‘ग्यारसी बुआ ‘ जैसे लोग कभी नहीं मरते !

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(लखन सालवी)
उसने सामाजिक बंधनों को तोड़ा, कच्ची टापरी की दहलीज लांघी, रात में 4-4 किलोमीटर पैदल चलकर रात्रि शाला में शिक्षा से जुड़ी। हस्ताक्षर करना सीख कर प्रमाणित साक्षर बनी। यहां उसने “ले मशाले चल पड़े है लोग मेरे गांव के, अब अंधेरा मेट देंगे लोग मेरे गांव के” गीत सुना और इन दो लाइनों को आत्मसात कर समाज में व्याप्त अंधेरे को मेटने निकल पड़ी। इस शाला में शिक्षित होकर उसने ऐसे संदेश दिए कि वो महागुरु बन गई। हार्वर्ड के प्रोफेसर उसके जीवन की यात्रा को समझने आने लगे, विश्व विद्यालयों में उसका जीवन संघर्ष व सफलता की कहानी पढ़ाई जाने लगी। हिन्दी की तहलका मैगजीन से लेकर अंग्रेजी के “THE HINDU” अखबार के पत्रकार आदिवासी ग्यारसी बाई सहरिया के साक्षात्कार करने लगे। उसकी जीवन यात्रा हमें समाज कार्य की, धैर्य की व संघर्षों की सीख देती है।
ग्यारसी बुआ के इस दुनिया से रूखसत हो जाने की सूचना मिलते ही ऐसा लगा, जैसे “मां” चली गई, प्रेरणा का स्त्रोत चला गया, शक्ति का पूंज क्षीण हो गया। मेरे गांव से 225 कि.मी. दूर जब मैं किशनगंज-भंवरगढ़-शाहबाद रहा, तब ग्यारसी बाई सहरिया से मुझे “मां” जैसा प्यार मिला। एक कमरे के कच्चे घर में आधी जिंदगी गुजारते हुए ऐतिहासिक सामाजिक कार्य उसने किए और दो स्वयंसेवी संस्थाओं की नींव बन गई। हालांकि ताउम्र उसने स्वीकार नहीं किया कि वो संस्था की नींव है। नि:स्वार्थ भाव से सहजवृत्ति से किए उसके कामों से मुझे उससे लगातार प्रेरणा मिलती रही। उसके सामाजिक कार्य, आदिवासी समुदाय के लोगों को जागरूक करने के अभियान व शोषित व वंचित समुदाय के मसलों पर संघर्षों व बेबाकी से शक्ति मिलती रही।
सूचना का अधिकार व महानरेगा कानून बनवाने की मांग को लेकर किए गए आंदोलन, कानून बना दिए जाने के बाद उन्हें क्रियान्वित करने के लिए किए गए आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। किशनगंज-शाहबाद के जंगल-जमीन, पेंशन, बंधुआ मजदूरी सहित सैकड़ों मुद्दों पर ग्यारसी बाई ने बेबाकी से खूब काम किया।
2009-2010 में वो बंधुआ मजदूरों को जमींदारों के चंगुल से मुक्त कराने के अभियान में जाग्रत महिला संगठन का नेतृत्व कर रही थी। किसी जमींदार के वहां बंधुआ मजदूर होने की प्रमाणिक सूचना मिलने पर संस्था-संगठनों के लोग प्रशासनिक अधिकारियों से मिलकर शिकायत करने से डर रहे थे, तब ये बीड़ा ग्यारसी बाई ने उठाया और अपनी महिला साथिनों के साथ प्रशासनिक कार्यालय में जाकर अधिकारी से शिकायत की।
अब तक किशनगंज व शाहबाद तथा बारां में रहे शायद ही ऐसे कोई प्रशासनिक अधिकारी हो, जिनसे ग्यारसी बाई का पाला न पड़ा हो। इनमें से ज्यादातर अधिकारी ग्यारसी बाई को कोसते थे। जन समस्याओं के समाधान के लिए मुद्दे उठाने वाली ग्यारसी बाई को सम्मान देने वाले अधिकारी कम ही थे। वैसे उसे कहां सम्मान चाहिए था। उसे तो बदलाव चाहिए था, जो उसने हजारों महिलाओं को संगठित करके तथा उन्हें सशक्त बनाकर कर दिखाया। अन्यथा आजादी के बाद से ही बंधुआ मजदूरी कर रहे परिवारों को विमुक्त करवाना दुष्कर कार्य था।
ग्यारसी बुआ के बारे में जितना लिखा जाए उतना कम है।
जिनकी वजह से ग्यारसी बाई बेबाक, निर्भिक और जागरूक नैत्री बन पाई उन स्व. मोती जी, महेश जी, लवलीन जी, चारू मित्रा जी, नीलू जी का भी बहुत बहुत आभार।
साथ ही सूचना एवं रोजगार का अधिकार अभियान राजस्थान के अरूणा रॉय जी, निखिल डे जी व शंकर सिंह जी का भी बहुत आभार जिन्होंने सुदूर गांव की ग्यारसी बाई के संघर्ष को हॉल ऑफ फेम किया। ग्यारसी बाई को कई अवॉर्ड भी मिले। सत्यमेव जयते के एपिसोड़ में भी उसके संघर्ष को दिखाया गया। वहीं हॉर्वर्ड में उसके चैप्टर पढ़ाए जाते है। ग्यारसी बुआ नहीं मरी, वो जिन्दा है, आबाद है . . . जिंदाबाद . . यह जानकर मन को शांति मिली कि बुआ की तबीयत खराब होने के बाद से अस्पताल ले जाने तक मेरे साथी फिरोज खान भी  साथ रहे, उन्हें बुआ की सेवा का अवसर मिला।
( फोटो क्रेडिट – लखन सालवी )

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