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RSS celebrated Ambedkar Jayanti in ajmer !

अजमेर में आरएसएस की अम्बेडकर जयंती !

- डाॅ गुलाब चन्द जिन्दल 'मेघ',अजमेर

( अजमेर में RSS द्वारा डाॅ अंबेडकर जयंती के अवसर पर “प्रबुद्धजन संगोष्ठी” आयोजित हुई।मेरा आग्रह है कि इस आँखों देखे कार्यक्रम की समीक्षा जरूर पढें। मुझे आज प्रातः संगोष्ठी में भाग लेने के लिए निमंत्रण पत्र दिया गया। मैं मेरे मिशनरी साथी डाॅ योगेश नरेनिया को भी साथ लेकर गया। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि संतश्री पाठक जी महाराज,अध्यक्षता प्रो.चेतन प्रकाश कड़ेला (अनुसूचित जाति), मुख्य वक्ता डाॅ नारायण लाल गुप्ता। आयोजक सुनील दत्त जैन महानगर संघचालक )

कार्यक्रम की समीक्षा –

मैं मेरी आदत के अनुसार निश्चित समय पर पहुँचा। मंच पर निर्धारित समय सांयः 5.30 से पूर्व मुख्य अतिथि, अध्यक्ष, मुख्य वक्ता और आयोजक विराजमान थे। आधा हाॅल भर चुका था। सही 5.30 पर उद्घोषक ने माइक संभाला। मंचासीन अतिथियों का बुके देकर सम्मान कराया। डाॅ अंबेडकर साहब की तस्वीर और भगवा ध्वज लिए भारत माता की तस्वीर रखी गई। दीप प्रज्वलन करने की रस्म नहीं की गई। मंच पर टेबल कुर्सी लेकिन सभी ने अपने जूते-चप्पल मंच से नीचे ही उतारे। एक छोटे से गीत के बाद तुरंत मुख्य अतिथि का उद्बोधन। सारगर्भित उद्बोधन लेकिन प्रेरक उद्बोधन।(अलग से समीक्षा) घड़ी डायस पर रखी। समय होते ही उद्बोधन समाप्त। समय सीमा लगभग 12 मिनट।

अध्यक्षीय उद्बोधन !

अध्यक्ष ने ‘जय जय सीताराम, जय जय सीताराम’ से उद्बोधन प्रारंभ किया। माननीय प्रधान मंत्री जी, शिक्षा राज्य मंत्री जी के कार्यों की मुक्त कंठ से प्रसंशा की। माननीय प्रधान मंत्री जी की शैली में ही कहा कि बाबा साहब की बदौलत ही मैं एक ‘जुलाहा’ आज यहाँ मंच पर हूँ। अंबेडकर जयंती से संबंधित कार्यक्रम है इस पर वे केन्द्रित नहीं रह सके। 10-12 मिनट के उद्बोधन में सरकार की प्रशंसा । राजकीय महिला काॅलेज का प्राचार्य हूँ, यह अध्यक्ष ने ध्यान रखा।

इस बीच हाॅल खचाखच भर गया। कही कोई आवाज़ नहीं। लगभग 700 व्यक्ति। सवर्ण समाज डाॅ अंबेडकर साहब के जीवन चरित्र को समझने में बहुत जागरूक है। यह साफ नज़र आया। बहुजन समाज बहाने बनाने में जागरूक है यह बार बार मैने देखा। मैं देखता रहा यह भीड़ कहाँ से आ रही है। लेकिन मेरे जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर बाकी सभी सवर्ण समाज के। यह लोग बाबा साहब को जल्दी समझना चाह रहे हैं। ताकी सटीक तर्क कर सकें।

कार्यक्रम के दौरान राजस्थान सरकार के दो मंत्री (श्रीमती अनिता भदेल, वासुदेव देवनानी) भी आये लेकिन कोई हलचल नहीं। उन्हें जहाँ जगह मिली बैठ गए। दर्शकों के बीच। कोई प्रोटोकाल औपचारिकता नहीं। बिलकुल सामान्य सहज पीछे। किसी को पता नहीं कि मंत्री जी पधार गये।

मुख्य वक्ता के उद्बोधन के बीच शुरूआत में पीछे से जय श्री राम के नारे लगे। लेकिन फिर चुप। शायद कोई इशारा कर दिया गया था।मुख्य वक्ता डाॅ नारायण लाल गुप्ता -RSS विचारधारा के अनुरूप डाॅ अंबेडकर साहब के व्यक्तित्व कृतित्व की अच्छी जानकारी है। भाषा और संप्रेषण अच्छा था। अंबेडकर साहब की शैक्षणिक उपलब्धियों की प्रसंशा की। उनके विद्यार्थी जीवन की कठिनाइयों का उल्लेख किया। छुआ-छूत भेदभाव वाली घटनाओं को बड़े सहज भाव से बताया।

