जाति का अभिमान बड़ा हास्यास्पद होता है !

- विष्णु नागर

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जाति का अभिमान बड़ा हास्यास्पद ही नहीं,उग्र और हिंसक तक होता है, यह हम कई जगह, कई प्रसंगों में देखते हैं।हाल ही में एक फिल्म को लेकर मचे फालतू के बवाल से भी यह अच्छी तरह जाहिर हुआ था,हालांकि जिन्होंने उस फिल्म को देखा, उनमें से ज्यादातर की राय थी कि वह फिल्म फालतू थी।बहरहाल जिस राजस्थान से यह बवाल शुरू हुआ था और बहुत बड़ा मुद्दा बनाया गया था,वहां की एक भयानक बानगी और…..

फिल्म के विरोध में तो राजनीति थी,इसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ दिमाग में भरा जाति गौरव का भूसा,कचरा,गंदगी थी। पर अब अलवर जिले की एक छोटी जगह शाहजहांपुर में दो बच्चों की माँ 33 साल की ऊषा देवी को उसके पति के चाचा ने इसलिए मार डाला कि राजपूत खानदान की होते हुए वह घर चलाने के लिए एक प्लास्टिक फैक्टरी में मजदूरी करती थी,जिससे उसे सात हजार रुपये महीने मिलते थे।पति और उसकी कमाई से घर चलता था। ऊषा देवी खुद निरक्षर थी मगर मजदूरी करके अपने बच्चों को पढ़ालिखाकर लायक बनाना चाहती थी।वह सुबह पाँच बजे उठती थी। घर का सारा कामकाज बेहद साफसफाई से करके सुबह आठ बजे फैक्टरी जाती थी। शाम को छह बजे लौटती थी। फिर घर के काम-खानापीना समेत सब निबटाती थी।

उस मजदूरन का कसूर यह था कि वह जाति से राजपूत थी।उस औरत के कमाने से पति को कोई दिक्कत नहीं थी मगर चाचा -ससुर को कठिनाई थी,जो खुद गरीब है और मेहनत- मजदूरी करके संतान और पत्नी विहीन यह चाचा अपना गुजारा जैसे तैसे करता था मगर राजपूत गौरव से भरपूर था।मर्द राजपूत होकर मजदूरी करे,इसमें उसे दिक्कत नहीं थी, इससे उसकी जाति का गौरव आहत नहीं होता था (होना भी क्यों चाहिए?) मगर औरत करे तो उसे दिक्कत थी। उसने दिनदहाड़े राजमार्ग के पास हत्या की,उस मजदूरनी को बचाने कोई नहीं आया.

ऊषा को मारने वाले उस चाचा को इसका कोई अपराध बोध भी नहीं है,क्योंकि उसने हत्या करके भी जाति का कथित गौरव बचाया! सांप्रदायिक हत्यारों में भी इसी हत्यारे गौरव का कचरा भरा होता है,जबकि उनमें से ज्यादातर कुछ पढ़े लिखे और कुछ तो कुछ ज्यादा ही ‘पढ़े लिखे’ होते हैं और ऊँचे- ऊँचे पदों पर बैठे हुए भी! हर जाति और हर धर्म के इस झूठे जातीय गौरव ने आज तक न जाने कितने लाख,करोड़ इंसानों को कुचला और मारा है,जिसमें बड़ी तादाद में औरतें ,मजदूर औरतें भी शामिल हैं।

( लेखक जाने माने साहित्यकार है )

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