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The Kabirpanthi saint gave freedom from forced labor practice Dalits!

इस कबीरपंथी संत ने दलितों को बेगार प्रथा से मुक्ति दिलाई थी !

मेघवंश सूत्रकार समाज को विकास की दिशा दिखाने वाले, शिक्षा की ज्योत जलाने वाले, सामाजिक कुरीतियों को दूर भगाने वाले महान संत आचार्य गरीब साहेब की 47 वीं पुण्यतिथि (निर्वाण  2 अक्टूबर, 1970 शुक्रवार) है .आज उन्हें स्मरण करना समीचीन होगा .
आचार्य गरीब साहेब का जन्म 9 मार्च 1913 को जयपुर जिले के भोजपुर कलां में नारायण जी गोत्र बाणीया के यहाँ हुआ था। वाराणसी  से संस्कृत आचार्य की उपाधि प्राप्त की। आप कबीर साहेब के ग्रंथ बीजक का सफलतापूर्वक पाठ करने से बीजकपाठी कहलाये। आपने जिंदाबोध , मानव धर्म दर्शन, मेरा योग शास्त्र, सद्गुरु भक्ति विहार  आदि पुस्तकों की रचना की। आपके गुरू संत रतन साहेब कबीर पंथी गद्दी बुरहानपुर मध्यप्रदेश थे।
आचार्य गरीब साहेब समाज के लोगों के साथ कहीं भी कोई अशोभनीय घटना होती तो सदैव अग्रणी रह कर संघर्ष कर न्याय दिलाया। कभी आसन, गद्दी, गाड़ी घोड़े, भेंट पूजा, भंडारे का मोह नहीं रखा। 9 अप्रैल 1946 को अलबर्ट हाल रामनिवास बाग जयपुर में सवाई मानसिंह जी  के सम्मान में आयोजित समारोह में समाज द्वारा किये गये सत्कार से प्रसन्न होकर सवाई मानसिंह जी ने उन्हें एक लाख रूपये दिये, जिसे तुरंत ही  उन्होंने समाज को सौंप दिये।
आचार्य गरीब साहब ने साथ ही राज आज्ञा  भी जारी करवाई कि आज के बाद बलाई ,मेघवंशी, सूत्रकार, बुनकर, भांबी समाज के लोगों से बेगारी नहीं करवाई  जायेगी। समाज के लोगों के साथ सम्मान का व्यवहार किया जायेगा। यह बेगारी प्रथा का अंत करने की क्रांतिकारी शुरुआत थी .
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व राजस्थान के अधिकांश हिस्सों में उपरोक्त दलित समुदाय को सिर्फ खाने के बदले पीढ़ी दर पीढ़ी हाली रखा जाता था ,यह बेगार प्रथा कई सदियों से जारी थी ,लाखों परिवार कई शताब्दियों से इस कलंकित प्रथा से पीड़ित थे ,यह पश्चिम की दास प्रथा से भी बदतर व्यवस्था थी ,जिससे मुक्त करवाने का श्रेय तर्कवादी एवं कबीरपंथी संत आचार्य गरीब साहब को जाता है .
आचार्य गरीब साहेब मृत्यु भोज/ नुकता प्रथा के सख्त विरोधी थे। पंच पटेलों को वे कहा करते थे कि *’थाने लाडू भावे रे शरम कोनी आवे रे’*
उनका जीवन भौतिक आडंबर से कोसों दूर था। आज ढूँढे नहीं मिलते ऐसे साधु संत। आचार्य गरीब साहेब को अपने समय के और अपने  समाज के डाॅ अम्बेडकर कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
– डाॅ गुलाब चन्द जिन्दल ‘मेघ’
अजमेर

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