आम जन का मीडिया
Now his phone will never come

अब उनका फोन कभी नहीं आएगा

- डॉ सुनीलम

तेरे केस का क्या हो रहा है ? कहाँ आंदोलन चला रहा है ,बड़ा बुरा हाल है , दिल्ली आना तो मिलना ,तू कुछ कर यार ,समाजवादी आंदोलन फिर खड़ा करना है ,वो विजय क्या कर रहा है? सच्चर साहेब की यह आत्मीयता भरी उलाहने भरी आवाज़ कानों में रह रह कर गूंज रही है। यकीन नही हो रहा कि सच्चर साहेब नहीं रहे।

मेरी अंतिम मुलाकात 15 दिन पहले दिल्ली प्रवास के दौरान हुई थी , सोशलिस्ट पार्टी इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रोफेसर प्रेम सिंह जी ने बताया था कि सच्चर साहेब पिछले 3 महीने से सुप्रीम कोर्ट नहीं जा रहे है ,बोल भी कम पाते है ,कुछ खा नहीं रहे हैं। संजय पारिख जी ने भी यही बताया ,मुझे चिंता हुई ,फोन लगाया ,फोन उठाया नहीं ।

अगले दिन पहली बार बिना समय लिए घर पहुंच गया ,पहले घर पहुंचने पर अंदर से कहा गया कि आजकल मिलते नहीं हैं ,जब मैंने बेटी को बताया कि मैं आज ही वापस चला जाऊंगा ,उनकी बेटी ने बिठाया कहा देखती हूँ।फिर आकर अंदर ले गईं । सच्चर साहेब अपने चिर परिचित अंदाज में मिले ,पहले लेटे हुए थे फिर बैठ गए ।आवाज़ धीमीं हो गई थी पर, जो सब बातें हर बार करते थे इस बार भी की।

केस का पूछा ,क्या कर रहा हूँ पूछा ,विजय प्रताप जी और मेधा जी का पूछा ,सोशलिस्ट पार्टी इंडिया के बारे में बात की । पूछा कि शरद से बात हुई क्या? यार तैयार न शरद को,उंसको सोशलिस्ट पार्टी की कमान संभालनी चाहिए,अभी कर्नाटक का चुनाव हमारे चिन्ह पर लड़ना चाहिए ,शरद पुराना साथी है ,उसने समाजवादी आंदोलन के उतार चढ़ाव देखे है ।मैंने कहा कि पिछली बार आपकी बात फोन पर कराई थी,अरुण श्रीवास्तवजी भी आकर आपसे मिले थे ,प्रोफेसर प्रेम सिंह जी से भी बात हो गई थी ,उन्होंने सहमति दे दी थी,लेकिन ठोस कुछ निकला नहीं।

फिर आगामी लोकसभा चुनाव के बारे में बात करने लगे ,बोले आपस में समझौता कर चुनाव लड़ना चाहिए। जब ज्यादा देर हो गई तब मैं निकलने लगा, उन्होंने बिठा लिया ,मुझे क्या मालूम था कि मेरी यह अंतिम मुलाकात साबित होगी। बीच में कुछ नाश्ता और चाय आई, कहने लगे कुछ खाया नहीं जाता,मैंने कहा खाएंगे नहीं तो ठीक कैसे होंगे ,हंसते हुए एक दो टुकड़े लिए ,मैं बार बार स्वास्थ्य के बारे में बात शुरू करता, लेकिन वे समाजवादी आंदोलन की, डॉ लोहिया की बात करते। बेटी से बात हुई सब इलाज करा लिया, अब केवल आयुर्वेदिक इलाज बचा है ,वह भी करवाना चाहिए ,बीच में बोले दवाई बहुत कड़वी होती है ना,छोड़ दे ।

सच्चर साहेब कमाल के व्यक्ति थे ,24 घंटे मदद को तैयार ,दिल्ली के जनांदोलनों के लगभग सभी कार्यक्रमों में शामिल होते थे ,हर जगह बोलते भी थे।दो टूक,बिना लाग लपेट के ,लगा तार लिखते भी थे ,जब भी जाता ,अपने प्रिय निजी सहायक को बुलाकर जो कुछ लिखा होता उसका प्रिंटआउट देते।

