अन्नदाता को भूखा सोना पड़ता है !

किसान गाथा सत्र

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समानांतर साहित्य उत्सव के तीसरे दिवस मुक्तिबोध मंच में किसान गाथा पर एक सत्र आयोजित किया गया इस सत्र में कथाकार प्रो. बृजकिशोर शर्मा ने कहा कि भूमि बन्दोस्त तथा संथाल विद्रोह के द्वारा किसानों तथा आदिवासीयों की स्थिति का चित्रण प्रस्तुत किया। कविता से क्रान्ति आई है।

समाज में परिवर्तन लाने में कविता प्रमुख शस्त्र के रूप में ली जा सकती है। विकास का रास्ता किसानों के विकास का रास्ता खेत और खलिहानों से होता है। लेखक राघव सर शिवप्रसाद सिंह ने कहा कि लेखकों को गंभीर रहना है तो समाज से परिचित होना होगा लेखन के द्वारा समाज को विकसित करने की बात कही। उद्योगपति जो पैसे से हर बात तोलते है, उनका व्यंग्य रूप से वास्तविक्ता स्पष्ट की। बताया कि अन्न दाता को ही भूखा रहना पड़ता है।

सुप्रसिद्ध कवि रामस्वरूप किसान ने कहा कि पूंजीपतियों पर किसान अपनी उपज का अनाज का मोल नही लगा सकता उसके लिए भी उन्हें पूंजीपतियों की मनमानी सहनी पड़ती है। किसानों की दयनीय तथा वास्तविक स्थिति का मार्मिक व्याख्या प्रस्तुत किया कि किस तरह से किसान अपनी जमीन पर अनाज उगाता है तथा कैसे उसे निम्न माना जाता है।

(फारूक आफरीदी)
मीडिया प्रभारीसमानांतर साहित्य उत्सव

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