एससी एसटी एक्ट के लिये राष्ट्रपति के नाम खुला पत्र

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राष्ट्रपति महोदय,

अभी कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा मनमाने तरीके से “अनु॰ जाति, जनजाति अत्याचार निवारण एक्ट” को कमजोर करने का जो कार्य किया गया है, उसके संदर्भ मे मैं आपको यह पत्र लिख रहा हूँ, महामहिम राष्ट्रपति महोदय इस देश मे, पूर्व मे अछूत कही जाने वाली जातियाँ, जिन्हे आज़ादी के समय अनुसूचित जातियो के रूप मे सूचित किया गया, का इस अछूतता से उपजी निर्योग्यता ने किस किस तरह से “दलन” किया है, मेरी समझ मे यह आपको बताने की जरूरत शायद नहीं है, उन्हे इस देश मे कभी भी एक इंसान के रूप मे नहीं लिया गया, अगर बाबा साहेब के समय के या उससे पहले के इस दलित समाज के अनुभवो पर गौर किया जाये तो यह तस्वीर इतनी भयावह होगी कि जिसकी कल्पना भी कोई सभ्य समाज नहीं कर सकता। यहाँ हम उतना पीछे जाकर बात नहीं करना चाहेंगे, बल्कि पिछले कुछ वर्षो खासकर वर्तमान समय की स्थिति के बारे मे ही अपनी बात रखना चाहूँगा।

मान्यवर इस दलित समाज के साथ जातिवादी शक्तिशाली वर्ग ने सदा से ही जुल्म किए है, आज़ादी के बाद हमे इस जुल्म और ज्यादती से राहत की उम्मीद थी, लेकिन आज़ादी के बाद शासन प्रशासन मे मजबूत हुई इन जातिवादी शक्तियों की पकड़ के चलते यह जुल्म और ज्यादती आज तक रुकने का नाम नहीं ले रही है। और देश के कोने कोने मे इन जातिवादी आताताइयों का भय व डर आज भी दलित गरीब लोगों में व्याप्त है। इसके चलते दलित वर्ग के लोगो को देश भर में, या तो घुटन और भय के माहौल मे जीना पड़ता है, और जो भी व्यक्ति इस डर या आतंक को चुनौती देने का साहस करता है, उसे ये लोग शासन प्रशासन के सहयोग से मसल कर रख देते है.

इन जातिवादी आतंकियो ने कभी हमारे जनप्रतिनिधियों को गणतन्त्र दिवस व स्वतन्त्रता दिवस जैसी राष्ट्रीय महत्व के पर्वो तक पर झण्डा फहराने से रोका, तो कभी हमे अपने पसंद के उम्मीदवार को वोट देने से रोका, कभी हमारे लोगो को अच्छे कपड़े पहनने से रोका व उन पर कीचड़ उछाला गया तो साइकल मोटर साइकल तक पर बैठ कर निकलने से रोका, पगड़ी पहनने व शादी मे घोड़ी पर बैठने तक के चलते मारा पीटा जाता रहा है, खाने पीने के सामान समेत अनेको प्रकार की वस्तुओं का सार्वजनिक रूप से व्यापार करने पर इस वर्ग पर आज भी रोक जारी है, इस वर्ग को ग्रामीण अंचलों में आज भी सार्वजनिक पेयजल स्रोतो से पानी लेने से रोका जा रहा है, स्कूलो विश्वविद्यालयो मे इस वर्ग के छात्रों व छात्राओं को हमेशा से प्रताड़ित किया जाता रहा है, कुल मिलकर हमे संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारो का उपभोग करने से लगातार रोका जाता रहा है। ये तो सिर्फ कुछ मामले है, ऐसे ही हजारो प्रकार से इस समाज पर आज भी जुल्म और ज्यादती जारी है। इन मुद्दो से जुड़े अत्याचार के केसो का ब्योरा आपके पास उपलब्ध है, आप नज़र डाल सकते है। इस समाज की महिलाओ की स्थिति तो और भी ज्यादा खराब है, उन्हे तो इन जातिवादी भेड़ियो द्वारा भेड बकरियो जैसा ही समझा जाता है। जिनको आये दिन जातिवादी आतंकियो द्वारा बेरोकटोक मसला जाता रहा है, हरियाणा के भगाना गाँव की घटना आपके सामने उपस्थित ही है, जिसमे दलित वर्ग लड़कियो को कई दिनो तक बंधक बना कर उन पर बलात्कार किया जाता रहा, और ये परिवार कई दिनो तक दिल्ली के जंतर मंतर पर पड़े रहे, फिर भी वे आज तक न्याय की बाँट जोह रहे है.

