जातियों की गंध और रानी पद्मावती

- संजीव खुदशाह

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फिल्म पद्मावती के रिलीज होने की डेट फिर एक बार जारी हुई। देखना यह है कि इस बार फिल्म रिलीज हो पाती है या नहीं। रानी पद्मावती फिल्म कीे आड़ में भारत में जो बवाल मचा रखा है। उससे नहीं लगता कि भारत में लोकतंत्र जिंदा है। इसे एक वृहद हिंदू अस्मिता का प्रश्न बनाया जा रहा है। बहुत सारे लोग इसे नारी की अस्मिता से भी जोड़ कर देख रहे हैं। इन बड़े-बड़े महलों कोठियों में रहने वाले लोगों के बुद्धियों पर लगे तालों को देख कर इन पर दया आती है। क्योंकि यह फिल्म भारत में पहली बार बन रही है, ऐसा नहीं है। इसके पहले भी पद्मावती पर फिल्म बन चुकी है। उस समय यह भावनाएं कहां थी? यदि नारी और हिंदू अस्मिता की ही बात रही है तो फूलन देवी पर बनी फिल्म बैंडिट क्वीन के समय हिंदू अस्मिता का प्रश्न क्यों नहीं खड़ा किया गया? हंगामा क्यों नहीं किया? गया जाहिर है इन हंगामों के पीछे मकसद कुछ और ही होगा ।

एक टीवी चैनल लगातार इन मुद्दों पर राजपूतों के पक्ष में प्रोग्राम दिखा रहा है। इसी एक प्रोग्राम के दौरान किसी तथाकथित महारानी (संविधान में महारानी या महाराजा की पदवी प्रतिबंधित है) ने यह स्टेटमेंट दिया कि ‘हमारे पास डॉक्यूमेंट है कि रानी पद्मावती एक असल किरदार रही हैं। वह काल्पनिक नहीं है हम बचपन से उनके किस्से पढ़ते आ रहे हैं।Ó मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह डॉक्यूमेंट आज तक सरकार के पास क्यों नहीं पहुंचा? क्यों ऐसे ऐतिहासिक डॉक्यूमेंट को यदि वह सही में है तो इतिहासकारों के नजर में नहीं आया?

दरअसल मैं आपको बताना चाहूंगा कि करीब 1540 इसवी में कवि मालिक मोहम्मद जायसी की एक काल्पनिक ऐतिहासिक रचना में पद्मावती का जिक्र मिलता है। इसके सिवाय ऐसा जिक्र 1540 के पहले के किसी भी ग्रंथों में नहीं मिलता। यही कारण है कि इतिहासकार पद्मावती को एक ऐतिहासिक किरदार मानने से इनकार करते रहे हैं। जबकि करीब 224 साल पहले 1303 में चितौड़ के राणा रतन सिंह को अलाउद्दीन खिलजी ने बुरी तरह हराया था ।

यह घटना ऐसे समय हो रही है जब पूरा विश्व धर्म और जाति विहीन समाज की ओर बढ़ रहा है। घटना इस बात की तस्दीक करती है कि भारत में जातीय व्यवस्था आज भी धर्म चरम पर है। और इस धर्म पर सिर्फ ऊंची जातियों का ही राज है। यह भारत देश भी सिर्फ उन्हीं का है जो जाति व्यवस्था की ऊंचाई पर बैठे हुए हैं। केवल उन्ही की अस्मिता पर चोट पहुच सकती है। कानून की जंजीरे उनके लिऐ ही ढीली पड़ सकती है। पद्मावती फिल्म को अपने आन-बान-शान पर ठेस पहुंचने का दावा करने वाले यह राजपूत उन्हीं के बच्चे हैं। जिनके पिताओं ने मिलकर एक पिछड़ी जाति मांझी की बेटी फूलन देवी का सामूहिक (21 लोग) बलात्कार किया था। बाद में वे लोग ही बैडिट क्वीन फिल्म देखने गए थे। फूलन देवी ऐसे गरीब परिवार से ताल्लुक रखती थी कि ना तो वह स्वयं ना ही उनकी जाति ने कभी बैंडिट क्वीन फिल्म को अपने जातिगत सम्मान को ठेस पहुंचाने के नजरिये से देखा है। यदि वे ऐसा देखते भी तो क्या कर पाते कुछ नहीं। कानून के द्वारा उनसे सख्ती से निपटा जा सकता था। वहीं दूसरी ओर पद्मावती के बवाल में, कानून उनके साथ खड़ा दिखता है। दीपिका पादुकोण के नाक काटने के एलान किए जा रहे हैं। निर्माता संजय लीला भंसाली का सिर कलम किए जाने पर इनाम की घोषणा की जा रही है। और वह वीडियो टीवी चैनलों से लेकर सोशल मीडिया में लगातार तैर रहे हैं। बावजूद इसके इन पक्तियों के लिखे जाने तक उन पर कोई भी कार्रवाई नहीं हुई। उल्टे कुछ लोगों को जो पद्मावती फिल्म के समर्थन में बात कर रहे थे। उन्हें धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।

