स्वामी विवेकानंद और उनका मानववाद !

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(नेहा दाभाड़े)

आज जिस भारत में हम रह रहे हैं, उसमें धर्म और धार्मिक पहचान ने सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर लिया है और वे सार्वजनिक और नीतिगत निर्णयों को प्रभावित कर  रहे हैं। नागरिकता संशोधन विधेयक, कुछ धर्मों को अन्य धर्मों पर प्राथमिकता देता है। बलात्कार और अपहरण जैसे अपराधों को भी धार्मिक रंग  दिया जा रहा है। कुल मिलाकर, धार्मिक पहचान,  देश के सार्वजनिक जीवन के केन्द्र में आ गई है। इसमें कोई परेशानी नहीं थी अगर धर्म, धार्मिक प्रतीकों और धार्मिक पहचान के नाम पर नफरत नहीं फैलाई जा रही होती। हो इसका उलट रहा है। कुछ धार्मिक समुदायों का बहिष्करण किया जा रहा है और नफरत से उपजे अपराध बढ़ रहे हैं। लगभग हर सामाजिक और राजनैतिक घटनाक्रम को धर्म और जाति के चश्मे से देखा जाता है। राष्ट्रवाद को भी धर्म से जोड़ दिया गया है। आज के भारत में जिस राजनैतिक विचारधारा का वर्चस्व है, वह समाज के एक हिस्से को दूसरे दर्जे का नागरिक मानती है और प्रजातंत्र का क्षरण कर रही है। यह विचारधारा, श्रेष्ठता और प्रभुत्व की धारणा पर आधारित है। इस विचारधारा को अधिकांश भारतीयों के लिए स्वीकार्य बनाने और उसकी श्रेष्ठता का औचित्य सिद्ध करने के लिए, श्रेष्ठतावादी अक्सर अपने एजेंडे के अनुरूप,ऐतिहासिक व्यक्तित्वों, नायकों और दार्शनिकों को उद्धत करते हैं और उन पर कब्जा जमाने की कोशिश करते हैं। ऐसे ही एक व्यक्तित्व हैं स्वामी विवेकानंद। जिस समय हमारा देश बहुसंख्यकवाद की ओर बढ़ रहा है, तब स्वामी विवेकानंद के उदार विचारों को याद करना समीचीन होगा।

स्वामी विवेकानंद एक महान चिंतक और दार्शनिक थे। उनका जन्म 1863 में बंगाल में हुआ था। वे अद्वैत दर्शन के प्रतिपादक थे। उनके विचार जटिल थे और तत्समय की सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितियों पर आधारित थे। तत्कालीन समाज, पतन की ओर अग्रसर था और तरह-तरह के अंधविश्वासों में जकड़ा हुआ था। विवेकानंद इससे दुःखी और परेशान थे। अंग्रेज औपनिवेशिक शासन के कुप्रभावों से भी वे अनजान नहीं थे। वे हिन्दू धर्म में सुधार लाना चाहते थे और हिन्दुओं में गर्व और आत्मविश्वास का भाव उत्पन्न करना चाहते थे। हिन्दू धर्म एक ओर रूढ़िवादिता और दूसरी ओर अंग्रेजों द्वारा देश पर पश्चिमी विचार थोपे जाने से पीड़ित था। विवेकानंद का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए संघर्ष को आध्यात्मिक आधार दिया और नैतिक व सामाजिक दृष्टि से हिन्दू समाज के उत्थान के लिए काम किया।

