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'RTI -kaise aayi ' book released !

‘RTI कैसे आई’ पुस्तक लोकार्पित

सत्ता-परिवर्तन के साथ व्यवस्था कैसे बदले इस पर करनाहोगा काम: बाबा आढ़व

न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने के लिए आंदोलन करने की ली शपथ ! राजस्थान की जनता ने अपने घोषणा-पत्र के ज़रिए रखी अपने माँगे

राजस्थान के राजसमंद ज़िले के भीम के पाटियाँ का चौड़ा में हर वर्ष की भाँति एक मई को अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस पर मज़दूर मेला आयोजित किया गया। मेले में देश के विभिन्न भागों से आए लोगों ने मज़दूरों के प्रति अपनी एकजुटता प्रकट की। देश में एक सशक्त जवाबदेही क़ानून बनाया जाए, नरेगा को सुचारू रूप से चलाने, न्यूनतम मज़दूरी को उचित दर से बढ़ाने, राशन से ग़रीबों के काटे गये नामों को पुनः जोड़ने व खाद्य सुरक्षा क़ानून के तहत पारदर्शिता लाने सहित अन्य कई प्रस्ताव भी इस अवसर पर लिए गए। साथ ही ‘RTI कैसे आई’ पुस्तक का लोकार्पण हुआ और जनता की ओर से एक जन घोषणा-पत्र आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए जारी किया गया।

उल्लेखनीय है कि एक मई 1990 से लगातार ग़रीब, किसान एवं मज़दूर राजसमंद ज़िले के भीम में मज़दूर मेले का आयोजन करते आ रहे हैं। इस साल इस मेले को 28 साल पूर्ण हुए हैं। संगठन के नारायण सिंह ने बताया कि इस बार इस मेले की ख़ासियत रही कि पिछले दो दिन से भीम क्षेत्र की महिलाओं ने इस आयोजन की कमान सम्भाली। 30 अप्रैल की मोटर-साइकल रैली के बाद आज बड़ी संख्या में महिलाओं ने मेले में भागीदारी निभाते हुए शराबबंदी के लिए एकजुटता दिखाई। वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता नारायण सिंह ने बताया कि मेले में भीलवाड़ा व राजसमंद ज़िलों से आए सिलिकोसिस पीड़ितों ने भी हिस्सा लिया ,उन्होंने कहा कि प्रशासन ने सिलिकोसिस होने के प्रमाण-पत्र तो इन्हें दे दिए पर इलाज के लिए राशि अभी तक नहीं दी।

‘RTI कैसे आई’ पुस्तक का हुआ लोकार्पण

पूर्व प्रशासनिक अधिकारी व प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय एवं मज़दूर किसान शक्ति संगठन के साथियों द्वारा लिखी गयी पुस्तक ‘RTI कैसे आई!’ का लोकार्पण भी मेले में हुआ। अरुणा रॉय ने इस मौक़े पर कहा कि इस इलाक़े के लोगों ने सूचना के अधिकार आंदोलन की शुरुआत कई वर्षों पूर्व की। उन्होंने कहा कि ब्यावर में सूचना के अधिकार पर 1996 में 44 दिन का जो धरना दिया गया ,उस धरने के बाद ही सूचना का अधिकार एक राष्ट्र-व्यापी आंदोलन बना। यह पुस्तक RTI आंदोलन के इतिहास की ज़मीनी कहानी पर आधारित है। उन्होंने यह भी कहा कि देश में जो लोगों को बाँटने की राजनीति की जा रही है,उसे हमें नकारना होगा और तोड़ने की बजाय हमें समाज को जोड़ना होगा। इस आंदोलन से जुड़े हुए कई संघर्ष-शील कार्यकर्ताओं ने इस पुस्तक की प्रशंसा करते हुए आंदोलन के वक़्त बिताए हुए अपने अनुभवों को साझा किया।

निखिल डे ने कहा कि यह हमारे लिए गर्व की बात है कि इस पुस्तक में हमारे आंदोलन और संघर्ष के इतिहास को लिखा गया है। हमारे इस आंदोलन की वजह से ही सूचना के अधिकार जैसा क़ानून पास हुआ। इस क़ानून से ना केवल देश को बल्कि आम जन को भी फ़ायदा हुआ है और जनता को अपने हक़ों से सम्बंधित सवाल सरकारों से पूछने की ताक़त मिली है। वरिष्ठ महिला कार्यकर्ता एवं सूचना के अधिकार आंदोलन से जुड़ी सुशीला बाई ने कहा कि आंदोलन के वक़्त हमें कहा जाता था कि ये घाघरा पलटन औरतें क्या कर लेंगी लेकिन हम जैसी घाघरा पलटन औरतें अपने संघर्ष के बल पर देश में सूचना का अधिकार व रोज़गार गारंटी क़ानून ले आई।

