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Pakoda Politics

पकौड़ा पॉलिटिक्स: शब्दों पर नही,मुददो पर हो बात

-प्रमोदपाल सिंह

पीएम नरेन्द्र मोदी के मुख से ’पकौडा’ शब्द निकलते ही पूरे देश की राजनीति ’पकौडा-पकौड़ा’ हो गई। देश में आजकल मुद्दों पर नही,बल्कि शब्दों पर ज्यादा बयानबाजी हो रही हैं। एक न्यूज चैनल ने इण्टरव्यू में मोदी से पूछा था कि उनकी सरकार रोजगार के कितने अवसर उपलब्ध करा रही हैैं। मोदी का जवाब था कि आपके दफ्तर के निचे पकौड़े बेच रहा हैं। क्या वो आपकी नजर में रोजगार नही है। पीएम का इतना कहना भर था कि सोशल मीडिया से लेकर सियासत के गलियारों में ’पकौड़ा पॉलिटिक्स’ शुरू हो गई। ’पकौड़ा’ इस समय देश के विकास, महंगाई, बेरोजगारी, पेट्रोल-डीजल इत्यादि सभी मुद्दों पर भारी पड़ रहा है।

विपक्षी दल इसे भुनाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने कई शहरों में पकौड़ों के स्टॉल लगाए और पीएम द्वारा बेरोजगारी का उपहास करने का विरोध किया। अगर बात यहीं तक थम जाती तो गनिमत थी। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने राज्यसभा में पहली बार बोलते हुए विपक्ष की ’पकौड़ा’ पॉलिटिक्स’ पर कहा कि पकौड़ा बेचना कोई शर्म की बात नहीं है। यह कम से कम बेरोजगारी से तो अच्छा ही है। उन्होंने कहा कि इसी छोटे धंधे से आने वाली पीढी उद्योगपति भी बनेगी। उन्होंने कहा कि इस देश में चाय वाला भी पीएम बना हैं।

कहा तो यह गया कि धंधा छोटा हो या बड़ा। वो भी हैं तो रोजगार ही। लेकिन विपक्षी दल भी अगर इस बात को उछाल रहे थे तो इसके पीछे देश में बढ़ती बेरोजगारी और वादे के मुताबिक रोजगार के अवसर मुहैया न हो पाना भी तो एक बड़ा मुद्दा हैं।

जब देश में कार्य करने वाली जनशक्ति अधिक होती है किंतु काम करने के लिए राजी होते हुए भी बहुतों को प्रचलित मजदूरी पर कार्य नहीं मिलता, तो उस विशेष अवस्था को ’बेरोजगारी’ कहा जाता हैं। मारवाड़ इलाके में पकौड़े को भजिया कहते हैं और बेकार व्यक्ति को उपहास करने के अर्थ में भी कहा जाता हैं कि ’बैठे बैठे भजिया तलेगा क्या?’ अब जब पीएम ने भले ही बेरोजगारी से अच्छा पकौड़ा बेचना बताया हो। लेकिन न्यूज चैनल,विपक्ष और युवा बेरोजगारों का भी सवाल भी तो यही हैं कि आखिर कब तक वे पकौड़ा बेचेंगे? उनकी शैक्षणिक,प्रशैक्षणिक व तकनिकी योग्यता के बावजूद अब उनके पास खाली बैठे-बैठे पकौड़ा तलना और बेचना ही रह गया हैं। क्या उन्हें अपने ज्ञानार्जन के बाद कौशल बताने के लिए पकौड़े बेचना ही रह गया हैं।

हालांकि पकौड़ा व चाट देश भर में लाखों मेहनतकश लोगों का रोजगार बना हुआ हैं। सोलहवीं सदी में पकौड़ा विश्व भर में फैल गया। पकौड़ा विश्व को भारत की ही देन हैं। स्पेन और पुर्तगाल के नाविक भारत से लौटते वक्त अपने साथ कुछ रसोइयों को ले गए थे। इन्होंने यूरोपीय लोगों को पकौड़ा बनाकर खिलाए। कुछ रसोइये मार्ग में जापान रुक गए। उन रसोइयों ने यूरोपीयों,जापानियों को पकौड़ों का स्वाद चखाया, जो उन्हें बहुत पसंद आया। आज भी पकौड़ा सभी की पहली पसंद हैं। आज देश के हर गली-मौहल्लों नुककड़ पर चाट का ठेला दिखाई दे जाएगा। लाखों चूल्हें इन्हीं ठेलों की वजह से जल रहे हैं। कई पकौड़ा बनाने वाले तो अब बड़े ब्रांड बन चुके हैं।

देश महंगाई, बेरोजगारी, पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतों, जातिगत राजनीति आदि समस्याओं से जूझ रहा है। अगर जिम्मेदार देश को शब्दों में न उलझाकर मुद्दों पर बात करें तो न केवल समस्याओं का हल होगा,बल्कि देश का भी भला होगा। वरना विपक्ष तो चुनाव से पहले जितने मुद्दे भुना सकता हैं,भुना ही रहा हैं।

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