सदा से अछूत समझे जाने वाले इस समाज को देश की अर्थव्यवस्था में सम्मानजनक कार्य करने से आज भी रोका जा रहा है, ना उनको समाज की तरफ से प्रोत्साहन है, और ना ही सरकार की तरफ से, आज भी व्यापार में इनकी भूमिका नगण्य बनी हुई है, उनके हाथ का छूआ तक खाने की मनाही रही है, यही कारण है कि आज भी अधिकतर राजनीतिक पार्टियों के नेता दलितो के साथ खाना खाने को बड़ा काम समझते है, और साथ खाना खा लेने की सामान्य सी घटना राष्ट्रीय मीडिया के लिए बड़ी खबर बन जाती है, अगर छूआछूत आधारित भेदभाव रुक गया होता तो शायद ये खबरे ही ना बनती.

मैं ब्यावर (राजस्थान) की एक घटना का जिक्र आपसे करना चाहता हूँ, बेरोजगारी से त्रस्त एक गरीब दलित नौजवान ने चाय नमकीन नाश्ते का एक ठेला लगाने का साहस कर लिया, कुछ दिनो बाद कुछ जातिवादियों ने उसे इसलिए मारा पीटा, क्योंकि अंजाने मे उन्होने एक दलित के ठेले से नाश्ता खा लेने के चलते उनका धर्म भ्रस्ट हो गया। महोदय आज भी जब तक दुकानों पर गुप्ता जरनल स्टोर, शर्मा टी स्टॉल, या वैष्णव भोजनालय ना लिखा हो, ग्राहक ही नहीं मिलते, क्या आप बता सकते है ? इस देश मे चमार टी स्टाल, भंगी या वाल्मीकि भोजनालय, कोरी जनरल स्टोर क्यों नहीं मिलते। कारण शायद आप बेहतर तरीके से जानते है।

आपके सामने रोहित वेमुला का केस है, जिसमे एक प्रतिभावान छात्र ने इस देश मे जीने से बेहतर आत्महत्या का रास्ता चुना, “ऊना कांड” जिसमे मरे पशुओ कि खाल निकाल कर दो वक्त कि रोटी पैदा करने वाले लोगो का क्या हाला किया गया आपने देखा, आप बेहतर जानते है कि ये लोग मरे पशुओ कि खाल तक ही हजारो सालो से क्यों सिमटे है, आज़ादी के सत्तर साल बाद भी इनके हिस्से मे ये मरे पशुओ की खाल ही क्यों है ? हमारे लोगो को आज भी बात बात मे मार दिया जाता है, जिंदा तक जला दिया जाता है, पिछले एक साल के आंकड़ो को ही हम देख ले तो, इतिहास के कुरूप चेहरे का भान हमे हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मनमाना क्यों है?

