आम जन का मीडिया
The demand for admission of Dalits to the temple is stupid!

दलितों के मंदिर प्रवेश की मांग अज्ञानता है !

-बाबुलाल सोलंकी

आज तक जिन मंदिरों की आड़ में,परमात्मा ओर परलोक की झूठी कल्पनाओं से अनपढ़ और गरीब जनता को ठगा गया । वर्ग विशेष ने हजारो हजारो साल तक जात पांत के नाम इंसान को बड़ी चतुराई से लूटा ओर इंसान को इंसान से दूर कर ऊंच नीच की खाई में बांटा ।जिस मंदिर और भगवान के नाम हजारो सालो से इंसान को पशु से बदतर जिंदगी जीने को मजबूर किया ।उसी मंदिर में यदि कोई प्रवेश की मांग करता है तो ये मान लो कि शिकारी के बिछाए जाल में शिकार स्वयं फसने जा रहा है .

जिन मंदिरों ने कभी आपकी गरीबी को दूर नही किया,मंदिर के भगवानो ने आप पर होते अत्याचार का कभी विरोध नही किया। आपकी गरीबी, बीमारी,लाचारी,जाति-पांति, ऊंच-नीच व इंसान को बांटने वाली, मानवता विरोधी रीति का विरोध नही किया । सैंकड़ो सालो से उनमे बैठे पंडे पुजारियों ने जिन पर राजपुरोहित, न्यायधीश,धर्मनिष्ठता का लेबल लगाया हुआ है,आपको कभी न्याय नही दिला पाए. आपकी अस्मिता को कभी जगह नही दी। वसुधैवकुटुम्बकम की संस्कृति का झंडा लिए दुनिया को बरगलाने वाले अपने ही घरो में कभी न पाटने वाले सामाजिक दूरिया बना बैठे है.अपने ही देश मे दूसरी दुनिया बसाए है। उसी मंदिर में आप प्रवेश करना चाहते है,मतलब आधुनिक भौतिकवादी युग मे जब ज्ञान-विज्ञान शिक्षा और समझ ने लोगो के लिए समान अवसर पैदा किये ब्राह्मणवाद जातिवाद की जड़े कमजोर हो रही हो, ऐसे में बिछाए गए जाल की ढीली पड़ती डोरिया में आप पुनः फसने जा रहे है ।

भारतीय मीडिया द्वारा जानबूझ कर बड़ी हेडलाइन चलाई जाती है कि “दलितों का मंदिर प्रवेश को लेकर आंदोलन” आप उस जगह पर क्यों जाना चाहते है जहाँ से आपकी ऊंचनीच वर्ग आधारित मानवता को बांटने वाली कुप्रथा का प्रारम्भ हो रहा हो ।ऐसी सभी जगहों का बहिष्कार कर देना चाहिए जो मानवता को बांटती हो, चाहे वो मंदिर,मस्ज़िद,चर्च, गुरुद्वारा,कोई भी हो।शुद्र अपने को शुद्र माने ही क्यों ?अपने को आदमी मानना, इंसान मानना ही काफी है।जिसने इंसान बनने की काबिलियत हासिल कर ली उसे किसी ओर तरह की काबिलियत हासिल करने की जरूरत ही नही है ।

ब्राह्मणवाद के रहते जातिवाद है,जातिवाद के रहते ऊंचनीच है।उसी असमानता को पनाह मंदिर नामक अड्डो में दी जाती है ।आपकी बर्बादी के लिए षड्यंत्रपूर्वक पतन की नीति इन्ही मंदिरों के विशाल गुबंद और भगवे झंडे से निकलती है।भला ऐसे मंदिर में क्यों जाना।आज पढ़ी लिखी मानवतावादी युवा पीढ़ी चाहे वो किसी जाति धर्म से हो जातिवादी वर्ण व्यवस्था को स्वीकार नही करती। वो बंधनमुक्त समानता आधारित जीवन चाहता है।उन युवाओ को फिर से मंदिर मस्जिद की ओर क्यों प्रवेश करवाया जाए।

