आम जनता तो गहलोत के पक्ष में लग रही है !

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– भंवर मेघवंशी

जनता की सोच और पार्टियों तथा आलाकमान कहे जाने वालों की समझ में भारी अंतर लगता है ।

राजस्थान में जनता के हर सर्वे में अशोक गहलोत लोकप्रियता में सबसे आगे दिखाई पड़ रहे है ,लेकिन उनकी अपनी पार्टी को ही यह शायद समझ नहीं आ रहा है ।

वर्तमान में तो हाल यह है कि वसुंधरा जी तो गई, सचिन जी के लिये अभी इंतज़ार का संकेत है, जनता तो गहलोत जी को चाह रही है।

पर जनता कौन होती है ? उसे चाहने का क्या हक है ? उसके चाहने से क्या होता है ? जनता वनता सिर्फ वोट देने के काम आती है, उसका काम मतदान करने का है, घोषणा पत्र बनाने, टिकट देने, मुख्यमंत्री कौन हो यह तय करने का काम तो आलाकमान का होता है ।

शायद आलाकमान जनता से भी आला होता होगा, उसे जनभावनाओं को नहीं समझ पाने का वरदान होता होगा, इसलिए वह मनमानी करता होगा। एक पार्टी का मामला नहीं है, हर पार्टी हाईकमान/आलाकमान सिंड्रोम की शिकार है।

प्रतिनिधि बनेंगे जनता के मगर टिकट की भीख मांगेंगे दिल्ली में, खुद को जनप्रतिनिधि कहेंगे, पर होंगे अला गुट के, फलां गुट के ।

लोकतंत्र को कुछ और ही बना दिया गया है, लोकतंत्र में लोक की भावना की क्या कोई कदर बची है ?

भाजपा ने राजस्थान की जनता से पूछा कि क्या वह वसुंधरा राजे को पुनः सीएम चाहती है या कोई और चेहरा चाहती है ? बिल्कुल नहीं, पूछने की क्या जरूरत है इस बेवकूफ जनता को, अमित शाह आये और घोषित कर गये, पार्टी के लोगों ने तालियां बजाई और शुरू हो गयी गौरव यात्रा ..!

दूसरी तरफ भी कमोबेश यही हाल है ,भास्कर का सर्वे हो या एबीपी न्यूज का यह सर्वे, आम जनता की अपेक्षा है कि अशोक गहलोत का चेहरा सामने आये, उनके विरोधी भी उनके होने से मुकाबले की बात करते है मगर जनता के नायक जैसी छवि प्राप्त कर चुके एक अनुभवी राजनेता को उनके अपने युवा नेता ही नीचे गिराने पर तुले है । सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठा जारी है ।
यही हाल रहा तो कांग्रेस कैसे बना लेगी सरकार, केवल आंख मारने औऱ गले मिलने से नहीं बनेगी सरकार ।

अभी तो हनुमान बेनीवाल, घनश्याम तिवाड़ी और बहन जी की बसपा ने ताल ठोंक रखी है, बहुतेरी जगहों पर निर्दलीय मजबूती से अपने आपको स्थापित किये हुये है, तो इस बार पनघट की डगर काफी कठिन ही जान पड़ती है, फिर भी अशोक गहलोत का जलवा बरकरार है । लगता है बागों में बहार है ।

राजस्थान में चुनाव की रणभेरी बज चुकी है, सर्वाधिक जनप्रिय नेता को निरन्तर उवेक्षित किया जाना कहीं भारी नही पड़ जाये, यह तो उनको सोचना है जिनको सरकार बनानी है । हम तो यह सोच रहे है कि राजस्थान में कमजोर वर्ग के साथ जारी अन्याय से मुक्ति कैसे मिले और जनता की आवाज़ कैसे बुलन्द हो ?

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