आम जन का मीडिया
Now move where these children?

अब इन बच्चों को कहाँ ले जाएँ ?

- संजय जोठे

ट्रेन यात्रा के दौरान एक छोटी सी बच्ची से मुलाकात हुई। वह क्रिसमस की छुट्टी में अपने नाना के घर जा रही थी। छुट्टी पर जाते हुए भी उसके माता पिता ट्रेन में ही उसके होमवर्क को लेकर चिंतित थे और बच्ची से कह रहे थे कि ‘अगर स्कूल लौटते ही होमवर्क पूरा न हुआ तो मार पड़ेगी और हमें भी तुम्हारी टीचर से शिकायत सुननी पड़ेगी। तुम्हारी “लापरवाही” के कारण हमें भी तुम्हारे साथ डांट खानी होती है’…

ये सब सुनते हुए बच्ची के मन से छुट्टीयों का मजा जाता रहा, वो ट्रेन की खिड़की से एक शून्य में झांकते हुए उदास मुंह लेकर बैठी रही। मां बाप इस मुद्दे को लेकर बतियाने लगे। सभी सहयात्री सम्पन्न परिवारों से थे। यह एयर कंडिशन्ड कोच था जिसमे एक भी गरीब या लाचार परिवार नहीं था।

ये संपन्न और सक्षम परिवार फिर बच्चो की शिक्षा पर बात करने लगे। सब सुनाने लगे कि कैसे उनके बच्चो के स्कूल कॉपी पेंसिल जूते किताबो से लेकर प्रोजेक्ट वर्क की खरीद तक मे कमीशन खाते हैं। वे कहने लगे कि ढेर सारा होमवर्क थोपकर बच्चों और माँ बाप दोनों की दिनचर्या कठिन बना देते हैं। एक सज्जन बोले कि उनकी जानकारी के अनुसार उनके बच्चो के सभी दोस्तों के होमवर्क और प्रोजेक्ट वर्क उनके माता पिता को ही करने होते हैं। इसीलिये ये स्कूल बच्चो की भर्ती के समय बच्चे की योग्यता से ज्यादा उनके माता पिता की योग्यता के बारे में चिंतित रहते हैं।

वहां बैठे लगभग सभी लोगो ने कहा कि नन्हें बच्चों की फीस भी लाख रुपये साल से कम नहीं है। लेकिन उसके बावजूद हर महीने किसी न किसी कार्यक्रम या प्रोजेक्ट के बहाने दो तीन हजार रुपये झटक लिए जाते हैं। प्रोजेक्ट के लिए फूल पत्ती ही नहीं बल्कि मिट्टी पत्थर तक के नमूने भी किसी खास दुकान से ही खरीदने होते हैं।

फिर वे बताने लगे कि इन स्कूलों के टीचर्स को तनख्वाह में सिर्फ 7-8 हजार रुपये मिलते हैं। लगभग सभी टीचर्स प्राइवेट ट्यूशन लेते हैं या अन्य कोई रोजगार भी करते हैं। ये टीचर्स खुद शिक्षा को लेकर और अपनी तनख्वाह को लेकर परेशान रहते हैं, इनका पढ़ने पढ़ाने में मन ही नहीं लगता।

फिर वे डिसकस करने लगे कि इन सभी स्कूलों के मालिक कौन हैं। ये सभी मालिक या तो बिजनेसमैन हैं, शहर के पुराने जमींदार या पुराने नौकरशाह हैं या फिर वर्तमान में राजनेताओं नौकरशाहों या व्यापारियों के साझेदार हैं। इनकी खुद की शिक्षा या शिक्षण में कोई रुचि नही है, वे सिर्फ माल बना रहे हैं। इन स्कूलों का बड़ा नाम है, वे अपने बच्चो को लेकर इन स्कूलों से शिकायत करते हैं तो स्कूल प्रबन्धन कहता है कि आपको दिक्कत है तो अपने बच्चों को कहीं और पढ़ाइये।

अब इन बच्चों को कहां ले जाएं? सभी स्कूल एक जैसे हैं सभी स्कूलों के मालिक एकजैसे हैं उनका एक बड़ा गिरोह है। ये सभी माता पिता आपस में मिलकर इनके खिलाफ कुछ नहीं कर सकते।

ये अमूमन हर शहर के हर स्कूल की कथा है। बच्चो को वे लोग पढ़ा रहे हैं जिन्हें खुद शिक्षा से कोई मतलब नहीं रहा है।
अब इन स्कूलों में पढ़ने वाले ये बच्चे क्या कर पाएँगे भविष्य में? जिनके लिए शिक्षा सिर्फ होमवर्क का बोझ है या अपने मां बाप की शर्मिंदगी का सबब है वे बच्चे क्या कर पाएंगे?

इन परिवारों का दुखडा सुनकर लगा कि इस मुल्क की सँस्कृति और सभ्यता गजब के लोगों ने बनाई है। अपनी ही नस्लों को बर्बाद करने का एक विराट अभियान न जाने कब से चल रहा है।

कुछ दशकों पहले तक स्त्रियों, ओबीसी, दलितों, आदिवासियों को स्कूलों में नही घुसने देते थे, उन्हें शिक्षा का या स्कूल जाने का मौका ही नही मिलता था। और आजकल सक्षम परिवारों के बच्चों को शिक्षा का मौका मिल भी रहा है तो शिक्षा को ही एक बोझ, एक सिरदर्द बना दिया है। जैसे कि इस मुल्क ने अपने मानव संसाधन को हर पीढ़ी में बर्बाद करते रहने की कसम खा रखी है।

इस मुल्क के धर्म, सँस्कृति के ठेकेदारों ने हर पीढ़ी में मासूम बच्चों के बचपन और जिज्ञासा को खत्म करने के लिए इतना भयानक इंतेजाम कर रखा है कि उसे तोड़ने या बदलने की कोई संभावना नजर नही आती।

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