ओम थानवी का समानान्तर को जवाब !

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जयपुर में एक ही सप्ताह में तीन-तीन साहित्य उत्सव सम्पन्न हुए। राजस्थान के लिए ऐसे सभी आयोजनों का होना अहम है। इनसे पढ़े-लिखे, सहित्यानुरागी प्रदेश की छवि बनती है – भले राज्य सरकार और करणी सेना की गतिविधियाँ उसे दक़ियानूसी अंधेरे में धकेलने की कोशिश करती हों।

जयपुर लिट-फ़ेस्ट (जेएलएफ़) बड़े पैमाने पर होता है। हर साल उसका कलेवर बड़ा होता गया है। नोबेल पुरस्कृत हस्तियों से लेकर युवा लेखक एक ही मंच पर बोले-सुने जाते हैं। कलाकार, फ़िल्मकार, विचारक और राजनेता भी। साहित्य, कला, इतिहास, संस्कृति, राजनीति, पर्यावरण, मनोविज्ञान, पुरातत्त्व, भाषाविज्ञान आदि अनेकानेक पहलुओं पर चर्चा होती है। हज़ारों पुस्तक-प्रेमी उमड़ते हैं। आम पाठक से लेकर मंत्री-संतरी तक। ख़ास बात यह लगती है कि युवा वर्ग को यह आयोजन बड़े पैमाने पर आकर्षित कर रहा है। भले कुछ युवा महज़ मेला समझ इसमें शिरकत करते हों – उसमें भी क्या हर्ज – लेकिन मैंने बेशुमार युवक-युवतियों को लाइन में लगकर किताबें ख़रीदते, लेखकों के दस्तखत लेते, उनके साथ फ़ोटो उतरवाते देखा है।

जेएलएफ़ को इन दिनों मुख्यतः ज़ी मीडिया समूह धन-सहयोग देता है। वह एक कूपमंडूक, भाजपा समर्थक संस्थान है। लेकिन साहित्य उत्सव का कलेवर इस बार भी अपने लोकतांत्रिक स्वरूप में क़ायम रहा। इसकी वजह शायद यही है कि उसके दोनों निदेशक नमिता गोखले और विलियम डैलरिंपल लेखक हैं और व्यवस्था की धुरी संजॉय रॉय राजनीतिक दावँ-पेच से बरी। इसलिए पद्मावत, हिंदुत्व संकीर्णता से लेकर प्रधानमंत्री की परित्यक्त पत्नी तक पर संभागियों ने बात की। गम्भीर बात भी हुई, कुछ हँसी-ठट्ठा भी, कविता-कहानी भी, गाना-बजाना भी।

इसके अलावा दूसरा अहम आयोजन जन संस्कृति पर्व का हुआ। इसका आयोजन जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच और कुछ अन्य वैचारिक संगठनों ने मिलकर किया। मैं जिस रोज़ जयपुर पहुँचा, कार्यक्रम सम्पन्न हो रहा था। उड़ान दिल्ली में न अटकी होती तो शायद कुछ वक्ताओं को सुन पाता। बताया गया कि अरुणा रॉय, कविता कृष्णन, चमन लाल, कात्यायनी आदि ने सारगर्भित बात की।

तीसरे “समानांतर” आयोजन (पीएलएफ़) का एकमात्र उद्देश्य जेएलएफ़ का प्रतिकार करना था, जिसमें वे सफल नहीं हुए क्योंकि उनके अपने अनेकानेक संभागी नियमित रूप से जेएलएफ़ में शिरकत करने गए। इतना ही नहीं प्रचारित बड़े लेखकों में कवि विष्णु खरे और नरेश सक्सेना को छोड़कर न तो इस आयोजन में केदारनाथ सिंह आए (बताया बीमार हैं), न अशोक वाजपेयी और ज्ञानरंजन, न असद ज़ैदी, मंगलेश डबराल या विष्णु नागर। न प्रलेस के अपने अध्यक्ष प्रो. अली जावेद, जिनका नाम ख़बरों में था। कुछ लेखकों ने विवादग्रस्त संयोजक की तैनाती पर भी विरोध प्रकट किया, जिस पर आयोजकों ने कान नहीं दिया।

अपने आयोजन को संस्कृति और दूसरे को अपसंस्कृति का बताकर लेखक को लेखक से लड़ाना और पाठक को पाठक से काटना, उन्हें आपस में दूर करने की कोशिश करना वैसे भी साहित्य की दुनिया में हल्की राजनीति कही जाएगी। वह सफल नहीं हुई, यह अच्छी बात है।

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