आम जन का मीडिया
Strong opposition is necessary!

मजबूत विपक्ष जरुरी है !

जब किसी राज्य में विपक्ष निस्तेज हो ,प्रतिपक्ष सत्तादल के भीतर से उभरता है। लोकतंत्र में पक्ष विपक्ष के लिए स्थान निर्धारित रहता है। जब विपक्ष अपनी छाप नहीं छोड़ पाए तो प्रतिपक्ष का स्थान खाली खाली नजर आने लगता है। इस शून्यता को कभी सत्ताधारी पार्टी के अंदर से उठती आवाजे भरती है.कभी मीडिया और कभी नागरिक समूह।
भारत में विपक्ष ने बहुत सम्मानित नेता दिए है।जैसे डॉ राम मनोहर लोहिया ,जे पी ,आचार्य नरेंद्र देव ,श्यामा प्रसाद मुखर्जी ,राजगोपालाचारी ,पीलू मोदी,दीनदयाल उपाध्याय,जे बी कृपलानी ,नंबदूरीपाद। फिर प्रकाशवीर शास्त्री ,भूपेश गुप्त ,बीजू पटनायक ,ज्योतिर्मय बसु ,मधु लिमये ,मधु दंडवते ,रवि रॉय।अटल बिहारी वाजपेयी ,जॉर्ज फर्नाडिस,लाल कृष्ण अडवाणी। सूची लंबी है। एक से एक होनहार और तपस्वी नेता रहे है।इन नेताओ ने अपना लम्बा वक्त प्रतिपक्ष में व्यतीत किया और भारत के सियासी फलक पर सितारे की तरह उभरे।
ये ऐसे नाम है जो प्रवाह के विपरीत चले और मकाम हासिल किया। ये वो  दौर था जब लोग  खिदमत की तलब से सियासत में आते थे,किसी क्लब से नहीं।ये अपने साथ किराए का केमरामेन लेकर नहीं चलते थे ,न ही किसी विज्ञापन कम्पनी से छवि निर्माण का अनुबंध करते थे। अक्सर गांव कस्बो में घूमते ,लोगो से घुलते मिलते,रेल के सबसे सस्ते डिब्बे में सफर करते और किसी भी चाय की दुकान पर बैठ जाते।क्या अब भी ऐसा है ?
जो नेतृत्व गांव देहात ,खेत खलिहान,झोपंड पट्टी और मलिन बस्तियों की धूसर पगडंडी से चल कर आता है ,उसके चेहरे पर भारत की छाप नजर आती है।ब्रिटैन के दो बार प्रधान मंत्री रहे बेंजामिन डिसराएली कहते थे -कोई भी सरकार एक मजबूत विपक्ष के बिना लम्बे समय तक सुरक्षित नहीं रह सकती।अमेरीकी पत्रकार और चिंतक वाल्टेर  लिपमान को दो मर्तबा पुल्तज़िर पुरस्कार मिला । उनका कहना था ‘विपक्ष जरूरी है।किसी भी सवेंदनशील इंसान की तरह  एक अच्छा राजनेता हमेशा अपने प्रतिबद्ध समर्थको से ज्यादा विपक्ष से सीखता है।
– नारायण बारेठ 

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