अरे नेताजी….आप तो खाते हो !

व्यंग्य

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(नारायण बारेठ)


जैसे ही नेता जी की आमद हुई

विवाह उत्स्व में रौनक आ गई

क्या घराती क्या बाराती

सब उनकी खातिर तवज्जो में लग गए

चारो तरफ खाने पीने की चीजे सजी थी

पर वे खा नहीं रहे थे।

ऐसा पहली बार हुआ। अक्सर खाने में आगे रहते थे। पर आज विरक्त भाव में थे।

यूँ तो दूल्हा जश्न ए  शादी में राजा कहलाता है

मगर जब कोई नेता आ जाये ,लोग उनकी मान मनुहार में लग जाते है

सब भोजन के  लिए मनुहार करने लगे

नेता जी ने मुस्करा कर मना कर दिया

फिर किसी ने पूछा ‘ आप खाते तो हो ‘

यह सुन कर नेता जी ने कुटिल सी मुस्कान बिखेरी

बोले ‘नहीं रहने दो ‘

मेजबान ने कहा ‘आप के साथ वाले तो सब खा रहे है ,आप भी खालो ‘ नेता जी सकुचा गए।

‘चलो अलग से खालो , अकेले में खालो। क्योंकि आप खाते तो हो ‘  यह वार्तालाप सुन कर लोग मंद मंद  मुस्कराने लगे / नेताजी इन शब्दों के बीच का अर्थ समझ गए।

फिर कोई बोला ‘देख लो अभी मौका है  ,आपका पी ए भी खा रहा है ,साथ वाले सब खा रहे है ‘ ऐसा तो है  नहीं  कि आप खाते नहीं हो ‘

इस बार नेता जी झेंप गए।

यह मनुहार की आखिरी कड़ी थी। ‘देख लो अब बरात विदा होने वाली है ,कहो तो इंतजाम करू.वक्त कम ही बचा है ।

पर नेताजी नहीं माने। इसके बाद खबर आई कि आचार सहिंता लग गई है।

(नारायण बारेठ जी की फेसबुक वाल से साभार)

 

फोटो क्रेडिट -इन्टरनेट 

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