टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान में पेरियार मेमोरियल लेक्चर की शुरुआत !

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–  ( नीरज बुनकर )

Tiss( टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज), मुंबई के इतिहास में पहली बार 18 सितम्बर 2018 को  ई.वी. रामासामी पेरियार के जन्मदिन के मौके पर पेरियार मेमोरियल लेक्चर की शुरुआत हुयी जिसके प्रथम लेक्चर का आयोजन मंगलवार को TISS,मुंबई के क्लिफ़र्ड हाल में संपन्न हुआ जिसकी अध्यक्षता संस्थान के जाने-माने दलित राइट्स एक्टिविस्ट व CSSEIP के चेयरपर्सन प्रो.ए.रमैया ने की और मुख्य वक्ता के रूप में  डॉ.कार्थिक राम मनोहरन,असिस्टेंट प्रोफेसर, सेंटर फ़ॉर स्टडीज़ इन सोशल साइंसेज़,कोलकाता मौजूद थे.

पेरियार को शैक्षणिक चर्चाओं में लाना आज के दौर में काफी प्रासंगिक भी हो गया है जहाँ एक और हम उत्तर भारत में जातीय हिंसा के नाम पर होने वाली घटनाओं के बारे में सुनते रहते है वहीं दूसरी ओर दक्षिण भारत में भी इसी तरह की जातीय द्वेष की घटनाएँ घटित होती रहती है जिसका बारे में हम बहुत ही कम जान पाते है.

इसका ताज़ा उदाहरण हम तेलंगाना में कुछ दिन पहले प्रणय नाम के युवक को बेरहमी से मार दिया गया इसमें गलती सिर्फ़ उसकी इतनी थी की उसने अपनी जाति से बाहर यानिकी की दलित होकर भी एक उच्च जाति की युवती से प्रेम विवाह कर लिया, यहीं बात लड़की के जातिवादी माता-पिता एवम् परिवार  वालो को रास नहीं आई और लड़के को मौत के घाट उतार दिया इस तरह की घटनाएँ जो  भारत के दक्षिण हिस्से में घटती रहती है जबकि पेरियार ने 20वी सदी में दक्षिण में जाति व्यवस्था के विरुद्ध में कहीं आन्दोलन चलाए व् देवी-देवताओं की मूर्तियों को उखाड़ फेका बावजूद उसके जातिवादी तत्व आज भी समाज में ज्यों के त्यों कायम है.

पेरियार मेमोरियल लेक्चर का टॉपिक था- “भारतीय विचारधारा की एक अम्बेडकरवादी-पेरियारवादी आलोचना”. समारोह की अध्यक्षता करते प्रो.रमैया ने धर्म के अस्तित्व पर सवाल उठाया और कहा की धर्म का निर्माण सिर्फ इंसान को आपस में बाँटने के लिए किया गया है जिसका प्रयोग समय-समय पर समाज व धर्म के ठेकेदारों द्वारा किया जाता है, उन्होंने कॉमन मिनिमम प्रोग्राम जिसमे धार्मिक आस्थाओं को एक तरफ रख कर मानवता के लिए काम किया जाए  पर जोर दिया.संविधान को आदर्श मानकर ही हर प्रकार के लोग चाहे किसी भी प्रकार के मतभेद हो साथ रहने की संभावनाएं खोज सकते है. उन्होंने आगे बताया की किस तरह से स्वतंत्रता समानता को बढ़ावा देती है और ये दोनों मिलकर बंधुता को , समाज बिना स्वतंत्रता व समानता स्थापित किए बंधुता का निर्माण नहीं किया जा सकता है.

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता डॉ.मनोहरन ने ब्राह्मणवादी विचारधारा के बारे में कहा कि ये एक ऐसी विचारधारा है जिसने सबको जातिवादी बनाया है और ये प्रक्रिया आज भी जारी है और इससे दलित पीड़ित तो ओबीसी विलन के रूप में उपजे है.छुआछुत व जातिवाद पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि ये एक प्रकार के वायरस है जो पूरी तरह से समाज में फ़ैल चूका है जिससे निज़ात पाने के लिए  एंटीवायरस के रूप  में हमे पेरियार व अम्बेडकर के विचारों को काम में लेना होगा.

अतः हमे बिना आंबेडकर और पेरियार को एक दुसरे के विरुद्ध खड़ा किए व बिना उन्हें एक जगह विशेष तक सीमित किए जातीय व्यवस्था के उन्मूलन के लिए एक साथ अकेडमिक डिस्कोर्स में लाकर आज के दौर में उनकी प्रासंगिकता को समझना होगा.

दलित आदिवासी स्टडीज़,TISS, मुंबई )

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