आम जन का मीडिया
Staying away from emotional turmoil, the Muslim community has to work on real issues.

जज्बाती तकरीरो से दूर रहकर मुस्लिम समुदाय को असल मुद्दो पर काम करना होगा।

        – अशफाक कायमखानी
हालाँकि  मुस्लिम समुदाय के भारत भर के हालात के मुताबिक ही राजस्थान के हालात भी उतने अच्छे नही माने जा सकते है, लेकिन इतना जरुर है कि कम से कम राजस्थान का देहाती मुस्लिम समुदाय जज्बाती बातो व तकरीरो के जंजाल मे नही फंस कर वो अपनी सही दिशा मे राह बनाने मे गम्भीरता से लगा हुआ है। लेकिन शहरी मुस्लिम आज भी चंद लोगो की जज्बाती तकरीर के जाल मे फंस कर बिना वजह के मुद्दो मे फंस कर अपनी ऐनर्जी बरबाद करने से बाज नही आ रहे है।
 भारत मे पिछले कुछ सालो से एक खास सोच वाले नेताओ व दलो का उदय परवान पर चढे होने से वो जब चाहे तब कुछ विवादित वाक्य बोलकर मुस्लिम समुदाय के उसके प्रति जज्बात को उभारकर उसे इस तरह से भावनात्मक बनाकर कई दिनो तक उनकी ऐनर्जी का उपयोग उसी मे बरबाद करवाने का एक नया जाल गूंथते रहते है। जिसमे मुसलमान अक्सर फंसता रहता है। अगर उनकी यही ऐनर्जी सकारात्मक दिशा मे लगे तो परिणाम भी सुखद आते नजर आ सकते है ।
समय समय पर उभरते अनेक मुद्दो मे से एक लेटेस्ट मुद्दा मतदाता सूचियों  से मुस्लिमो का नाम ना होने के रोज के रोने पर ही कुछ कहना चाहता हूँ कि साल मे तीन चार दफा मतदाता सूची मे नाम जुड़वाने व संशोधन करवाने के अभियान के साथ साथ हर दिन यह प्रक्रिया सतत चलती रहती है। इसके साथ साथ पूरी मतदाता सूची ओनलाईल व नेट पर उपलब्ध रहती है। इसके अलावा हर चुनाव के पहले लेटेस्ट मतदाता सूचि का प्रकाशन होने के साथ साथ त्रुटियों को ठीक करवाने का बाकायदा एक प्रोग्राम जारी होता रहता  है। लेकिन मुसलमान मतदाता सूचि मे अपना नाम तब देखता है, जब वो मतदान करने जाता है। तब तक तो जिनको जो कुछ करना होता है। वो सब कुछ नाम हटाने का सिस्टम कर चुके होते है। उस समय उनके पास सिर पटक रोने के अलावा कोई चारा नही होता है।
मतदाता सूची से नाम नही होने की शिकायते अधिकांशत  शहरो मे सुनने को मिलती है। जो अपने आपको अधिक जागरुक व फॉरवर्ड कहते  थकते नही है,उन्हीं के नाम कटते है । मतदाता सूची मे नाम हटने या बडी तादात मे नही होने के अनेक कारण हो सकते है। लेकिन इसका पहला जिम्मेदार मतदाता स्वयं व दूसरा उसका स्थानीय पंच-सरपंच व वार्ड पार्षद ही माना जायेगा। मुस्लिम समुदाय के इस स्तर के जनप्रतिनिधीयो पर जरा गम्भीरता से आप लोग नजर डाले तो साफ पता चलता है कि वो अगर समय पर जागरुक होते तो इस तरह की दिक्कत समाज को देखने व भुगतने को नही मिलती।
अव्वल तो हम परिवारवाद या दूसरे लालच मे आकर हम हमारा इस स्तर का जनप्रतिनिधि कम पढा लिखा , कमजोर यानि इस लिहाज  से जाहिल को चुन लेते है। जिसका काम अपने आकाओ की हाजरी बजाकर केवल अपना उल्लू सीधा करना होता है या फिर गुलाबी गुलाबी राजनीती करना होता है। इस तरह के जमीनी मुद्दों पर काम करने के बजाय किसी के इशारे पर उभारे  गये जज्बाती मुद्दों पर मुसलमान सड़क पर भीड़ के रुप मे जमा होकर बेवजह अपनी ऐनर्जी खर्च करने को बडा उतावला नजर आता है। यह मुस्लिम समुदाय का भयंकर दुर्भाग्य है .

Leave A Reply

Your email address will not be published.