सुप्रीम कोर्ट ने जिस आधार पर यह निर्णय लिया है, वे पूरी तरह से भ्रामक है, इसे समझने के लिए हमको “राजीनामा टेक्नोलोजी”, जो कि इस देश की एक गंभीर आपराधिक “सामाजिक तकनीक” है, उसे समझने का प्रयास करना होगा, आज़ादी से पहले इस देश मे ना तो आधुनिक मानको पर आधारिक कोई कानून व्यवस्था रही, ना ही समाज को गाइड करने वाले कोई आधुनिक नैतिक मूल्य। आज़ादी के बाद देश मे कानून के शासन की शुरुवात हुई। इसके माध्यम से ऐसी व्यवस्था की नींव डालने की शुरुवात हुई, जिससे कि इस देश मे समानता आधारित संबंधो को प्रोत्साहित किया जा सके। लेकिन चूंकि आज़ादी के बाद से ही जातिवादियों को दबदबा शासन प्रशासन पर रहा है। यह सुधार की प्रक्रिया ठहर सी गई, और कानून व्यवस्था को गच्चा देने के लिए “राजीनामा तकनीक” जैसी आपराधिक प्रणाली को पैदा किया गया। दलित वंचित समाज पर जब भी कोई अत्याचार की घटना होती है। लगभग 90% से ज्यादा मामलो मे पुलिस, शक्तिशाली जातिवादी वर्ग के दबाब के चलते FIR लिखने से ही मना कर देती है। इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि पिछले 70 सालो मे, दलितो के अधिकतर स्थानीय आंदोलन FIR लिखवाने के लिए ही हुये है, FIR लिखवाने मे महीनो का प्रयास करना पड़ता रहा है। और जिन 10% से भी कम मामलो मे FIR हो भी जाती है, उनमे से अधिकतर को स्थानीय शक्तिशाली वर्ग के दबाब, डर, लालच के चलते पीड़ित पक्ष को “राजीनामा” करना पड़ता है, और पुलिस राजीनामा में नाम पर पीड़ित पक्ष से ही “माफीनामा” लिखवा कर, इन मामलों को झूठा मामला बता कर उसकी अंतिम रिपोर्ट पेश कर देती है। और केस को खत्म करवा देती है। आज सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय लिया है, वो “माफीनामा” के चलते खत्म किए गए इन केसो के चलते ही है। मेरे हिसाब से सुप्रीम कोर्ट को इस बात के लिए चिंतित होना चाहिए था कि SCST ACT के तहत आने वाले केसो मे कनविक्सन रेट (दोष सिद्धि दर) इतनी कम क्यों है, कुछ महीनो पहले छपी मीडियो रिपोर्ट्स कि माने तो आज़ादी से अब तक यह दर 2% से भी कम रही है। सुप्रीम कोर्ट को चाहिए था कि वो यह आदेश राज्यों की सरकारो को देती कि इस कानून के अंतर्गत दोष सिद्धि कि कम दर को गंभीरता से लिया जाये, और इस वर्ग के प्रति ज्यादा सजगता और संवेदनशीलता से कार्य किया जाये।

मान्यवर, आप इस देश के प्रथम नागरिक है और इस देश की समस्त जनता के संरक्षक है, हम सबके भले की ज़िम्मेदारी भी आप की ही है, चूंकि आप भी उसी वर्ग से ताल्लुक रखते जिससे बाबा साहब डॉ भीम राव अंबेडकर जी रखते थे, जिन्होने इस देश का संविधान रच कर हमे सपने देखने के अधिकार दिये, आज आप बाबा साहब के प्रयासो के चलते ही इस देश के सर्वोच्च पद को सुशोभित कर रहे है, मान्यवर मैं इस देश का एक सामान्य नागरिक और आपकी प्रजा होने के नाते आपसे निवेदन करना चाहता हूँ, कि पिछलो कुछ वर्षो मे हमसे वो उम्मीद व सपने देखने का अधिकार छीनने के प्रयास किये जा रहे है, जो बाबा साहेब ने हमारे अंदर जगाए। आज इस दलित वर्ग को हर फ्रंट पर पीछे धकेलने के प्रयास किए जा रहे है।

मान्यवर, आपसे अपेक्षा है कि सर्वोच्च न्यालय द्वारा लिए निर्णय को वापस करवाएँ, और इस एक्ट के तहत कनविक्सन रेट (दोष सिद्धि दर) के कम रहने के कारणो की जांच के लिए उपयुक्त व्यवस्था करेंगे.

-धर्मेंद्र कुमार जाटव
(टीम राजस्थान )

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