ब्राह्मणवाद से मुक्ति के लिए छटपटा रहा है ग्रामीण बहुजन भारत !

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(भंवर मेघवंशी) 

ऐसा लग रहा है कि ग्रामीण भारत ब्राह्मणवाद की सांस्कृतिक दासता से मुक्ति के लिए एक मजबूत लड़ाई लड़ रहा है और इसके अग्रगामी है निर्विवाद रूप से दलित बहुजन समाज की युवा पीढ़ी , आइये देखते है कि गांवों का जातिवाद से सना भारत कैसे करवट ले रहा है ?

भीम की जय क्यों ?

तकरीबन 20 साल पहले जब मैं अपने जिले भीलवाड़ा को छोड़कर बतौर सोशल एक्टिविस्ट राजसमन्द जिले के भीम नामक कस्बे में रहकर काम करने लगा ,तब उन इलाकों में दलित बहुजन समुदायों में ‘जय भीम’ का सम्बोधन प्रचलन में नहीं था, सामाजिक संगठन भी ज़िंदाबाद अथवा नमस्कार या राम राम से ही काम चलाते थे, मुझे याद है कि भीम में पहली अम्बेडकर जयंती एक बन्द कमरे में चन्द सरकारी कर्मचारियों की मौजूदगी में गुपचुप तरीके से मनाई गई थी,आज हालात बदल गए है,वहां पर हर साल जोर शोर से अम्बेडकर जयंती व निर्वाण दिवस मनाया जाता है, जो लोग हमारा मजाक उड़ाते हुए कहते थे कि भीम कस्बे में रहते हैं,वहां काम करते हैं ,इसलिए भीम की जय बोलते हैं। वे ही लोग आज सार्वजनिक स्थलों पर बुलन्द आवाज में जय भीम कहते नजर आते है ,गांवों में हरिओम और राम राम के संबोधन बड़े बुजुर्गों तक सीमित हो चुके है,जय भीम और जय जय भीम अब सर्वत्र सुनी जाने वाली ध्वनियां है ।

बुद्धनगर से अम्बेडकर मोहल्लों तक ..!

गांवों के नाम जाति के आधार पर रखे जाने की परंपरा काफी प्राचीन है,ऊपरी कही जाने वाली जातियों के गांवों के नाम सम्मानजनक होते है ,वहीं दलित व अतिपिछड़ी रिहाईश वाली बस्तियों के नाम अपमानजनक , जैसे कि चमारिया खेड़ा !

दलित युवाओं को अपने गांव,कस्बों व मोहल्लों के अपमान कारी नाम अखरने लगे तो उन्होंने जाति आधारित नामों को स्वतः बदल देने का निश्चय कर लिया और खुद ही नामकरण करते हुए बोर्ड लगाने लगे, राजस्थान के कईं हिस्सों में इस प्रकार बदले जा रहे नामों के बाद लगाई गई नाम पट्टिकाओं व बोर्ड्स का उद्घाटन करने का अवसर मुझे मिला।

बहुजन युवाओं का कहना है कि ये गांव नहीं बल्कि हमारे लिए गालियां है,जिन्हें हम स्वीकार नहीं कर सकते है,रेवेन्यू रिकॉर्ड ( दस्तावेजों) में जब बदलाव होगा,तब होगा, पर हम धरातल पर बदलाव कर रहे हैं ।

बैण्ड बाजा ,बारात ,घोड़ी और शादी के कार्ड ।

यह साफ देखा जा सकता है कि शादी ब्याह के पारम्परिक कार्ड अब बहुजन समुदाय को स्वीकार नहीं है, “वक्रतुंड महाकाय,सूर्यकोटि समप्रभः” से प्रारम्भ होने वाले कार्ड अब जय भीम, जय फुले और नमो बुद्धाय से शुरू हो रहे है,कार्ड पर से गणेश आदि देवता तिरोहित हो चुके है,उनका स्थान बुद्ध,कबीर और बाबा साहब अम्बेडकर ने ले लिया है।

शादी के शामियाने मिशनरी अंदाज के हो चले है और दूल्हा दुल्हन घोड़ी पर सवार हो कर बिन्दौली निकाल रहे है, मैंने दर्जनों मौकों पर पाया कि जहाँ  जहाँ भी दलित दूल्हा दुल्हन की घुड़चढ़ी को सामंती व मनुवादी सोच के लोगों ने रोकने की कोशिश की, वहां वहां प्रतिकार भी उसी पैमाने पर उठ खड़ा हुआ है।

