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दे और दिल उनको, जो न दे मुझको ज़बाँ और !

-राजेश चौधरी, चित्तौड़गढ़हिन्दी पट्टी में दलित आत्मवृत्त-लेखन महाराष्ट्र की तुलना में देर से शुरू हुआ और अब भी संख्यात्मक दृष्टि से कम है। भँवर मेघवंशी का आत्मवृत्त पिछले दिनों प्रकाशित हुआ है, जो कि इस अभाव की एक हद तक पूर्ति करता है। इसे

संघ के एक स्वयंसेवक द्वारा ‘मैं एक कारसेवक था’ की समीक्षा !

(कमल रामवानी 'सारांश') मेरा सौभाग्य रहा है कि पिछले 3 महीने में जो मैंने किताबें पढ़ी है उनके लेखक व्यक्तिगत रूप

‘मैं एक कारसेवक था’ पुस्तक पढ़ते हुए एक दर्द भरी आहट सुनाई देती है !

(रेणुका पामेचा) भँवर मेघवंशी द्वारा लिखित यह आत्मकथा एक संगठन के अन्दर की दोगली नीति को इतने स्व अनुभव से सामने लाती है कि लगता है जैसे आज भी वही घटित हो रहा है. एक युवा बाहरी तामझाम व बड़े-बड़े नारे देखकर कितनी निष्ठा से राष्ट्रीय

भारत एक हिन्दू राष्ट्र नहीं हैः सिक्ख संगठन

- राम पुनियानी आरएसएस के चिंतक और नेता लगातार यह कहते आए हैं कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है। जाहिर है कि इस पर धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर सिक्खों और मुसलमानों, के अतिरिक्त भारतीय संविधान में आस्था रखने वालों को भी गंभीर आपत्ति है।

पठनीय पुस्तक है -” मैं एक कारसेवक था”

(डॉ नवीन जोशी )भंवर मेघवंशी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। पिछले दो दशकों में उन्होंने देश में दलित अस्मिता के लिए रिक्त पड़े आंदोलन को अपनी बेबाक चुनौतियों से पाट दिया है। सामाजिक असमानता के हजारों सालों के भंवर को इस भंवर ने एक हद

संघी ‘भंवर’ से निकालते ‘मेघवंशी’ !

(सम्राट बौद्ध )बड़े गर्व के साथ कहूंगा कि मैं 'मैं एक कारसेवक था' किताब का पहला पाठक हूँ। इस जीवनी का पूरा सार इसके शीर्षक के आखरी शब्द 'था' में निहित है और यही वो शब्द था जिसके कारण मैं किताब का इंतज़ार कर रहा था।संघ के बारे में दलित

आरएसएस की असलियत को उजागर करती एक किताब-“मैं एक कारसेवक था”

( नीरज बुनकर )इस किताब को मैंने ज्यादातर ऑफिस  में  ही बैठकर पढ़ा। अधिकांश लोग  जो  मेरे सहकर्मी है, वो उन समुदायों   से  ताल्लुक  रखते है ,जिनकी विचारधारा दक्षिणपंथ के नजदीक है।जब  मैं किताब  आर्डर  कर  रहा  था  तब  भी मुझे  लोगो  ने

आरएसएस के एक दलित स्वयंसेवक की आत्मकथा !

( आत्मकथा के बहाने मानवता की जरुरी लड़ाई की किताब ) “मेरी कहानियां, मेरे परिवार की कहानियां – वे भारत में कहानियां थी ही नहीं. वो तो ज़िंदगी थी.जब नए मुल्क में मेरे नए दोस्त बने, तब ही यह हुआ कि मेरे परिवार के साथ जो हुआ, जो हमने किया,

आर एस एस क्या है ?

( मधु लिमये )मैने राजनीति में 1937 मे प्रवेश किया। उस समय मेरी उम्र बहुत कम थी, लेकिन चूँकि मैने मैट्रिक की परीक्षा जल्दी पास कर ली थी, इसलिए कालेज में भी मैने बहुत जल्दी प्रवेश किया। उस समय पूना में आर एस एस और सावरकरवादी लोग एक तरफ और

आरक्षण विरोधी पण्डों से दूर रहें आरक्षित कौमें !

कुछ लोग लाइलाज़  बीमारियों से ग्रस्त हैं,लेकिन उनको पता भी नहीं है कि उनको रोग है,वे अपनी बीमारी को अपनी विशिष्टता निरूपित करते हैं। ये ऐसे लोग है जो खुद सदियों से मिले हुये जन्मना जातिगत आरक्षण से मिली पुरोहिताई से पेट भराई करते