एक हैं ऋतुराज !

-वीरेंद्र यादव

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ऋतुराज जी की कविताएं लंबे समय से पढ़ता रहा हूं। उनकी कविताओं का प्रशंसक भी रहा हूं, लेकिन कभी मिला नहीं था। पहली बार जब मुलाकात हुई तो कवि के रूप में नहीं आयोजक के रूप में। 26 जनवरी की रात दस बजे जब समानांतर साहित्य महोत्सव के लिए जयपुर पहुंचा तो आयोजन स्थल पर सबसे पहले ऋतुराज जी ही मिले अपना परिचय देते हुए। ठिठुरती ठंड में खुले में खाने के साथ उनसे मुलाकात की आत्मीयता ने गर्माहट से भर दिया ।

अस्सी के आसपास की उम्र में उनकी आयोजक के रूप में इस मुस्तैदी ने कुछ शर्मशार किया तो प्रेरणा भी कम नहीं दी। वे हर समय मंच से दूर ही रहे ,जब कविता सत्र में उनसे आग्रह किया गया तब भी वे मंच पर नहीं आए। हां, वैचारिक सत्रों में वे सभागार में मुस्तैदी के साथ मौजूद रहते थे आश्वस्त होने के लिए कि विमर्श पटरी पर है या नहीं। सत्रों के बाद उनकी संतुष्टि मुझ जैसे प्रतिभागियों के लिए आश्वस्तिदायक थी। कल रात जब मुझे और इप्टा महासचिव राकेश जी को लौटना था तब भी ऋतुराज जी आयोजक के दायित्व के साथ मौजूद थे कि हम लोगों को समय से खाना मिल जाए ताकि ट्रेन पकड़ सकें।

अपने समय के एक वरिष्ठ कवि की आज के चुनौती भरे समय में यह भूमिका हम सभी के लिए प्रेरक है।आदरणीय ऋतुराज जी का हार्दिक अभिनन्दन और लाल सलाम।

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