अब दलित युवाओं की बारातों में ‘आज मेरे यार की शादी है’ अथवा ‘झूम बराबर झूम शराबी’ की स्वर लहरियां कम ही सुनने को मिलती है, अब तो ‘मुझे चढ़ गया नीला रंग रंग’ और ‘जय जय जय जय जय भीम’ के नारे ही सर्वव्यापी होते जा रहे हैं, यहां तक कि विनायक स्थापना और काल्पनिक देवी देवताओं को सिर नवाने की शादी से जुड़ी रस्मों को ही स्किप कर दिया जा रहा है ,शादी जैसे अवसरों से पुरोहित वर्ग का निष्कासन मानसिक गुलामी से मुक्ति का प्रतीक बन रहा है ।

 पंडितों को दान,मान और मतदान क्यों ?

घरों पर आने वाले पौराहित्य करने वाले कर्मकांडी ब्राह्मणों से अब दलित युवा सीधे सवाल पूछ रहे हैं कि तुम क्यों ऊपर ,हम क्यों नीच ?

पहले बच्चों के नामकरण से लेकर मृत्यु की रस्मों तक ब्राह्मण अनिवार्य थे,अब यह अनिवार्यता समाप्त हो रही है,सोशल मीडिया में चलने वाले ब्राह्मणवाद विरोधी अभियान ने लोगों को सोचने को मजबूर किया है कि जब बच्चा खुद पैदा कर लेते हो तो नाम क्यों नहीं रख पाते हो ?

इन दिनों पंडितों से नाम निकलवाने, टेवा ( जन्मपत्री) बनवाने का काम लगभग बन्द होता जा रहा है,लोग अपने बच्चों के कर्णप्रिय ,सुमधुर नाम स्वतः रख ले रहे है ,मेरे परिवार में आये नए मेहमानों के नाम बुद्ध, कबीर,अशोक के नामों पर धरे गये है,यह लगभग हर परिवार में हो रहा है ।

इन दिनों इस अभियान ने जोर पकड़ा है कि जो पण्डित हमें निम्न समझता है,हमारे घर का पानी नहीं पीता,हमारा खाना नहीं खाता है, उसको हमारी दहलीज के भीतर प्रवेश क्यों ? सोशल मीडिया कम्पैन ने लोगों के भीतर इस प्रश्न को मजबूती से स्थापित कर दिया है कि पंडितों को दान ,मान सम्मान और चुनाव में मतदान क्यों किया जाना चाहिए ?

चारो ओर नीला ही नीला 

राजस्थान के रिमोट गांवों की दलित बस्तियों व घरों पर ‘जय भीम जय भारत’ के नीले झंडे दिखने लगे है। बड़े बड़े नीले ध्वज दलित गांवों व बस्तियों की नई पहचान बनते जा रहे है,लोग अपनी गाड़ियों पर भी नीले झंडे सगर्व बांधकर चलते दिखेंगे।

एक बात और नोटिस करने योग्य है कि मनु की मूर्ति वाले राजस्थान में बहुतायत में होने वाले जातिगत आयोजनों में अब नील फरारे हवा में जमकर लहर लहर लहराते है तथा आयोजन स्थलों पर कबीर ,फुले, बुध्द और बाबा साहब के चित्र ही चारों तरफ नजर आते है,यह सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं ,बल्कि बुनियादी बदलाव है,जिसे रेखांकित किया जाना चाहिए।

यह भी गौरतलब बात है कि अब हर तरह के आयोजन में दलित बहुजन युवा गले मे शान से नीला स्कार्प लगा कर आते हैं और ऊंची आवाज में जय भीम नमो बुद्धाय कहते हुए सुनाई पड़ते है।

शोक पत्रिकाएं तक बदल गयी है ।

शादी के कार्ड ही नहीं बदले,अब तो मौत मरघट पर छापी जाने वाली शोक पत्रिकाएं तक बदल रही है,मृत्यु भोज की जगह भीम मिलन हो रहे है,देवी जागरण के बजाय भीम जागरण हो रहे है और नानी बाई का मायरा , भागवत कथा और रामकथाओं की जगह भीम कथाएं चल रही है, यहां तक कि आध्यात्मिक सत्संगों में भी बाबा साहब के मिशन की बाते होने लगी है और दलित बहुजन समाज से आने वाले साधु संत तक इस प्रवृत्ति को प्रोत्साहित कर रहे हैं।

देवालय बनाम पुस्तकालय !

