इवीएम हटाओ, आरक्षण बचाओ !

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– दिलीप सी मंडल

बहुजनों के पास वोट के अलावा कुछ नहीं है. न न्यायपालिका, न प्रशासन, न यूनिवर्सिटी, न मीडिया. अगर वोट की ताकत को भी नहीं बचा पाए, तो फिर कुछ नहीं बचेगा.

इवीएम से बनी सरकार आरक्षण को खा जाएगी. उसे जनता के वोट की परवाह ही क्यों होगी, जब मशीन उसके पास है.उनके पास संख्या नहीं है, लेकिन वोटिंग मशीन है.

बीजेपी कुछ उपचुनाव या छोटे राज्यों के चुनाव में में विपक्ष को जिताकर उन्हें गाजर दिखाती रहेगी, ईवीएम की विश्वसनीयता का क्षद्म बनाए रखेगी और फाइनल मैच में गोल मार देगी.

अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, स्वीडेन, इटली, स्पेन, डेनमार्क, बेल्जियम जैसे विकसित देशों ने जिस ईवीएम को रिजेक्ट कर दिया है, उसके प्रति बीजेपी के प्रेम की वजह क्या है?

इवीएम से राष्ट्रीय स्तर पर वोटिंग भारत के अलावा सिर्फ एस्टोनिया, वेनेजुएला और ब्राजील में होती है. एस्टोनिया की आबादी 13 लाख है. वेनेजुएला भी छोटा देश है. वहां भी मशीनों पर सवाल उठ रहे हैं.

दुनिया का एक भी विकसित देश राष्ट्रीय चुनाव में ईवीएम से वोटिंग नहीं कराता. मशीन का जिस देश में आविष्कार हुआ और इसकी चिप जिन देशों में बनती है, वे सभी कागज से वोटिंग कराते हैं.

मशीनों की सबसे बड़ी खामी यह है कि वोट डालने वाले को पता नहीं होता है कि उसने जिसको वोट दिया है, वोट दरअसल उसी को गया है.

दूसरी बड़ी खामी यह है कि जिस तरह कागज पर हर वोट की दोबारा गिनती हो सकती है. मशीनों में वह सुविधान नहीं है और फिर मशीनी फर्जीवाड़े का खतरा तो है ही.

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