विवेकानंद राष्ट्रवादी थे परंतु उनका राष्ट्रवाद, समावेशी और करूणामय था। जब भी वे देश के भ्रमण पर निकलते, वे घोर गरीबी, अज्ञानता और सामाजिक असमानताओं को देखकर दुःखी हो जाते थे। वे भारत के लोगों को एक नई ऊर्जा से भर देना चाहते थे। वे चाहते थे कि आध्यात्म, त्याग और सेवाभाव को राष्ट्रवाद का हिस्सा बनाया जाए। उन्होंने भारत के लिए एक आध्यात्मिक लक्ष्य निर्धारित किया था। उन्होंने लिखा, ‘‘हर राष्ट्र की एक नियति होती है, जिसको वह प्राप्त होता है। हर राष्ट्र के पास एक संदेश होता है, जो उसे पहुंचाना होता है। हर राष्ट्र का एक मिशन होता है, जिसे उसे हासिल करना होता है। हमें हमारी नस्ल का मिशन समझना होगा। उस नियति को समझना होगा, जिसे हमें पाना है। राष्ट्रों में हमारा क्या स्थान हो हमें वह समझना होगा और विभिन्न नस्लों के बीच सौहार्द बढ़ाने में हमारी भूमिका को जानना होगा।‘‘ विवेकानंद का राष्ट्रवाद, मानवतावादी और सार्वभौमिक था। वह संकीर्ण या आक्रामक नहीं था। वह राष्ट्र को सौहार्द और शांति की ओर ले जाना चाहता था।

वे मानते थे कि केवल ब्रिटिश संसद द्वारा प्रस्ताव पारित कर देने से भारत स्वाधीन नहीं हो जाएगा। यह स्वाधीनता अर्थहीन होगी, अगर भारतीय उसकी कीमत नहीं समझेंगे और उसके लिए तैयार नहीं होंगे। भारत के लोगों को स्वाधीनता के लिए तैयार रहना होगा। विवेकानंद ‘मनुष्यों के निर्माण‘ में विश्वास रखते थे। इससे उनका आशय था शिक्षा के जरिए विद्यार्थियों में सनातन मूल्यों के प्रति आस्था पैदा करना। ये मूल्य एक मजबूत चरित्र वाले नागरिक और एक अच्छे मनुष्य की नींव बनते। ऐसा व्यक्ति अपनी और अपने देश की मुक्ति के लिए संघर्ष करता। विवेकानंद की मान्यता थी कि शिक्षा,आत्मनिर्भरता और वैश्विक बंधुत्व को बढ़ावा देने का जरिया होनी चाहिए।

अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि विवेकानंद, हिन्दू धर्म को अन्य धर्मों से श्रेष्ठ मानते थे। विवेकानंद एक धर्मनिष्ठ हिन्दू थे और आध्यात्मिकता के रास्ते राष्ट्रवाद की ओर बढ़ने में विश्वास रखते थे। इसी का लाभ उठाकर, हिन्दू श्रेष्ठतावादियों ने विवेकानंद को अपनी विघटनकारी विचारधारा का ‘पोस्टर बॉय‘ बना लिया है। विवेकानंद के कुछ उद्धरणों को, उनके संदर्भ से अलग कर, वे अपने एजेंडे को औचित्यपूर्ण ठहराने का प्रयास कर रहे हैं। वे विवेकानंद के स्मारक और उनके नाम पर संगठन बना रहे हैं। वे यह दावा कर रहे हैं कि वे विवेकानंद द्वारा दिखाई गई राह पर चलते हुए सेवा और राष्ट्रनिर्माण का काम कर रहे हैं। हिन्दू श्रेष्ठतावादी, विवेकानंद को हिन्दू राष्ट्रवाद का प्रखर प्रवक्ता, हिन्दू श्रेष्ठता का प्रतिपादक और इस्लाम व ईसाई धर्म से हिन्दू धर्म की रक्षा करने वाला बताते हैं। ये दावे एकदम झूठे हैं।

विवेकानंद न केवल यह स्वीकार करते हैं कि भारत में विभिन्न धर्मों का सहअस्तित्व है बल्कि वे यह भी कहते हैं कि ऐसा होना वांछित और उचित है। शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा ‘‘धार्मिक एकता का सांझा आधार क्या हो, इस पर बहुत कुछ कहा जा चुका है। इस संबंध में मैं अपना सिद्धांत प्रस्तुत करने नहीं जा रहा हूं। परंतु अगर यहां मौजूद लोगों में से कोई यह मानता है कि यह एकता किसी एक धर्म की जीत और अन्य धर्मों के विनाश से स्थापित होगी तो मैं उससे यही कहूंगा कि ‘बंधु, तुम एक कभी न पूरी होने वाली आशा पाले बैठे हो‘।