चूंकि दलित पिछड़ा समुदाय धार्मिक आध्यात्मिक बातों में आकंठ डूबा हुआ है, उन्हें धर्म के नशे ने दरिद्र रहने,अनपढ़ रहने के बावजूद सन्तुष्ट बनाये रखा,रात रात भर ढोलक,मजीरे,तंदूरे पर भजन बोलते रहे,सवर्णों ने मन्दिर में प्रवेश दिया तो अपने मन्दिर बना लिए,उनकी पूजा करने लगे तथा अपने भीतर ही दलित पण्डित पैदा कर लिए,जो उन्हें आत्मा ,परमात्मा,इहलोक, परलोक की पट्टी पढ़ाने लगे।

गांवों में रामदेव पीर ,भेरूजी, माताजी,हनुमान, शिव के मंदिर दलित बस्तियों में बड़ी संख्या में मौजूद है,ये सार्वजनिक जगहें इन समुदायों की सोशल गैदरिंग की बड़ी जगहें बनी हुई है,इसलिए हमने तय किया कि इनका विरोध करने के बजाय इन स्थानों को ऑक्युपाई किया जाना चाहिए,उसके लिए ‘देवालय बनें पुस्तकालय’ मूवमेंट शुरू किया गया है,जो अब जोर पकड़ रहा है,लोग अपने घरों में स्थित मंदिरनुमा अलमारियों से मूर्तियां व तस्वीरे निकाल कर किताबें भर रहे हैं और मंदिरों में पुस्तकों की अलमारियां सजा रहे हैं, इन पुस्तकालयों में बहुजन आदर्शों का साहित्य रखा जा रहा है ।

जन्त्री पंचागों की जगह भीम कलेण्डर !

बदलाव की बयार इतनी तेज है कि उसमें बरसों से स्थापित कईं प्रतिमान व प्रतीक ध्वस्त होते जा रहे है,लोग साल दर साल पंचाग नुमा कलेण्डर अपने घरों की दीवारों पर टांगते रहे हैं, पर अब दलित बहुजन समाज की दीवारें भी इन ‘किशोर जन्त्री पंचागों’ का बोझ सहने को तैयार नहीं है,पिछले पांच सालों से मुझे हर बरस दर्जनों कलेण्डर मिलते हैं ,इस साल भी कईं अच्छे कलेण्डर छप कर आये है,अब ब्राह्मणवादी तिथियों,महुर्तों व ग्रह नक्षत्रों की पोंगा पंथी बातों से दूर बहुजन महानायकों के विचारों,चित्रों व कथनों से युक्त पाखण्ड खंडन करते बहुजन समाज के भीम कलेण्डर बहुतायत में उपयोग में आ रहे है,कईं युवा सम्पूर्ण मनोयोग से यह काम कर रहे है,वे हर साल भीम कलेण्डर छापते है,इतना ही नहीं बल्कि उन कलेंडर्स के एकाधिक संस्करण निकाल रहे हैं ।

यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि अब हर गांव में अम्बेडकर जयंती व महापरिनिर्वाण दिवस की धूम रहती है,लोग सावित्री बाई फुले, जोतिबा फुले, कबीर ,रविदास, कांशीराम जैसे बहुजन नायकों की याद को उत्सव के रूप में मना कर सम्मान दे रहे हैं ।यह भी स्पष्ट देखा जा सकता है कि प्रचुर मात्रा में बहुजन साहित्य छापा,बेचा व खरीदा तथा पढ़ा जा रहा है,जयपुर निवासी मिशनरी चिंतक,लेखक व प्रकाशक डॉ एम एल परिहार लाखों की तादाद में ‘जात पात का विनाश’ ‘बुद्ध व उनका धम्म’ तथा ‘डॉ आंबेडकर :लाइफ एन्ड मिशन’ जैसी किताबें छाप कर घर घर पहुंचा रहे है, अब हर प्रतिभा सम्मान समारोह व जातिगत आयोजनों तक मे प्रतिभागियों को बाबा साहब का साहित्य व भारत के संविधान की प्रति भेंट करने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है ।

इसी प्रकार की बहुतेरी गतिविधियां हो रही है जो ब्राह्मणवाद से दलित बहुजन समाज को मुक्त करने की दिशा में कारगर कदम साबित होने वाली है ,यह सांस्कृतिक दासता से मुक्ति का स्वतः स्फूर्त अभियान है,जो दिन ब दिन जोर पकड़ रहा है ।

– भंवर मेघवंशी

( सामाजिक कार्यकर्ता व स्वतन्त्र पत्रकार )

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