तो अब नोटा और सोटा की तैयारी हो रही है !

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कैसी दादागिरी है ? जालिमों को जुल्म करने का लाइसेंस चाहिए ,ताकि अत्याचार भी करे लेकिन कानून से भी बचे रहें । किसी शायर ने कहा – ” बेकसर चाबुक चलाये ,बेरहम जल्लाद ने /और अश्कों को छलकने की इजाज़त तक न दी ।”
मतलब जाति रखेंगे, जातिगत भेदभाव रखेंगे ,आज भी मूर्खों की तरह छुआछूत मानेंगे ,जमीनें छीनेंगे,जातिसूचक गालियां देंगे ,जाति के आधार पर नफरत भी फैलाएंगे। पर इन कृत्यों की सज़ा नहीं स्वीकारेंगे।
सारे अपराध करके भी बरी रहना चाहते है ,यह है कथित ऊंची जाति होने का निम्नतर दम्भ !
अजीब हिप्पोक्रेसी है – सब काम जाति को मद्देनजर रखकर करेंगे ,यहां तक कि जाति देखकर ही जुल्म भी करेंगे,पर अपने आपको बेगुनाह भी बतायेंगे ।
ऐसे दिखाया जा रहा कि जैसे कि इस कानून की वजह से  सामान्य वर्ग के हर परिवार से किसी न किसी को उनको जेल में ज़िंदगी गुजारनी पड़ रही है । जबकि सच्चाई दूसरी है,अव्वल तो एससी एसटी एक्ट में मुकदमे दर्ज ही नहीं होते,हो भी जाते है तो फ्री एंड फेयर इन्वेस्टिगेशन नहीं होता,कानून की भावना के विपरीत सवर्ण गवाह मांगे जाते है ,इतना सब कर लेने के बाद भी कईं दिनों तक जांच चलती है,राजस्थान में तो चार्जशीट दाखिल होने से पहले एसपी के पास मंजूरी के लिए जाती है ,तब जा कर गिरफ्तारी होती है ,जो लोग कहते है कि इसमें जमानत हाईकोर्ट से भी नहीं होती ,उनकी जानकारी के लिए बता दूं कि राजस्थान में भीलवाड़ा एक जिला है जहाँ  पर दलित अत्याचार हो अथवा पोक्सो सबकी जमानत डिस्ट्रिक्ट लेवल पर ही सहजता से मिल जाती है ,आधे से ज्यादा केस अदम वकु झूठे बता कर खत्म कर दिए जाते है,जो बचते है ,उनमें जबरन राजीनामे लिखवा लिए जाते है।
 जब समरी ट्रायल होती है,तब साक्ष्य प्रभावित किये जाते है,कुलमिलाकर हाल इतना बुरा है कि एससी एसटी कानून के तहत सज़ा का प्रतिशत शर्मनाक स्तर तक नीचे है ,कानून का तो मख़ौल बना रखा है ,ऊपर से बिना सोचे विरोध की नाटकबाजी करके दलित व आदिवासियों के खिलाफ नफरत का माहौल खड़ा किया जा रहा है ।
हद यह है कि संसद द्वारा निर्मित एक कानून के खिलाफ पूरा एक वर्ग अपनी सम्पूर्ण निर्लज्जता के साथ खड़ा हो गया है ,इसका मतलब तो यह हुआ कि वे पूरी बेशर्मी से दलितों आदिवासियों के साथ निर्बाध रूप से अनन्त काल तक अन्याय ,अत्याचार और जातिगत उत्पीड़न करने की छूट चाहते है  और इसके लिए ही यह नोटा फोटा की पोलिटिकल ब्लैकमेलिंग की जा रही है ।
गांवों में बैनर लगे है कि यह गांव सामान्य वर्ग के लोगों का है,कईं जगहों पर दुकानों के बाहर भी इसी तरह के बैनर पोस्टर लगा कर यह गन्दगी फैलाई जा रही है,अब तो विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओ  का भी जगह जगहे पुरजोर विरोध किया जा रहा है कि वे संसद में एससी एसटी एक्ट के खिलाफ में क्यों नहीं बोले ?
कुछ सवाल है मेरे इस प्रकार की असामान्य हरकतें कर रहे सामान्य वर्ग से कि – भाई तुम्हे जाति से बहुत प्यार है,उस पर गर्व भी करते हो .. पर उसी जाति व्यवस्था जनित चीजों से नफरत क्यों है।
जाति रखना चाहते हो पर दिखावे के लिए उस बीमारी के लक्षणों से लड़ना चाहते हैं, पर बीमारी के मूल को नष्ट करने को तैयार नहीं हो । बीमार पेड़ के पीले पड़ रहे पत्तों में इंजेक्शन लगा रहे हो,पर जिस पेड़ का तना और जड़ें ही लाइलाज बीमारी बन चुके है ,उसको काटने को तैयार नहीं हो ।
तो मेरे कथित सामान्य भाईयों बहनों , मेरा आपकी समस्याओं के निदान का बहुत सिंपल सा फार्मूला है कि जाति नामक समस्या का मूल ही खत्म कर दीजिये,फिर उस पर आधारित सब चीजें तो स्वतः ही खत्म हो जाएगी । न रहेगा बांस ,न बजेगी बांसुरी ! ,जब जाति ही न रहेगी तो जातिगत आरक्षण कैसे रहेगा ? जब जाति ही मिट जाएगी तो जातिगत उत्पीड़न रोकने के लिए बनाया एससी एसटी एक्ट भी खुद ही खत्म हो जाएगा ।
बोलो क्या कहते हो ? जाति मिटाने का बड़ा आंदोलन खड़ा करने को तैयार हो ? अपने घर,दुकान,कम्पनी ,गांव,गली और मोहल्ले में यह बैनर टांग सकते हो कि हम वाकई सामान्य लोग है और इस देश की स्थितियों को सामान्य करने में लगे है ,हम जाति नहीं मानते ,हमारे यहां पर जाति नामक कीटाणु का समूल नाश कर दिया गया है,हम किसी के साथ जाति आधारित छुआछूत, भेदभाव ,शोषण ,अन्याय और उत्पीड़न नहीं करते है !
कर सकते हो ऐसा ? है इतना बड़ा दिल ? ‘उदार चरितानाम वसुधैव कुटम्बमकम’ के श्लोक ही दोहराओगे या जीवन मे भी उतारोगे ? या सिर्फ चुनावों में सियासी नफे नुकसान के लिए ही टर्राते रहोगे ?
बाकी तो जमीनी सच्चाई यह है कि नोटा दबाओं ,या सोटा पकड़ो ,पर अब ज्यादा दिन लोग दबने वाले नहीं है ,और हां कान खोलकर यह साफ साफ सुन लो – ” जब तक जातिजन्य अन्याय ,अत्याचार ,उत्पीड़न ,शोषण व भेदभाव जारी रहेगा, तब तक आरक्षण और एससी एसटी एक्ट जैसे रक्षात्मक कानूनी उपाय भी जारी रहेंगे ,उनको कोई नहीं छीन सकता।”
कोई भी नहीं !
( लेखक शून्यकाल के संपादक है )

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