‘‘न तो ईसाई को हिन्दू या बौद्ध बनने की जरूरत है और ना ही हिन्दू और बौद्ध को ईसाई बनने की। परंतु इन सभी को अन्य धर्मों की मूल आत्मा को आत्मसात करना होगा और इसके साथ-साथ, अपनी वैयक्तिता को भी सुरक्षित रखना होगा। अगर विश्व धर्म संसद ने दुनिया को कुछ दिखाया है तो वह यह हैः इसने दुनिया को यह साबित किया है कि शुचिता, पवित्रता और परोपकार पर दुनिया के किसी चर्च का एकाधिकार नहीं है और हर धर्म ने उदात्त चरित्र वाले पुरूषों और महिलाओं को जन्म दिया है। इस प्रमाण के बावजूद, यदि कोई यह सपना देखता है कि केवल उसका धर्म जिंदा रहेगा और अन्य धर्म नष्ट हो जाएंगे, तो मैं अपने दिल की गहराई से उस पर दया करता हूं। मैं उससे कहना चाहता हूं कि जल्दी ही विरोध के बावजूद, हर धर्म के झंडे पर यह लिखा होगा ‘मदद करो, लड़ो मत‘, ‘आत्मसात करो, विध्वंस न करो‘, ‘सौहार्द और शांति न कि कलह और मतभेद‘।‘‘

इस तरह, वे यह मानते थे कि सभी धर्मों के नैतिक मूल्य एक से होते हैं। वे यह भी मानते थे कि एक-दूसरे से सीखकर सभी धर्म एक साथ आगे बढ़  सकते हैं। वे यह भी मानते थे कि सभी धर्मों के अनुयायियों में उच्च चरित्र के अच्छे मनुष्य हैं। दूसरे शब्दों में, हर धर्म, अच्छे व्यक्तियो को जन्म देता है। यह संदेश हमारे आज के धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। आज, धर्म विशेष के मानने वालों को निशाना बनाया जा रहा है। एक धर्म को दूसरे धर्म से नीचा बताया जा रहा है। धार्मिक प्रतीकों और कर्मकांडों में अंतर को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है। विवेकानंद कहते थे कि विभिन्न धर्मों के प्रतीक भले ही अलग-अलग हों परंतु उनका सार एक ही है। वे जोर देकर कहते थे कि विशेषकर हिन्दू धर्म ने इस विविधता को मान्यता दी है और इस यथार्थ को समझा है। ‘‘विविधता में एकता, प्रकृति का नियम है और हिन्दू ने उसे जान लिया है। अन्य सभी धर्म कुछ विशेष रूढ़ियां प्रतिपादित करते हैं और समाज को उन्हें अपनाने पर मजबूर करते हैं। वे समाज के सामने एक कोट रखते हैं जो जैक, जॉन और हैनरी, तीनों को फिट आना चाहिए। अगर जॉन या हैनरी को कोट फिट नहीं आता तो उसे बिना कोट के ही रहना होगा। हिन्दुओं को यह अहसास है कि परम को पाने, उसके बारे में विचार करने या उसके बारे मे बताने के लिए सापेक्षता जरूरी है। और यह भी कि भगवानों की मूर्तियां, क्रास और अर्धचन्द्र, केवल प्रतीक हैं – वे ऐसे खूंटे हैं जिन पर आध्यात्मिक विचार टांगे जा सकते हैं।

‘‘हिन्दू के लिए धर्मों की दुनिया एक ऐसी जगह है जहां महिला और पुरूष अलग-अलग परिस्थितियों से गुजरते हुए, एक ही लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। हर धर्म मनुष्य से ईश्वर का विकास करना चाहता है और वही ईश्वर धर्मों का प्रेरणास्त्रोत है। फिर इतने विरोधाभास क्यों हैं? हिन्दू के लिए ये केवल आभासी हैं। ये विरोधाभास इसलिए हैं क्योंकि वही सत्य अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग रूप ले लेता है।‘‘

वे कहते हैं कि भारत का भविष्य, हिन्दू धर्म और इस्लाम के सौहार्दपूर्ण रिश्तों में ही निहित है। वे एक ऐसा भारत चाहते हैं जिसकी ‘बुद्धि वेदांत और शरीर इस्लाम हो‘।

