कुछ अप्रासंगिक लोगों से जुड़े प्रासंगिक अंश !

- राजेन्द्र राजन

228

समानांतर साहित्य उत्सव के आयोजन ने हमारी विवेक की आंखें भी खोल दी कि बौद्धिक क्रीतदास (मुक्तिबोध) के बारे मे सावधान रहो। ये भद्र मानुष अपने वर्गीय चरित्र के कारण बेईमानी, छल-कपट और चालाकी से बाज नहीं आयेंगे।

एक हैं अशोक वाजपेयी और दूसरे हैं ओम थानवी। दोनों ने हमारे इस आयोजन के प्रति पहले समर्थन दिया, फिर प्रतिभागी होने की स्वीकृति दी, लेख लिखे, लेकिन यह सब उनकी चालाकी थी।

अपने भद्र लोक में भाव बढाने की चाल थी।यही हुआ, अन्तिम दौर मे इनके नकाब उतर गए।स्वयं ने भीष्म बनकर ऐलान किया कि अमुक आदमी वहां है, नहीं जाऊंगा और मोबाइल से फोन कर यहां आ रहे लेखकों को आने से रोकने लगे।कहावत सही हो गई- दो पैसे की हांड़ी मारी गई…।

यहां पहुंचने बालों ने इसकी चर्चा की। इससे भी आगे बढकर इनने हमारे अन्दर और भाईचारे के संगठनों के भीतर गलत फहमी पैदा करने की कुचेष्टा की। ऊपर भलै ही कुछ असर हुआ हो, नीचे बुनियाद मजबूत बनी रही।

यही कारण है कि यह पाती उनके नाम है कि भाई, बिकने से पीछे न रहो ,हम और बुलंद होकर बढने का साहस पैदा करेंगे।
साथ के दोस्तों को सलाम और उन्हें धन्यवाद कि अंधेरे के कारण ही रोशनी की अहमियत बनती है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.