किसी भी वक्ता ने (प्रो.चेतन प्रकाश कड़ेला ने भी) डाॅ अंबेडकर साहब के लिए भारत रत्न, संविधान निर्माता जैसे शब्दों का उपयोग नहीं किया। सभी ने परहेज किया। चवदार तालाब की घटना, टीफिन की घटना, पारसी धर्मशाला की घटना, नौकरी में फाइल फैंक कर देने की घटना को रेखांकित किया। अपने पूरे उद्बोधन में डाॅ गुप्ता ने अंबेडकर साहब को हिन्दू धर्म का समर्थक बताने का प्रयास किया। हिन्दू धर्म के कुछ पाखंडों से बाबा साहब को परेशानी थी इसके लिए वो लड़े। डाॅ गुप्ता ने यह बताने का प्रयास किया कि बाबा साहब दूसरे धर्मों के प्रति सकारात्मक नहीं थे। उन्हें हिन्दू धर्म प्रिय था लेकिन कुछ कमियों की वजह से वो नाराज रहते थे। बाबा साहब ने जीवन के अंतिम समय में बौद्ध धर्म ग्रहण किया लेकिन क्यों किया यह नहीं बताया। हाँ इतना कहा कि यह भी भारतीय धर्म था इसलिए ग्रहण किया। बौद्ध धर्म को वैज्ञानिक कसौटी पर परख कर ग्रहण किया था यह नहीं बता सके। संविधान निर्माण, आरक्षण, महिलाओं के अधिकार, आर्थिक उपलब्धि,हिन्दू कोड बिल पर चुप्पी साधी। कुल मिलाकर कर बाबा साहब को हिन्दू धर्म का जबरदस्त समर्थक बताने का प्रयास किया।

2 अप्रेल और 10 अप्रेल को खूब याद किया। यह दर्द बार बार नज़र आया कि बहुजन समाज और मुस्लिम समाज के बीच जो ध्रुवीकरण हो रहा है उससे संघ और सवर्ण समाज चिंतित है। मुस्लिम, ईसाई, पारसी, वामपंथ पर विशेष टिप्पणी की। यह भी चिंता व्यक्त करी कि यह अवधारणा बन रही है कि आर्य बाहर से आये हैं यह गलत है।आर्य भारत के ही निवासी हैं। यह बात कहने में बाबा साहब का सहारा भी लिया। मूलनिवासी और बाहरी की बात देश में चल रही है इससे संघ और सवर्ण समाज चिंतित है।
हिन्दू धर्म के धार्मिक ग्रंथों की नये सिरे से व्याख्या किए जाने की आवश्यकता बताई।

किसी भी वक्ता ने अंबेडकर जयंती की शुभकामना, बधाई नहीं दी। डाॅ गुप्ता ने अपने उद्बोधन में जय भीम शब्द का उपयोग कई बार किया लेकिन बहुजन समाज के प्रोफेसर तो चुप ही रहे।

मुख्य अतिथि संतश्री पाठक जी महाराज ने प्रेरक उद्बोधन देते हुए कहा कि यह दूरी क्यों हो रही है इस पर विचार और कार्य करने की जरूरत है। हमें वंचित वर्ग के पास जाना होगा। हमारे धर्म के दरवाजे पूरी तरह खुले रखने ही होंगे। आपने इन सब बातों के लिए समाज के साधु-सन्तों, पीठाधीशों को सबसे ज्यादा दोषी बताया। उन्होंने कहा कि आज हमारे साधु-सन्त, पीठाधीश अपने आश्रमों में ही रहते हैं उन्हें अपने आश्रमों मठों को सुविधा संपन्न बनाने की ही चिंता रहती है।समाज के दुख दर्द से वो दूर रहने लगे हैं। उन्हें आश्रमों से बाहर आकर वंचितों के बीच जाकर बैठना होगा। उनके दुःख दर्द में समान रूप से भागीदारी निभानी होगी।

कार्यक्रम लगभग डेढ घंटे में समाप्त हो गया। एक बात मुझे जबरदस्त लगी .अनुशासन और समय पालन। यही सबसे पहले बहुजन समाज को अंगीकार करना होगा। इसके लिए हमारे प्रबुद्ध वर्ग को आगे आना होगा।

( लेखक आलोचक ,चिन्तक और सक्रिय समाजसेवी है )

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