रासुका और मुठभेड़ों के नाम पर दलितों,पिछड़ों,अल्पसंख्कों को निशाना बना रही सरकार

बाटला हाउस में मारे गए साजिद-आतिफ के गाँव होते हुए यूपी यात्रा पहुंची भारत बंद के नाम पर उत्पीड़ित किए गए दलितों के गाँव

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आज़मगढ़-3 सितम्बर ( राजीव यादव ) यूपी यात्रा ने कस्बा सरायमीर में प्रेस वार्ता को सम्बोधित किया। पूर्व आईपीएस अधिकारी एस आर दारापुरी ने कहा कि संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर संवाद आज की ज़रूरत है। जिस तरह से आज की सत्ता में सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों, पत्रकारों को देशद्रोह जैसे गम्भीर आरोप लगाकर गिरफ्तार किया जा रहा है और सैकड़ो ऐसे लोगों के घरों पर छापेमारी की जा रही है उससे भय का माहौल बना है जो असंवैधानिक और लोकतंत्र को कमजोर करने वाला है। उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्यवहियों से सरकार विरोध के स्वर का दमन करना चाहती है। इसी तरह का माहौल उत्तर प्रदेश में भी बनाने का प्रयास किया जा रहा है। पूर्व आईजी ने कहा कि आज़मगढ़ में पिछले कुछ समय से गरीब अल्पसंख्यकों पर रासुका के तहत कार्रवाई,फर्जी इनकाउंटरों और भारत बंद के बाद दलित उत्पीड़न की घटनाएं बताती हैं कि पूर्वांचल में आज़मगढ़ अल्पसंख्यकों, दलितों और वंचितों के केंद्र बनता जा रहा है। आज इस बात की ज़रूरत है की ये उत्पीडित समाज एक हो और अपने इन्साफ की लड़ाई मिल कर लड़ें.

यात्रा के संयोजकों गुफरान सिद्दीकी और राजीव यादव ने कहा कि उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाइयों में तेजी से बढ़ौतरी हुई है लेकिन केवल दलितों और मुसलमानों पर ही रासुका लगाया गया है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या केवल मुसलमान और दलित से ही राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है? बाराबंकी और बहराइच के बाद आज़मगढ़ में सबसे अधिक मुस्लिमों को रासुका के तहत निरुद्ध किया गया है। इन रासुका पीड़ितों में अधिकांश गरीब वर्ग के लोग शामिल हैं। बहराइच में गरीब दिहाड़ी मजदूरों और रिक्शा चालकों पर रासुका लगाया गया है बाराबंकी में पंचर बना कर अजीविका अर्जित करने वाले पर वहीं आज़मगढ़ में रासुका के तहत निरुद्ध रकीब गुमटी में बाल काटने का काम करता था और आसिफ कपड़ें की सिलाई का काम करता था। रासुका पीड़ितों में किसी का भी पहले से कोई अपराधिक रिकार्ड नहीं रहा है। दोनों संयोजकों ने कहा कि प्रदेश को अपराध मुक्त बनाने के नाम पर जो इनकाउंटर अभियान चलाया गया है उससे गम्भीर सवाल खड़े होते हैं। ज्यादा तर मामलों में इनकाउंटरों में मारे और घायलों के परिजनों ने पुलिस पर पहले से पकड़ कर हत्या करने का आरोप लगाया है। आज़मगढ़ में हुए इनकाउंटरों में छह लोग मारे गए हैं। इनमें से कुछ मामलों की जांच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग कर रहा है तो पीयूसीएल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में भी मामले विचाराधीन हैं। प्रेस वार्ता को शकील कुरैशी, जुलेखा जबीं, रवीश आलम, शहरुख आदि ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर गुलाम अम्बिया, सालिम दाऊदी, तारिक शफीक़, शाह आलम शेरवानी आदि उपस्थित थे।

प्रेस वार्ता के बाद क़ाफिला दाऊदपुर पहुंचा जहां ग्रामवासियों और क्षेत्र के विशिष्ट लोगों ने यात्रा में शामिल लोगों को शॉल भेंट कर सम्मानित किया। ग्राम प्रधान बदरुद्दीन और हफिज़ शमशुद्दीन  ने ग्रामवासियों के साथ मिलकर इस सम्मान समारोह का आयोजन किया था। वहां इकट्ठा ग्रामवासियों के साथ देश–प्रदेश के वर्तमान हालात पर चर्चा हुई। आपसी भाईचारा और सदभाव के महत्व को उजागर करते हुए स्वंय ग्रामवासियों ने तीन साल पहले पड़ोस के गांव खोदादादपुर में साम्प्रदायिक हिंसा कारित कराने के प्रयास को इसी भाईचारे ने किस तरह विफल कर दिया था। पूर्व आईजी एसआर दारापुरी, सामाजिक नेत्री ज़ुलेखा जबी़ ने अत्याचार के खिलाफ लोगों को एकजुट होने का आह्वान किया और कहा उत्पीड़ित समाज को जाति–धर्म से ऊपर उठकर एक साथ आना चाहिए।

इसके तुरन्त बाद यात्रा संजरपुर पहुंची जहां गांव के लोगों ने माला पहना कर यात्रीगण का स्वागत किया। जनता और यात्रा में शामिल लोगों साथ बातचीत शुरू होने से पहले खोदादापुर साम्प्रदायिक घटना के दौरान जिन लोगों ने दंगा होने से बचाने या दंगाइयों को उनके मंसूबों में नाकाम बनाया था उन लोगों को यात्रा में शामिल अतिथियों ने सम्मानित किया। सम्मानित किए जाने वालों में मनीष राय ग्राम बनगांव, जमई यादव ग्राम इस्सरपुर, कमलेश सिंह ग्राम अम्मरपुर, सालिम दाऊदी ग्राम दाऊदपुर, जयदेव यादव ग्राम मड़य्यां, अनवर दाऊदी ग्राम दाऊद पुर, तारिक शफीक़ ग्राम संजरपुर शामिल हैं। इनमें से हर एक की उस समय की भूमिका के बारे में भी संक्षेप में बताया गया। इस दौरान दिल्ली से चल कर आई वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह और मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित बैज्वाडा विल्सन यात्रा में शामिल हो गए।

या़त्रा सगड़ी तहसील तहसील क्षेत्र के अजमतगढ़, जीयनपुर और मालटारी पहुंची जहां गत 2 अप्रैल को भारत बंद के दौरान पुलिस ने एससीएसटी एक्ट को कमज़ोर करने के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने वालों को निर्ममता से पीटा था और गंभीर धाराओं में नवयुकों पर मुकदमें कायम किए थे। वहां मौजूद स्त्रियों ने बताया कि उनके किशोरों को पुलिस ने इतनी बर्बरता से पिटाई की थी कि उन्हीं के शब्दों में “उनके ठीक होने में महीनों लग गए”। लोगों ने यात्रीगण को बताया कि गिरफ्तार करते समय पुलिस ने जो ज़ब्ती की थी अभी तक वह सामान वापस नहीं हुए हैं। जब्ती के समय उनके सामान की कोई सूची भी पुलिस ने नहीं दी थी, उसमें कई चीज़ों का कोई पता भी नहीं चला। यात्रा में शामिल एसआर दारापुरी, भाषा सिंह, जुलेखा जबीं व संयोजकों ग़ुफरान सिद्दक़ी और राजीव यादव ने पीड़ित परिवारों की तरफ से मांग किया कि प्रशासन जब्त किए गए सामान तुरन्त लौटाए और जो फर्जी मुकदमें लगाए गए हैं उन्हें वापस लिया जाए।

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