स्वतंत्र पत्रकार व दलित नेता भँवर मेघवंशी ने कहा कि ऐसा पहली बार हुआ है कि जनता के संघर्ष के बलबूते कोई क़ानून आया और आज उस क़ानून से जुड़ी इस क़िताब का जनता के बीच में ही लोकार्पण किया जा रहा है, जो हर्ष की बात है। वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता बालूलाल ने कहा कि सूचना के अधिकार आंदोलन ने भ्रष्टाचार को रोकने में अहम भूमिका निभाई है और ये क़िताब निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा देगी।

व्यवस्था-परिवर्तन के लिए किया आह्वान

महाराष्ट्र के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता व हमाल पंचायत से जुड़े बाबा आढ़व ने पुस्तक के लोकार्पण के इस अवसर पर कहा कि यह पुस्तक एक आंदोलन का इतिहास है। मैं समझता हूँ कि इस जन-संघर्ष के माध्यम से आम जन के हाथ में एक आधुनिक हथियार आया है जिससे आप लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने आह्वान करते हुए कहा कि जैसे राजस्थान की परिपाटी रही है कि हर पाँच साल बाद यहाँ सत्ता-परिवर्तन होता है, लेकिन हमें सत्ता-परिवर्तन के साथ-साथ व्यवस्था कैसे बदले इस पर काम करने की आवश्यकता है।

पीयूसीएल की राष्ट्रीय महासचिव कविता श्रीवास्तव ने कहा कि आज देश में सत्ता में बैठे लोग देश की जनता को जाति और धर्म के आधार पर लड़ा रहे हैं ताकि वे सत्ता से ये सवाल ना पूछें कि बेरोज़गारी, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, खाद्य सुरक्षा और ऐसे अन्य मुद्दे आज भी क्यों राजनैतिक रस्साकशी की बलि चढ़ते जा रहे हैं और इन पर कोई ठोस काम नहीं हो रहा। उन्होंने दलितों और आदिवासियों पर हो रहे दमन को रेखांकित करते हुए कहा कि दो अप्रैल को दलित-आदिवासियों द्वारा किए गए आंदोलन को सरकार द्वारा बुरी तरह कुचल दिया गया।

असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों ने न्यूनतम मज़दूरी के लिए संघर्षकरने का लिया संकल्प

राजस्थान में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूरों ने जिनमें नरेगा, निर्माण, कमठा, घरेलू, रहड़ी-पटरी, खेतिहर आदि शामिल हैं,उन्होंने मिलकर पिछले वर्ष राजस्थान असंगठित मज़दूर यूनियन का गठन किया था। आज इस मेले में यूनियन से जुड़े सैकड़ों मज़दूरों ने न्यूनतम मज़दूरी जीने-लायक़ मज़दूरी किए जाने हेतु संघर्ष का ऐलान किया है। यूनियन के सचिव नोरतमल ने सभी मज़दूरों को शपथ दिलाई कि इस बार राजस्थान में उसी पार्टी को हम वोट देंगे जो पार्टी न्यूनतम मज़दूरी महँगाई के अनुसार बढ़ाएगी।

इस अवसर पर सूचना के अधिकार एवं अन्य जन-आंदोलनों से जुड़े रहे स्मृति-शेष साथी विजय नागराज, नीलाभ मिश्र एवं अमिताभ मुखोपाध्याय के योगदान को याद कर उनके काम को आगे बढ़ाने का संकल्प भी उपस्थित लोगों ने लिया।

वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता रेणुका पामेचा, ममता जैतली एवं तारा अहलुवालिया, विकलांग आंदोलन 2016 संघर्ष समिति के शरद शर्मा, राजस्थान कच्ची बस्ती महासंघ से गौरव, ‘निरंतर’ के सम्पादक रामप्रसाद कुमावत, वरिष्ठ पत्रकार गुंजल, पूर्व विधायक एवं मंत्री लक्ष्मण सिंह रावत, पी यू सी एल के डी. एल. त्रिपाठी एवं कई अन्य प्रबुद्ध नागरिकों ने भी उपस्थित लोगों को इस अवसर पर सम्बोधित किया।

इस मौके पर मजदूर किसान शक्ति संगठन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता मुकेश निर्वासित ,कमल टांक ,पारस बंजारा ,लक्ष्मी चौहान ,तेज सिंह , शिव सिंह नयाल ,ओ पी रे ,बजरंग लाल शर्मा ,लक्ष्मण सिंह ,शिशिर पुरोहित ,कमलेश वर्मा ,एफ इ एस के तेजेंद्र मीणा ,शंकर गर्ग ,बेयरफुट कॉलेज के निदेशक बंकर रॉय ,तेजा राम ,नोरती बाई ,राजकमल प्रकाशन के सत्यानन्द निरुपम ,प्रगतिशील लेखक संघ के ईशमधु तलवार सहित हजारों लोग मौजूद थे .

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