मैं देश के तमाम दलित शोषित वर्ग के बहुजनो से अपील करना चाहूंगा कि आज से हम मंदिर में प्रवेश नही, महाविद्यालय में प्रवेश का आंदोलन चलाए। सरकार द्वारा शिक्षा का षड्यंत्र पूर्वक निजीकरण किया जा रहा है, उसके खिलाफ आंदोलन किया जाए , हमारी उन्नति और उद्धार के द्वार विश्वविद्यालयों से प्रवेश से खुलेंगे, न कि धर्म और पाखंड की इन विशाल दुकानों में प्रवेश करने से। राजनीति के घोड़े को किसी रेस ट्रैक की जुर्रत नही, उन्हे जिस विधि से वोट नजर आते है ,उसी को हथियार बना लेते है । ऐसे किसी नेतृत्व झांसे में नही आए। मंदिर जिसकी बपौती हो सर पर उठाए फिरे । आप जिस परमात्मा को पाखंड और गोरखधंधे की दुकान में तलाशते है, जिन्हे तथाकथित लोग पवित्र स्थल कहते है,वो परमात्मा एक वर्ग विशेष के हाथों कैद कैसे हो सकता है?

एक ही नाम का एक आदमी (भगवान) ऊंच नीच कैसे हो सकता है।प्रकृति के कण कण में बिराजने वाला मंदिर मस्जिद की दीवारों में कैद कैसे हो सकता है । जब वेद शास्त्र गीता पुराण रामायण बाइबिल कुरान सब कहते है कि प्रभु अल्लाह यीशु सृष्टि का रचियता है,ब्रह्माण्ड को उसने बनाया है, तो निरा मूर्ख इंसान उस प्रभु को पांच-दस फिट की चारदीवारी में कैसे कैद कर सकता है । यदि ऐसा है तो उस प्रभु के लिए आपका दो हजार वर्ग फुट का बंगला छोटा क्यों पड़ता है ? आपका अंतश हृदय छोटा क्यों पड़ता है । कहना ये चाहते है कि ऐसी कोई चीज है ही नही जिसे आप तलाशते है, ये मात्र काल्पनिक भय है, जिसके माध्यम से चालाक लोग अपना धन्धा चला सके ।

भारत वर्ष की महान संस्कृत्ति मूलनिवासी आदिवासी संस्कृति है जिसमे प्रकृति के नियम और पर्यावरण से परे कुछ भी नही, बाद में बुद्ध और महावीर जैसे चिंतनशील महापुरुष लोगो ने मानवता ओर शांतिमय विश्व की स्थापना हेतु चार आर्यसत्य या आष्टांगिक मार्गो के माध्यम से समाज को नई दिशा देने की कोशिश की । विदेशी आक्रांताओं द्वारा उस पवित्र जीवन शैली को छिन्न भिन्न कर हिन्दू नाम की कपोल संस्कृत्ति को खड़ा किया । जिसमें 33 करोड़ देवताओ ,भूत प्रेत,असुर,देव,जादूटोना,डायन, अवतारो की काल्पनिक मनगढ़ंत कहानियों ने इंसान को भ्रमित कर भय में जीवन जीने को मजबूर कर दिया।

उसी भय में आज का इंसान जो अपने को शुद्र कहता है । जो चीज कभी थी ही नही, उसी को एक खास जगह पर ढूंढता है । जिनके नाम पर उसे पशु समान जीवन जीने को मजबूर किया ,बदतर से बदतर हालातो में धकेल दिया । अब वक्त और विज्ञान को समझने का समय आ गया है । जिन लोगो ने विज्ञान को समझ कर अपनी राह चुन ली, वे देश आज प्रगति के पथ पर है ,वहां का जीवन स्तर बेहतर है ।

जिस देश मे धर्मान्धता है चाहे वो बुद्ध, जैन, ईसाइयत, मुस्लिम के नाम ही क्यों न हो,वे देश आज भी भुखमरी बीमारी अशिक्षा और भ्रष्टाचार से जूझ रहे है।मंगल और चंद्रमा पर मानव के कदम ईश्वर-अवतारों से भय मुक्त समाज के लोग ही कर सकते है।रेबीज़ चेचक जैसी जानलेवा बीमारी जिसे हम माता का प्रकोप मान कर करोड़ो के विशाल मंदिर बना चढ़ावा देने के बावजूद भी इस बीमारी से ग्रस्त एक इंसान की जान तक नही बचा पाए ।विज्ञान ने ऐसी माताओ को अपनी सुई से सील कर दुनिया की करोड़ो जिंदगियां बचा ली । जंहा समझ नही वहां सत्य और असत्य को नही जाना जा सकता है,जब तक बहुजन लोग देश मे हजारो सालो से भगवान के नाम पर फैलाए कृत्रिम भय से मुक्त नही हो जाते,तब तक उनकी भक्ति के द्वार नही खुल सकते है.

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