आम जन का मीडिया
"Raniwada's wounds are shedding our soul ...!"

“ रानीवाड़ा के जख्म हमारी रूह से रिस रहे है …!”

( राजस्थान में दलित आदिवासी दमन )

राजस्थान के दक्षिण भाग में स्थित है जालोर जिला ,उसका एक ब्लॉक है रानीवाड़ा ,जहाँ पर विगत कुछ बरसों से दलित युवाओं में काफी जागृति आई है ,इस सामन्तवादी और अत्यंत जातिवादी इलाके में दलित और आदिवासियों में आ रही चेतना सवर्ण जातिवादी तत्वों को कभी रास नहीं आई,वे सदैव उनके मान का मर्दन करने की फिराक में थे…और उन्हें यह मौका मिल गया 2 अप्रेल 2018 को .
2 अप्रेल के भारत बंद के दौरान रानीवाड़ा में सब कुछ शांतिपूर्ण चल रहा था ,लेकिन जातिवादी तत्वों ने पुलिस के साथ मिलकर प्रदर्शनकारियों के साथ हिंसक झड़पें की ,उकसावे की कार्यवाही को अंजाम दिया गया ,उपद्रवियों ने दलित प्रदर्शनकारियों पर हमले किये ,वे इतनी नफरत से भरे हुये थे कि उन्होंने पुलिस उपाधीक्षक कार्यालय के सामने स्थित बाबा साहब अम्बेडकर की प्रतिमा को निशाना बनाया , मूर्ति पर पेट्रोल छिडक कर आग लगा दी और प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किया गया ,जब यह खबर शांतिपूर्ण तरीके से बंद करवा रहे दलित आदिवासी लोगों को मिली तो उनका भडकाना स्वाभाविक ही था,इसके बाद छिटपुट झड़पें हुई .

पुलिस ने दमनकारी नीति अपनाते हुये 2 अप्रेल की शाम तक उपद्रव के नाम पर 99 लोगों को गिरफ्तार कर लिया,जिनमें से 19 को आरोपी बना कर अंदर ही रखा गया,बाकी लोगों को छोड़ दिया गया ,जो लोग गंभीर आपराधिक धाराओं में नामजद कर दिये गये ,उन पर पुलिस अभिरक्षा में गंभीर शारीरिक हिंसा की गई .बाद में उन्हें जेल भिजवा दिया गया . करीब 11 सरकारी कर्मचारी आज भी जेल में है ,उनको जानबुझकर चिन्हित करके फंसाया गया है ,उनके साथ पुलिस कस्टडी में भयानक यातनापूर्ण व्यवहार किया गया है .गिरफ्तार सरकारी कर्मचारियों में अशोक परमार ,मंशाराम मेघवाल ,सवादाराम ,ओमप्रकाश मेघवाल ,नेहरु राम,कांतिलाल ,लालाराम ,शांतिलाल जीनगर ,जैसाराम मेघवाल ,गणेशाराम और सालाराम है .

रानीवाड़ा में सैंकड़ों दलित प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध 6 मुकदमें दर्ज किये गये है,जिनमें से कई लोग गिरफ्तारी के डर से गाँव छोड़ कर अन्यत्र चले गये है ,ऐसे दर्जनों लोगों ने मुझे बताया कि वे इन दिनों ‘फरारी’ काटने को विवश हैं .आज भी रानीवाड़ा के गाँव गाँव में डर पसरा हुआ है.जो 19 लोग अभी भी जेल में है ,उनको रानीवाड़ा से 500 किलोमीटर दूर जैसलमेर जेल में रखा गया है ,क्या ये लोग दुर्दांत आतंकी है जो इनको पांच सौ किलोमीटर दूर भेजा गया है ? क्या सरकार नहीं चाहती है कि उनके परिजन उनसे मिल पाये ,उनकी बात सुन पायें ? पता चला है कि निचली अदालत ने उनकी जमानत याचिका ख़ारिज कर दी है ,अब मामला हाईकोर्ट जोधपुर में है ,जहाँ अगली सुनवाई 1 मई को है.

आखिर यह हो क्या रहा है ? क्या दलितों को अपना विरोध प्रकट करने का अधिकार भी नहीं है इस देश में ? रानीवाड़ा के दलित आदिवासियों ने क्या गलती कर दी ? क्या इस देश में पहली बार बंद बुलाया गया है ? क्या पहली बार लोग सडक पर निकले है ? क्या लोग एक फिल्म के खिलाफ हाल ही में नंगी तलवारें लहराते हुये सड़कों पर नहीं थे ,क्या कुछ लोग अपनी मांगों को लेकर रेल की पटरियां नहीं उखाड़ रहे थे ? उनके प्रति कभी इतनी क्रूरता दिखाई गई कभी ?