जब भी मिलता अपना एक किस्सा जरूर सुनाते थे। जब उनके पिताजी भीम सेन सच्चर पंजाब के मुख्यमंत्री थे ,जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री रहते हुए घर नास्ते पर आए । पिताजी ने कहा बेटा नास्ता साथ करना, लेकिन मैंने साफ मना कर दिया, क्योंकि तब तक मैं डॉ राममनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित हो चुके था ,सोशलिस्ट पार्टी का सदस्य बन चुका था । यह किस्सा सुनाकर हंसते थे। फिर कहते थे, उस समय इतनी कट्टरता थी,बचपना था।

मेधा जी जब बड़वानी में नर्मदा के 40,000 विस्थापितों के सम्पूर्ण पुनर्वास के लिए उपवास कर रहीं थी,तब फोन करके लगातार उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछते थे। इसी तरह जब संदीप पांडेय लखनऊ में हाइकोर्ट के शिक्षा संबंधी निर्देश का पालन कराने के लिए अनशन कर रहे थे,तब लगातार उनका हाल चाल पूछा करते थे। मुख्यमंत्री के तौर पर अखिलेश जी से भी बात की थी। देश में कौन है इतना वरिष्ठ और इतने उच्च पद पर रहा व्यक्ति जो एक एक कार्यकर्ता की चिंता करे ,94 वर्ष की आयु में फोन करके कुशलक्षेम पूछे।

मुलताई गोली चालन के प्रकरणों को लेकर पहले से ही चिंतित रहते थे ,मेरी वकील आराधना भार्गव को कई बार पूरे केस पेपर्स लेकर बुलाया ,हर गवाही और चालान और एफआईआर का एक एक शब्द कहते थे,केस में दम नहीं है ,फिर सलाह देते थे ।जब सजा हो गई तब फिर सब केस पेपर्स बुलवाए । वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेंद्र सिंह जी से उन्होंने केस को लेकर बात भी की थी। बार बार उनको लगता था कि मुझे जिन प्रकरणों में सजा हुई है, उनकी अर्जेंट हियरिंग के लिए कहते थे,जब मैं कहता था कि आप कह दीजिये,मैं लगवाता हूँ ,तब कहते थे केस तो एक्विटल का है लेकिन आजकल जो हाल है उसमे कुछ भी हो सकता है।

‘छोड़ दे ,उस चक्कर में मत पड़’ यह उनका हर बार अंतिम वाक्य होता। वे चाहते थे देश में मजबूत सोशलिस्ट पार्टी खड़ी होनी चाहिए। मुझे भी सोशलिस्ट पार्टी में शामिल होना चाहिए ,कहते थे ,मैंने पार्टी बनाई हुई है ,आकर सम्हाल। हर समय कहते थे सबको इक्कठा कर ,मैं कहता था कि आप ही सबको इकट्ठा कर सकते हैं, तो हंसते हुए कहते थे कौन सुनता है ? समाजवादी समागम के लिए उन्होंने समाजवादियों की एकजुटता के लिए एक लिखित सन्देश भी मुझे दिया था ।

आगामी 17 मई 2018 को मावलंकर हाल में समाजवादी आंदोलन – कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना के 84 वर्ष होने के अवसर पर हम उन्हें सम्मानित करना चाहते थे । अब तो हम उनके समाजवादी विचारों पर चलने का संकल्प ही ले सकते हैं।

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जैसे पद पर रहकर भी जस्टिस राजिंदर सच्चर का इतना सरल और सादगी पूर्ण जीवन हमे सदा प्रेरणा देता रहेगा । सच्चर साहेब का आशावाद जबरदस्त था ,सब कुछ बिखर जाने के बाद भी वे तिनका तिनका जोड़ने का प्रयास करते रहते थे। समाजवाद , मानव अधिकारों और विशेष तौर पर अल्पसंख्यकों के लिए किए गए उनके कार्य हमारे लिए सदा प्रकाश पुंज का काम करते रहेंगें।

जो साथी सच्चर साहेब को मानते है, उनको चाहिए कि वे सोशलिस्ट पार्टी इंडिया,पी यू सी एल के कार्यों में रुचि ले और सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को लागू कराने के लिए प्रयास करें अर्थात वंचित तबकों के लिए संघर्ष तेज करें,मानव अधिकारों के उलंघन का हर संभव प्रतिकार करें तथा मुस्लिमों की समस्याओं को हल करने में समय लगाएं।

Leave A Reply

Your email address will not be published.