रसूख वाले अपराधियों के लिए एक आरामगाह और सामाजिक-आर्थिक तौर पर कमज़ोर विचाराधीन कैदियों के लिए नरक हैं। उन्होंने सभी सामाजिक और राजनीतिक संगठनों से एकजुट होकर विचाराधीन कैदियों के मामले में नई नीति बनाने के लिए पुरजोर आवाज उठाने की अपील की है ।

सेमीनार में बोलते हुए संगठन की राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य एड्वोकेट अन्सार इन्दौरी ने कहा  कि देश के अलग-अलग शहरों की जेलों में बड़ी तादाद में ऐसे लोग भी बन्द हैं, जो बेकुसूर हैं लेकिन लम्बी चलने वाली कानूनी प्रक्रिया से जहां सरकारी खजानों पर असर पड़ रहा है, वहीं इससे इंसाफ की कवायद भी कमजोर होती दिखाई दे रही है।

उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसे  क़दम उठाने चाहिए जिनसे न्याय की बुनियाद कायम रह सके, इन्साफ से लोगों का भरोसा न उठे, बेकुसूर बिना वजह जेल में न सडें और दोषियों तथा गुनाहगारों को जल्दी से जल्दी सजा मिल सके।  उन्होंने कहा कि भारत की जेलें तीन ढांचागत समस्याओं से जूझ रही हैं: एक, जेलों में क्षमता से ज़्यादा कैदी, जिसका श्रेय जेल की आबादी में अंडरट्रायल्स (विचाराधीन कैदियों) के बड़े प्रतिशत को जाता है; दो, कर्मचारियों का टोटा; तीन, फंड की कमी. इसका अनिवार्य तौर पर नतीजा लगभग अमानवीय जीवन स्थितियों, गंदगी और कैदियों और जेल अधिकारियों के बीच हिंसक झड़पों के तौर पर निकला है।

 कार्यक्रम में बोलते हुए सामाजिक कार्यकर्ता और पीयूसीएल की सदस्य माधुरी बेन ने कहा कि अगर भारतीय संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों की बात करें, तो विचाराधीन कैदियों को उनके दोषी सिद्ध होने से पहले तक निर्दोष माना जाता है।लेकिन जेल में बंद किए जाने के दौरान उन्हें अक्सर मानसिक और शारीरिक प्रताड़नाएं दी जाती हैं और लगभग अमानवीय-सी जीवन स्थितियों और जेल में होने वाली हिंसा का सामना करना पड़ता है।

 सेमिनार को संबोधित करते हुए किसान संघर्ष समिति की प्रदेश उपाध्यक्ष एडवोकेट आराधना भार्गव ने कहा कि विचाराधीन कैदियों की क़ानूनी प्रतिनिधियों तक पहुंच काफी कम होती है। कई विचाराधीन कैदी काफी गरीब हैं, जो मामूली अपराधों के आरोपी हैं। अपने अधिकारों की जानकारी न होने और क़ानूनी सहायता तक पहुंच नहीं होने के कारण उन्हें लंबे समय तक जेलों में बंद रहना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार बंदियों के अधिकारों का हनन कर रही है। सरकार यह मानने के लिए तैयार नहीं है की जेल में कैद बंदी भी इंसान है उनके नागरिक अधिकार, संवैधानिक अधिकार, और मानव अधिकारों का हनन किया जा रहा है।

कार्यक्रम में बोलते हुए कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माले) के प्रदेश सचिव विजय कुमार ने कहा कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के प्रिजन स्टैटिस्टिक्स इंडिया, 2015 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की कई जेलें, कैदियों की संख्या के लिहाज से छोटी पड़ रही हैं।भारतीय जेलों में क्षमता से 14 फीसदी ज़्यादा कैदी रह रहे हैं।इस मामले में छत्तीसगढ़ और दिल्ली देश में सबसे आगे हैं, जहां की जेलों में क्षमता से दोगेुने से ज़्यादा कैदी हैं। उन्होंने कहा कि देश की अदालतों में न्याय तो होता है लेकिन देरी से।ये देरी से मिलने वाला न्याय एक अन्याय है।एक इंसान को सालों तक जेल में रखा जाता है और जब  फैसला होता है तो उसे बरी कर दिया जाता है।ये एक बड़ा अन्याय है जो आज देश भर में बंद विचाराधीन कैदियों के साथ हो रहा है।

खुशबु चौरसिया ने बताया कि कार्यक्रम में अंतर्राष्ट्रीय अत्याचार दिवस के पोस्टर का भी विमोचन किया गया।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्रदेश के विभिन्न जिलों से लोगो ने भाग लिया। सेमीनार के अंत में सभी आये हुए अतिथितियों का अब्दुल सईद ने धन्यवाद किया ।

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