भारत बंद तो साल में कई बार होता है ,लेकिन गोलियां नहीं चलती ,लाठीचार्ज नहीं होते ,आंसू गैस के गोले नहीं बरसाए जाते ,क़त्ल की कोशिस के मामले दर्ज नहीं होते ? पुलिस अभिरक्षा में थर्ड डिग्री इस्तेमाल नहीं होती ? मगर यह सब दलित आदिवासी प्रदर्शनकारियों पर किया गया .अब तक तो यही देखा गया कि हर बंद में व्यापारी खुद आराम से बंद का समर्थन करके चुपचाप घरों में दुबके रहते है या समर्थन में खुद ही बंद करवाते है ,पुलिस भी बंद करवाने में सहयोग करती है ,मगर दलित आदिवासियों के पहले भारत बंद में पुलिस बंद को विफल करने में लगी थी ,बंद समर्थको पर लाठियां ,गालियाँ और गोलियां बरसा रही थी ,सवर्ण जातिवादी गुंडों के साथ मिलकर निहत्थे प्रदर्शनकारियों को मार रही थी .यह कैसा दोहरा चरित्र है बाजार ,सवर्ण हिन्दू समाज और पुलिस तथा प्रशासन का ?

रानीवाड़ा में जो राजस्थान की सरकार ने किया है ,वह सबको पता चल रहा है ,जो पुलिस ने किया है ,वह ज्यादा दिन छिपा नहीं रहेगा ,जो सवर्ण जातिवादी तत्वों ने किया ,उस दमन को याद रखा जायेगा .राज्य ने जिस तरह से दलितों को सबक सिखाने की ठान रखी है ,जिस तरह चुन चुन कर दलित समुदाय के जागरूक लोगों को फंसाया जा रहा है ,उनकी धर पकड़ की जा रही है ,उनको मारा जा रहा है ,वह दिल दहला देने वाला घटनाक्रम है ,इसकी चारों तरफ निंदा होनी चाहिए .

रानीवाड़ा के दमन का प्रतिकार आवश्यक है ,इसका शांतिपूर्ण जवाब जरुरी है ,जिस बाजार ने दलितों को बर्बाद कर रखा है ,उस बाज़ार से नमक की थैली भी नहीं खरीदी जानी चाहिए ,इस उत्पीडन करने वाले बाज़ार का बहिष्कार किया जाना चाहिये ,जो बाजार हमारा विरोधी है ,हम उसके समर्थक कैसे हो सकते है ,जिस बाजार से हम 365 दिन सामान खरीदते है ,उससे सिर्फ एक दिन हमारा बंद बर्दाश्त नहीं हुआ ,जो बाजार हमारी खरीद फरोख्त से फलता फूलता है ,वह हमको मटियामेट कर देना चाहता है ,हमें इस बाजार का सम्पूर्ण आर्थिक बहिष्कार कर देना होगा ,जो लोग हम पर हमला कर रहे है ,मार रहे है ,जिनकी लाठियां हमारे जिस्म को जख्मी कर रहे है ,उनको वार्ड पंच से लेकर सांसद तक किसी भी चुनाव में वोट मत दीजिये ,नोटा का बटन दबा आईये पर जुल्मियों को वोट मत दीजिये .

रानीवाड़ा के अम्बेडकरी मिशन के साथियों के शरीर पर लगी एक एक लाठी हमारी रूह को जख्मी किये हुये है ,हम इसे भूलेंगे नहीं ,हम इसका पूरा हिसाब लेंगे ,हम जालिमों को कभी माफ़ नहीं करेंगे .

रही बात जेलों में बंद साथियों की ,तो उन्हें देर सवेर जमानतें मिल ही जाएगी ,वे जल्दी ही हमारे बीच होंगे ,वे दलित मुक्ति संग्राम के जाबांज सिपाही है ,उनके लिये वंचित मूलनिवासी समाज पलकें बिछाएगा और पीढियां उनकी ऋणी रहेगी क्योंकि उन्होंने अपने निजी स्वार्थ के लिये नहीं बल्कि अपने वर्ग के हितों और अधिकारों की रक्षा के लिये लाठी गोली खाई और जेल की यातना भुगती है ,वे दलित मुक्ति के इतिहास में स्वाधीनता सैनानी के रूप में आदृत होंगे,याद किये जायेंगे . हमारे संघर्ष का इतिहास पांच हजार साल का है ,हम जालिमों से कभी नहीं हारे है और कभी नहीं हारेंगे ,ये लाठी ,गाली ,गोली और जेलें हमें क्या रोक पायेगी ?

– भंवर मेघवंशी
( स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता )

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