पद्मावती बवाल को दो नजरिये से देखा जा सकता है। पहला नजरिया है कि शासन प्रशासन में क्षत्रिय जातियों का योगदान कम होता जा रहा है। ब्राह्मण समेत तमाम अगड़ी जातियां मजबूती बनाए हुए हैं। ऐसे समय में राजपूतों को यह लगता है कि उन्हें शासन प्रशासन का ध्यान अपनी ओर लाने के लिए ऐसे शक्ति प्रदर्शन करना चाहिए। दूसरा नजरिया यह हो सकता है कि इस प्रकार के हंगामे उठाने के लिए कुछ और तत्व भी आग में घी का काम कर रहे हैं और उनका असल मकसद पद्मावती की अस्मिता नहीं कुछ और है। इन्हें इन 4 बिन्दुओं में समाहित किया जा सकता है।

वह चाहते हैं कि हिन्दू धार्मिक भावनाएं उठाकर आगामी होने वाले चुनाव में इसका लाभ लिया जाय। फिल्म पद्मावती को विवाद के माध्यम से प्रचार मिले ताकि उस में खर्च होने वाले 180 करोड़ का कई गुना मुनाफ़ा कमाया जाए। चूंकि यह फिल्म मुकेश अंबानी के मालिका हक की कंपनी वायाकाम18 मोशन पिक्चर्स के द्वारा बनाई गई है। इसीलिए इस पर बैन लगने का कोई सवाल ही उठता है।
यह दो चोटी की जातियों की आपसी जंग भी है। जिस प्रकार पिछले कुछ सालों से बड़े पैमाने पर परशुराम जयंती पर रैलियां निकाली जा रही है। चौक-चौराहे का नामाकरण किया जा रहा है। इस बात को बार-बार उछाला जा रहा है कि धर्मग्रथों के अनुसार परशुराम ने 21 बार क्षत्रियों को मारकर वंश विहीन किया था। राजपूताना सोच क्षत्रिय इतिहास नाम के एक वेबसाईट पर तो बकायदा परशुराम के तथ्य को काल्पनिक करार दिया। पिछले दिनों इसी संदर्भ में अखिल भारतीय ब्राम्हण महासभा के प्रदेश अध्यक्ष पंडित सतेंद्र शर्मा ने एक बहुत ही भड़काऊ और विवादित बयान लिखित में जारी किया है। फिल्म के समर्थन में खुलेआम ब्राम्हण महासभा के प्रदेश अध्यक्ष एवं पदाधिकारियों ने धमकी दी है कि अगर सिनेमा घर में किसी भी दर्शक को हाथ लगाया गया तो हाथ उखाड़ देंगे। जारी बयान में लिखा है कि दर्शकों से छेड़छाड़ करने वालों को उनकी महासभा से जुड़े लोग हाथ उखाड़ लेंगे।

कुछ तत्व चाहते हैं कि पद्मावती के माध्यम से राजपूतों के आन बान शान की धज्जियां उड़ा दिया जाए और उनके मन में परशुराम का खौफ बना रहे। जिस प्रकार सोशल मीडिया में इतिहास के तथ्यों को आधार बनाकर राजपूतों के आन बान शान की शल्य चिकित्सा की जा रही है। उससे यह प्रतीत होता है कि इससे पहले राजपूतों का इतना छीछालेदर कभी नहीं हुआ है। जयचंद चौहान से लेकर राजा भारमल तक बहुत सारे प्रश्न उठाया जा रहे हैं। यह भी प्रश्न उठाया जा रहा है कि यदि शास्त्रसम्मत तुम्हें देश की रक्षा का भार था तो भारत देश 2000 साल से गुलाम क्यों रहा?

इस प्रकार की बहस को मैं सामाजिक समानता के दृष्टिकोण से जरूरी और सकारात्मक नजरिया से देखता हूं। मुझे लगता है कि जातियां तथा ऊंच-नीच तब तक कायम रहेगी। जब तक कि एक जाति अपनी श्रेष्ठता पर गर्व करें और दूसरी जाति अपनी निम्नता पर शर्म, तब तक जाति व्यवस्था को खत्म नहीं किया जा सकता।

यह भी जरूरी नही है कि समानता लाने के मकसद से किसी जाति को नीचा दिखाया जाय। यह एक साझा कार्य जिसे सबको मिलजुल कर करना चाहिए। पद्मावती के विरोध का एक दुखद पहलू यह भी है। इस विवाद का दुखद पहलू यह भी है कि पद्मावती द्वारा किए गए आत्मदाह को महिमामंडित किया जा रहा है। जबकि सती प्रथा कानून द्वारा प्रतिबंधित है। आशा करता हूँ भारत 14 वीं सदी के बजाय 21 सदी की ओर ही जायेगा।

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