‘छठी कतार’ में राहुल !

सरकार की नियत और नियमों पर उठे सवाल ( प्रमोदपाल सिंह )

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नई दिल्ली के राजपथ पर आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह इस बार महज इसलिए चर्चा में रहा कि राहुल गांधी किस कतार में बैठे थे। पहले राहुल गांधी को चौथी कतार में बैठाने की खबर आयी थी। लेकिन देश नेे लम्बे अरसे तक देश पर सत्तासिन रही सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को ’छठी कतार’ में बैठते देखा और गणतंत्र दिवस पर मीडिया ने इसे बड़ी खबर बनाया।

जहां कांग्रेस ने नरेन्द्र मोदी पर परम्पराओं को दरकिनार करने का आरोप लगाया और इसे ’ओछी राजनीति’ करार दिया।। वहीं, इससे उठे विवाद के जवाब में बीजेपी प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने कहा कि राहुल गांधी वीआईपी एरिया में बैठने लायक नहीं है और हमने उन्हें सम्मान दिया है। नरसिम्हा राव ने इसके पीछे नियम और परंपरा का हवाला दिया। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी ने पूछा कि भाजपा अध्यक्ष रहे राजनाथसिंह और नितिन गडकरी को कहां बैठाया जाता था? प्रवक्ताओं के जवाब में नियम,परम्परा और नियत सामने आ गई। छठी कतार में बैठने को लेकर सोशल मीडिया पर तंज से लेकर रंज तक की बातें उठी। लेकिन इन प्रवक्ताओं ने बयान में यह बात नही कही गई कि अब तक सोनिया गांधी को पहली कतार में कैसे बैठाया जाता रहा।

देश में ऐसा पहली बार हुआ हैं कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को पहली कतार में जगह नही मिली। इससे सियासत गर्मा गई। लेकिन खबरों की माने तो एसपीजी ने इसके लिए सरकार से अपील की थी। एसपीजी ने सुरक्षा की खातिर चौथी कतार की बजाय छठी कतार में बैठाने की अपील की थी। एसपीजी का मानना था कि कोई घटना होने पर छठी कतार से उन्हें निकालना ज्यादा आसान होगा। अब छठी कतार में राहुल गांधी की सरकार ने उन्हें बैठाया था या एसपीजी ने? सवाल अपनी जगह ही कायम हैं। राहुल गांधी जिस दीर्घा की छठी कतार में बैठे दिख रहे थे। उसी दीर्घा में अगली कतारों पर नजर ड़ाली जाए तो केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, थावर चंद्र गहलोत उनसे चार पंक्ति आगे बैठे दिखे। कई बच्चे भी राहुल गांधी से आगे बैठकर राजपथ पर निकल रहे झांकी से आनन्दित हो रहे थे। हो सकता हैं कि सुरक्षा और प्रॉटोकाल के बीच भी कश्मकश रही हो।

लेकिन इसके इतर कांग्रेस ने कहा कि हमारे लिए संविधान का उत्सव ही सर्वप्रथम है। किसी मेहमान अथवा किसी कार्यक्रम की वजह से यह राष्ट्रीय पर्व चर्चा में रहता तो ज्यादा सुखद होता। परन्तु यह पर्व इसलिए चर्चा में रहा कि राहुल गांधी को कौनसी सीट पर बैठने को मिली। इससे राहुल का अपमान हुआ या जनता की नजरों में चढे? लेकिन लोकतंत्र के इस महापर्व में विरोधी दल को सम्मान देने की संस्कृति जरूर टूटी हैं। क्या इसी तरह से भाजपा ’कांग्रेस मुक्त’ भारत का सपना देख रही है? राहुलगांधी अपनी सक्रियता से कांग्रेस को कितना फायदा दिला पाते हैं। यह भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन भाजपा की नकारात्मकता उनके लिए थाली परोसे मौजूद खड़ी हैं। याद करें,आपातकाल में जनता पार्टी ने कांग्रेस के विरोध में लगातार नकारात्मकता फैला रखी थी इस नकारात्मकता ने इंदिरागांधी को खड़ा करते देर नही की थी। बेहतर होता कि राजनाथसिंह और नितिन गड़करी को मिले सिटिंग अरेंजमेंट का तर्क देकर सियासी रंज दिखाने की बजाय विरोधी दल को सम्मान देती। ऐसा न कर लोकतांत्रिक मूल्यों को सह्रदयता से विकसित करने का एक सुअवसर केंद्र सरकार ने खो दिया।

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