TISS में बहुजन छात्रों के आन्दोलन पर नीरज बुनकर की रिपोर्ट

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टाटा सामाजिक संस्थान में पिछले 9 दिनों से जो आन्दोलन चल रहा है, जो कि 21 फ़रवरी को शुरू हुआ था और अब तक जारी है. अगर हम इस आन्दोलन की तह में जाकर देखे तो पायेंगेकि ये आन्दोलन इसीलिए भी और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यह TISS जैसे देश के प्रतिष्ठित संस्थान में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े तबके के छात्रों द्वारा लड़ा जा रहा है जिन्हें वर्षों से उच्च शिक्षा से वंचित रखा गया है.

आखिर ये कैसा दोगलापन है ? जहाँ एक और TISS की स्थापना ही इस उद्देश्य को लेकर हुयी थी कि देश में जातीय शोषण झेल रहे, हाशिये पर रह रहे समुदाय से आने वाले छात्रों की उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारी मात्र में भागीदारी सुनिश्चित करके उन्हें शैक्षणिक रूप से मजबूत बनाना ताकि ये तबका समाज की मुख्यधारा में अपने प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित कर सके.वर्षों से संस्थान सामाजिक न्याय के सिद्धांत की दुहाई देता रहा है और इस पर कक्षा से लेकर सेमिनारो में बड़े-बड़े व्याख्यान देता रहता है.छात्रों का TISS प्रशासन से यहीं पूछना है कि आखिर सामाजिक न्याय दलित-बहुजनों के संदर्भ में कहाँ गायब हो जाता है ?

मौजूदा सरकार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे नियम-कानूनों को ला रही है जो कि प्रत्यक्ष रूप से बहुजन छात्रों को प्रभावित कर रहे है,इसी कड़ी में सरकार द्वारा TISS जैसे संस्थानों में उच्च शिक्षा में मिलने वाली छात्रवृति को बंद करके बहुजन छात्रों पर बहुत बड़ा हमला किया है.सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के छात्रों के उत्थान के लिए भारतीय संविधान में विशेष प्रावधान किए गए हैं,जैसे सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण और आर्थिक मदद के लिए स्कॉलरशिप का प्रावधान है.केंद्रीय सरकार के सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय द्वारा 1944 में लाई गई पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना, लंबे समय से अनुसूचित जाति/जनजाति (एससी/एसटी) तबके के छात्रों की आर्थिक रीढ़ रही है।

इससे हाई स्कूल से आगे की पढ़ाई करने में दलित और आदिवासी स्टूडेंट्स को आर्थिक मदद मिलती है.इन प्रावधानों को स्टूडेंट्स के हित में लागू करने की ज़िम्मेदारी राज्य की है। जबकि 2014-15 में 25 प्रतिशत शिक्षा बजट की कटौती विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के द्वारा की गई और 2017-18 के बजट की तुलना में 2018-19 के बजट में फिर से 4 प्रतिशत की कटौती की गई.

शिक्षा बजट में लगातार कटौती से एससी/एसटी स्टूडेंट्स सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं। टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) के छात्रसंघ ने स्कॉलरशिप बंद होने के बाद प्रबंधन से कई बैठकों में स्कॉलरशिप को चालू रखने की मांग की, जिसे TISS प्रबंधन ने स्वीकार नहीं किया.प्रशासन के द्वारा लगातार छात्रों द्वारा उठायी गयी मांगों को न मानने के कारण, TISS बंद है, जैसा आन्दोलन शुरू करने के लिए छात्रों को मजबूर होना पड़ा है. ये जो रवैया TISS प्रशासन और सरकार का इस तबके के प्रति है, इससे इनका मनुवादी होना साफ रूप से झलकता है,ये क़तई नहीं चाहते है की बहुजन उच्च शिक्षा में आये और पढ़-लिख कर अपने समाज का प्रतिनिधित्व करे,इसीलिए ये ब्राह्मणवादी सरकार बहुजन पर तरह-तरह के हमले करती हुयी नजर आ रही है.

