मिशन सबको जोड़ने का था ,खुद ही बिखर गये !

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कोई दस साल पहले हम सभी सिर्फ अंबेडकरवादी थे , बुद्ध ,कबीर ,फुले के विचार घर घर फैलाना ही हमारा मकसद था ताकि देश समाज खुशहाल हो।

न किसी संगठन के नेता की अंधभक्ति थी और न किसी पद का मोह। न कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा थी और न किसी नेता की चाटुकारिता। 

बस, एक ही जुनून था कि अलग अलग जातियों व मान्यताओं के लोगों को जोड़कर बाबासाहेब की विचारधारा के बोधिवृक्ष के नीचे लाना। सभी में यही जज्बा था कि बुद्ध कबीर की करूणा व प्रेम की वाणी की घर घर अलख जगाएंगे।

लेकिन आज हम जिस चौराहे पर खड़े है वहां से कोई दिशा दिखाई नहीं दे रही है क्योंकि अब सभी बिखरे पड़े हैं ,आपस में ही लड़ रहे हैं, कोई राजनीति के नाम पर तो कोई किसी संगठन के वर्चस्व पर। 

अंबेडकर को तो हमने हाशिये पर पटक कर नए नेता गढ लिए है ,सुबह से शाम उसी की आरती उतारते है। अंधभक्ति का आलम यह है कि उनकी समालोचना में एक शब्द भी सुनना नहीं चाहते।

सामाजिक, राजनीतिक व धाम्मिक संगठनों के ऐसे नेता भी अपने अपने किले मजबूत कर रहे हैं। ऐसे संकीर्ण दड़बों में बंद अंबेडकरवादी अब अपने आका के वादी बन गये हैं। अंबेडकर विचारधारा व उसका प्रचार तो भूल ही गये हैं। बुद्ध कबीर की बातें तो बिल्कुल भी नहीं करते।

सामाजिक ,राजनीतिक व धार्मिक क्षेत्र में कल तक जो एक एक संगठन थे, टूट टूट कर इतने अधिक हो गये हैं कि लोगों को नाम तक याद नहीं और सभी के आकाओं ने स्वयं को अंबेडकर की जगह खुद को स्थापित कर लिया है, कुछ तो खुद को अंबेडकर से भी महान साबित करने की होड़ लगा रहे हैं।

दुखदायी हालात यह है कि इनके अंधभक्त शिष्यों की जमात शहर से लेकर गांव तक आपस में बुरी तरह से लड़ रही हैं। वैचारिक लड़ाई शोषक मनुवादी व्यवस्था से थी ,लेकिन अब हमारे लोग ही आपस में उलझ रहे हैं।

एकता, संघर्ष, मिशन सब कराह रहा हैं। हमारा आपसी संघर्ष अब विरोधियों को भी साफ दिखाई दे रहा है और वह बहुत प्रसन्न भी है क्योंकि वह तो यही चाहते है कि अंबेडकर विचारधारा के लोग आपस में ही लड़ते रहे।

विडम्बना यह है कि दलित शोषित समाज में इस बिखराव व आपसी संघर्ष की इन संगठनों के आकाओं को कोई चिंता नहीं है, उल्टा आग में घी डालते रहते हैं और भोले भक्त जयकारे लगा रहे हैं। 

घर घर अंबेडकर की जगह अब दलित समाज को तोड़ने वाले सामाजिक ,राजनीतिक दलित संगठन व उनके आका पहुंच गये हैं। नाम और वर्चस्व की लड़ाई ने दलित समाज को काफी पीछे धकेल दिया है।

दूसरों को जोड़ने चले थे हम लोग… अब क्या खाक जोड़ेगे … खुद ही टूट- टूट कर बिखर रहे हैं ?

जरा सोचिए क्या बाबा साहब के संगठित बनों के नारे का यही अर्थ निकाला हमने ? ऐसे होगा समुदाय संगठित ? ऐसे बनाएंगे हम जातियों को जमात ?

सोचिये और इसका समाधान खोजिए,नेताओं ,रहनुमाओं और रहबरों के भरोसे नहीं खुद के भरोसे और बुद्ध, कबीर,फुले, अम्बेडकर के विचारों के आलोक में एक बार फिर से ‘शिक्षा ,संगठन व संघर्ष’ को आदर्श बना कर मिशन के इस कारवां को आगे ले जाने का संकल्प कीजिये।

 डॉ एम एल परिहार

(बहुजन चिंतक,लेखक एवम प्रकाशक )

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