आम जन का मीडिया
Reject me from this country

मुझे इस मुल्क से ख़ारिज कर दीजिये

- भंवर मेघवंशी

इस बुतशिकन समय मे ….!

आजकल मेरी सांस घुटने लगी है ,जैसा माहौल हमारे देश मे बनाया जा रहा है ,मुझे उससे भारी निराशा होने लगी है ,सोचता हूँ कि क्या इसी भारत की कल्पना हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने की थी ,क्या यही है सुभाष ,भगतसिंह ,महात्मा गांधी ,नेहरू और बाबा साहब अम्बेडकर के सपनों का भारत ? क्या इसी के लिए लोग जैल गए थे ,क्या इसी देश के लिए लोग फांसी के फन्दों पर झूले थे । क्या इसी तरह का भारत उन्हें बनाना था ?

माफ़ किजिएगा ,मेरी बातें आपके लाल ,पीले ,नीले ,भगवा टाईप के राष्ट्रवाद को आहत कर दें तो ,क्योंकि इस वक़्त भारत एक गंभीर अराजकता की तरफ अग्रसर है ,कहीं भी भारतीयता का कोई भाव नज़र नही आता ,सर्वत्र अपनी विचारधारा ,अपने संगठन, अपनी जाति ,अपना धर्म ,अपना पंथ ,अपना डेरा ,अपना मिशन । सबके अपने अपने झंडे ,डंडे और फंडे है ,देश भाड़ में जाये ,किसको उससे मतलब !

देश राग अलापने वाले भी द्वेष राग का अलाप रहे है ,हर मजहब और जाति की अपनी सेनाएं बन चुकी है ,भारत नामक राष्ट्र राज्य की नांव डांवाडोल हो कर बीच मझधार में हिचकोले खा रही है ,लोकतंत्र अब ठेंगे पर है ,संविधान सिर्फ सजावटी वस्तु बन चुका है ,कुछ लोगों के पास तमाम सत्ताएं सीमित हो चुकी है ,धर्म सत्ता ,राजसत्ता और अर्थसत्ता पर महज 5 फीसदी लोग काबिज़ है ,शेष 95 फीसदी जनता मूर्खता की पराकाष्ठा पर पँहुच कर हिन्दू- मुसलमान , सवर्ण -अवर्ण , विदेशी- मूलनिवासी जैसी बकवास का जाप कर रही है ।

देश का विमर्श सफेद झूठ पर अवलम्बित है , तथ्यविहीन तथ्यों की निर्मिति के लिये झूठ की फैक्टरियां अनवरत काम कर रही है ,नफ़रत की फ़सल लहर लहर लहरा रही है, इंसान तो अब इस देश मे कोई बचा ही नहीं हैं ,नागरिक भी नहीं बचे है ,महज़ अपने अपने दड़बों से बांग लगाने वाले जीव जंतु बच गये है ।

लोगों के मस्तिष्क आश्चर्यजनक रूप से कहीं गिरवी पड़े परिलक्षित होते है ,तर्क की जगह कुतर्क तो बहुत आम बात है ,इसकी तो अब कोई बात भी नहीं करता ,इसे तो करप्शन की तरह आम स्वीकार्यता प्राप्त हो गई है ।

यह मूर्तिभंजक समय है ,सुदूर त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा पर बुलडोजर चल चुका है, तमिलनाडु में पेरियार की मूर्ति को क्षति पंहुचाई गई है ,डॉ आंबेडकर की मूर्तियां तोड़ने का सिलसिला तो चलते ही रहता है ,गांधी की मूर्ति को भी सगर्व तोड़ा गया है ,और भी कईं इतिहास निर्माताओं के स्टेच्यू यदा कदा तोड़े ही जाते रहते है ,अकेले तालिबान ही थोड़े है बामियान में बुध्द की प्रतिमा ध्वस्त करने को ..यहां गली गली में तालिबानी मानसिकता के लोग घूम रहे है ,मूर्तियां तोड़ना तो हमारे मन मस्तिष्क और चेतन अवचेतन में चल रही विचार व योजनाओं का फलीभूत होना मात्र है ,अभी तो प्रस्तर प्रतिमाएं टूट रही है ,इन जड़ मूर्तियों के टूटने से पहले हमारे भीतर का बन्धुत्व और भारतीयता की भावनाओं की हो चुकी दर्दनाक मौत पर हमें स्यापा करना चाहिये।

मूर्तियां टूटने का जश्न और शोक दोनों ही जारी है, जब एक विचारधारा के प्रतीक का स्टेच्यू गिरता है तो दूसरी विचारसरणी के लोग गर्व करते है,तालियां पीटते है ,मूर्तिभंजकों को नायक बना लेते हैं , बुतशिकनी का ऐसा आनंद तो औरंगजेब के वक़्त में भी नहीं लिया गया होगा,जैसा मज़ा आज लूटा जा रहा है ।

बुद्ध ,कबीर ,फुले ,अम्बेडकर के अनुयायियों को भी आजकल इस तरह की मुर्खताएं करते देख रहा हूँ ,कहीं किसी की आस्था के प्रतीक तस्वीरों पर जूते बरसाते , पोस्टर फाड़ते ,मूर्तियां तोड़ते ,भगवे झंडे जलाते ,देवी देवताओं को गालियां देते पोस्टें वायरल होती देख कर लगता है कि बहुजन नायकों के विचार को शायद हमने समझने में भारी भूल कर दी है ,यह अराजकता तो बाबा साहब की विरासत नहीं है ,यह सब करने की इजाज़त तो संविधान नहीं देता है,जय भीम बोलते हुए किसी की आस्था को आहत करना किस तरह की प्रतिक्रिया को जन्म देगा कभी हमने सोचा है ?

क्या हमने यह सोचने की कभी जहमत उठाई है कि हम कैडर की आड़ में कैसी अधकचरी समझ लोगों के दिमागों में भर रहे है ,कभी सोचिएगा ,कितनी नफरत भरेंगे हम अपने अंदर ,जो समुदाय हज़ारों साल नफ़रत के शिकार हुए हो ,उनको घृणा की राजनीति से खुद को दूर रखकर नया वैकल्पिक व्यवहार और व्यवस्था देनी चाहिए थी ,क्योंकि इंसान और इंसान के मध्य घृणा रचना ही तो मनुवाद है ।

नफरत ,ऊंच नीच ही तो हमें बेहतरीन इंसान और सभ्य नागरिक नहीं बनने दे रहा है और हम भी वही किये जा रहे है,यह तो एक ही साथ मनुवादी और अम्बेडकरवादी हो जाने जैसा है ?

जरा ठंडे दिमाग से अपने भीतर की नफ़रत को महसूस कीजिये और उससे उबरने की तरफ आगे बढिये , क्योंकि नफरतों के साये में कोई भी सभ्यता या राष्ट्र विकसित नहीं हो सकता !

अगर घृणा का विकास ही आपका राष्ट्रवाद और सबका विकास है, तो मैं इस नफ़रतजदा मुल्क से खुद को खारिज़ किये जाने की दख्वास्त करता हूँ …! कृपया मुझे देश निकाला दे दीजिए ,इतनी नफ़रत मुझसे बर्दाश्त नहीं होती ।

( लेखक शून्यकाल के संपादक है )

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