प्रशासन द्वारा जिस तरीके से दलित छात्रों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का काम किया है, इसे देख कर लगता है कि ये कभी भी नहीं चाहती है कि दलित पढ़े-लिखे.एक तो समाज का ये सबसे निचला तबका जैसे- तैसे तमाम तरह की आर्थिक व सामाजिक असमानताओ से जूझकर शिक्षा के क्षेत्र में आगे आता है,यह आस लेकर की सरकार द्वारा उन्हें आर्थिक मदद मिल जाएगी,जो कि न तो भीख है और न ही किसी भी प्रकार की खैरात, ये तो इनका संवेधानिक अधिकार है जिसके लिए सरकार पूर्ण रूप से बाध्य है.फिर भी छात्रवर्ती देने में आनाकानी करना पूरी तरह से संवेधानिक मूल्यों का हनन है और दलित-बहुजन को शिक्षा से वंचित रखने व फिर से मनुवादी व्यवस्था स्थापित करने की बहुत बड़ी साजिश है.

पोस्ट–मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना के तहत बात करे तो हम देखते है कि अजा जजा समुदाय से आने वाला कोई भी छात्र जिसके परिवार की वार्षिक आय 2.5 लाख से नीचे है,उन्हें सिर्फ 4,500 रूपये भरने होते है,TISS में जब 2017-19 बैच ने प्रवेश लिया तब उनसे भी 4,500 रूपये ही लिये गये लेकिन जब छात्र दाखिले के लिए डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के लिए आये तो उन्हें लिखित में एक महीने का अल्टीमेटम थमाया गया.जिसमे लिखा हुआ था कि छात्र एक महीने के अन्दर पूरी फीस जमा कर देंगे,आखिर ये किस तरह के इंक्लूसिव एजुकेशन की बात करते है,जिसमे छात्रों को बिना किसी पूर्व सूचना के पूरी फीस भरने के लिए दबाव बनाया जाता है,जबकि संस्थान की वेबसाईट पर व प्रॉस्पेक्टस में दी गयी गाइडलाइन्स में इस तरह की जानकारी नहीं दी गयी,जिससे की SC/ST के छात्रों को पूरी फीस देनी पड़े,तो इस तरह हम देखते है की संस्थान द्वारा SC/ST छात्रों से 70,000 रूपये फीस की मांग करना पूरी तरह से गैर-क़ानूनी है.

आखिर जिस छात्र की पारिवारिक वार्षिक आय ही 20,000 रूपये से 50,000 रूपये के बीच में है,वो कैसे 70,000 रूपये फीस भर पायेगा,सामाजिक न्याय की आड़ में बेकार की जुमले बाजी करने से अच्छा है.दलित-बहुजन छात्रों को स्पष्ट रूप से मना कर दिया जाए की उच्च शिक्षा ग्रहण करना तुम्हारे बस का नहीं है और तुम इन संस्थानों में मत आओ,क्योकि इनकी फीस चुका पाना तुम्हारे बस की बात नहीं है,ताकि ये छात्र झूठी आशा में तो न रहेंगे.

जिस तरीके से 2015 में OBC(NC) को मिलने वाली आर्थिक सहायता को सरकार ने खत्म किया,जिसका असर इस वर्ग से आने वाले समुदाय पर इतना पड़ा कि जहाँ एक और 2014-15 में संस्थान में दाखिला लेने वाले कुल छात्रों में ओबीसी वर्ग के छात्रों का प्रतिशत 22 था.जो 2015-16 में घटकर 20 हो गया तो वहीं, 2016-17 में संस्थान में दाखिला लेने वाले ओबीसी छात्रों की संख्या घटकर 18 प्रतिशत ही रह गई,ये गिरावट साफ तौर पर दर्शाती है कि अगर सरकार का रवैया ऐसा ही रहा तो वो दिन दूर नहीं,जब बहुजन छात्र इस तरह के संस्थानों से बिलकुल गायब ही हो जायेंगे,जो कि मौजूदा सरकार चाहती भी है.

– नीरज बुनकर
(लेखक टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान,मुंबई के छात्र है )

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