वे लिखते हैं ‘‘चाहे हम उसे वेदांतवाद कहें या कोई और वाद परंतु सच यह है कि अद्वैतवाद, धर्म के मामले में अंतिम सत्य है। वह हमें सभी धर्मों और पंथों के प्रति प्रेम रखना सिखाता है। मैं मानता हूं कि यही भविष्य की प्रबुद्ध मानवता का धर्म होगा। हिन्दुओं को अन्य नस्लों के मुकाबले, इस सत्य तक पहले पहुंचने का श्रेय दिया जा सकता है परंतु इसका कारण यह है कि हिन्दू, यहूदी या अरब की तुलना में अधिक पुरानी नस्ल है। परंतु यह मानना गलत होगा कि पूरी मानवता को एक मानने का विचार केवल हिन्दू है।

‘‘मेरा अनुभव यह है कि अगर कोई धर्म समानता के आदर्श के सबसे नजदीक आया है तो वह इस्लाम और केवल इस्लाम है। मेरा मानना है कि व्यावहारिक इस्लाम के बगैर वेदांत के सिद्धांत, चाहे वे कितने ही उत्कृष्ट और अद्भुत क्यों न हों, मानवता के लिए बेकार हैं। हम मानवता को ऐसी जगह ले जाना चाहते हैं, जहां न वेद हों, न बाईबिल और ना ही कुरान। परंतु यह वेद, बाईबिल और कुरान के सामंजस्य से ही किया जा सकता है। मानवता को हमें यह सिखाना होगा कि विभिन्न धर्म एक ही धर्म की अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं। हमारी मातृभूमि के लिए दो महान धर्मों का संगम एकमात्र आशा है – वेदांत बुद्धि और इस्लामिक शरीर।

‘‘मैं अपनी मन नजरों से देख सकता हूं कि वर्तमान की अराजकता और कलह से महान और अपराजेय भारत उभरेगा, जिसकी बुद्धि होगी वेदांत और शरीर, इस्लाम।‘‘

विवेकानंद सेवा करने की शिक्षा देते थे। गरीबों और दबे-कुचलों की सेवा उनके जीवन का लक्ष्य था। यही कारण है कि वे पहले हिन्दू मिशनरी कहे जाते हैं। उनका मूल संदेश यह था कि  जाति, वर्ग या लिंग के भेद के बिना, सभी की सेवा की जाए। वे मानते थे कि हर मनुष्य में ईश्वर का वास है। दूसरों की सेवा करने से मानववाद मजबूत होता है। वे यह मानते थे कि गरीबों की सेवा किए बगैर राष्ट्र निर्माण नहीं हो सकता। वे मनुष्य की स्वार्थी और आत्मकेन्द्रित प्रवृत्तियों के खिलाफ थे। वे सभी तरह के शोषण के विरोधी थे।

कुल मिलाकर, विवेकानंद के दर्शन को हम मानववाद कह सकते हैं। विवेकानंद चाहते थे कि भारतीय अच्छे मनुष्य बनें। वे उदार हों, दयालु हों, दूसरों से प्रेम करें, सभी को गले लगाने के लिए तैयार हों और उनका व्यवहार गरिमापूर्ण हो। उन्होंने भारतीयों में ये उदार और सार्वभौमिक मूल्य उत्पन्न करने के लिए हिन्दू धर्म को चुना। हिन्दू धर्म को उस समय औपनिवेशिक सत्ता के साथ-साथ जाति प्रथा और रूढ़िवादिता से भी जूझना था। ऐसा लग सकता है कि विवेकानंद हिन्दू धर्म को अन्य धर्मों से श्रेष्ठ मानते थे। परंतु उनका मूल संदेश समावेशिता का है। सभी धर्मों की मूल एकता की जो बात वे करते थे,वह आज की परिस्थितियों में, जब मनुष्य मनुष्य का दुश्मन बन गया है, एक मरहम का काम कर सकती है। उनका भारत और उनका राष्ट्रवाद, दूसरों के प्रति घृणा नहीं फैलाता। उनका राष्ट्रवाद भारतीयों को बेहतर मनुष्य बनाता है। आज के उथल-पुथल, कटुता और हिंसा से भरे भारत में विवेकानंद की आवाज समझदारी की आवाज लगती है।

(अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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