नई परिभाषा गढ़ती दलित एकजुटता

-नवीन नारायण

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समाजशास्त्रीय घटनायें समाज पर गहरा असर छोड़ती है.इस मायने में दो अप्रैल को होने वाले ‘दलित उठान’ को भी ऐसे ही समझाना होगा.जो हुआ, देखा और अब जैसा रिपोर्ट हो रहा है, उसके बहुत ही गहरे मायने है. यह घटना न केवल राजनैतिक रूप से जैसा सामान्य लोग कह रहे है, उनके अलावा नीचे सामाजिक स्तर पर गहरे तक असर डालेगी ।

जो देखा वह अप्रत्याशित था । आजादी से पहले, दौरान, बाद में भी ऐसा नहीं देखा गया ।

कालाराम मंदिर प्रवेश को लेकर या चवदार तालाब पानी को लेकर, बाबा साहेब के नेतृत्व में रिपोर्ट हुए बड़े असरदार दलित आन्दोलन है । ये आन्दोलन बाबा साहेब ने खास उद्देश्य को ले कर तय किये और बखूबी अंजाम दिए, पर यह इनसे भिन्न है । सामान्यतया आन्दोलन तय किये जाते हैं और उन्हें सफल बनाने के लिए जमीनी स्तर पर आयोजक रूपरेखा तैयार करते हैं। इस मामले में ऐसा न हुआ । मतलब इसको आन्दोलन नहीं कह सकते । तो फिर इसे क्या कहें?

ऐसी घटनायों को जो स्वतस्फूर्त होती है,उन्हें आन्दोलन से अलग समझना होता है । ऐसी स्थिति सामान्यतया एक लम्बे दमन के बाद उत्पन्न होती है । ‘जहाँ नेता नदारद जनता हाजिर’ वाली स्थिति उत्पन्न होती है । हाल के समय में दुनिया में ऐसी घटना और भी हुयी है । जिनमें ‘अरब स्प्रिग’ (2010) ‘ब्लैक लाइव मैटर (2013)’ ‘उठान और फैलने’ के सीमित मायनों में मिलती जुलती है। जो उत्तर अफ्रीका और मिडिल ईस्ट में 2010 में हम देख चुके है । ‘ब्लैक लाइफ मैटर’ जो अमेरिका में 2013 में सोशल मीडिया जनित ‘आजादी और बराबरी’ का आन्दोलन था के ज्यादा करीब है । जिसमें एक अफ्रीकी मूल के अमेरिकन किशोर त्रविन मार्टिन के हत्या आरोपी जोर्ज जिबेर्मन को बरी करने से उत्पन्न हुयी । जिसने पूरी अमेरिका और दुनिया में बराबरी के लिए आन्दोलन और संस्थागत अत्याचार, भेदभाव की ओर ध्यान दिलाया । साथ ही साथ इन समुदायों पर होने वाले ‘पुलिस दमन’ और ‘न्याय व्यवस्था के नस्लीय चरित्र’ को भी उजागर किया । इस सन्दर्भ में भारत में होने बाली ये घटना अमेरिकी घटना के ज्यादा समकक्षी प्रतीत होती है ।

भारत की घटना के मूल में भी ‘न्याय व्यवस्था के जातीय चरित्र’ को दलितों ने दोषी माना । पटाक्षेप में, सोशल मीडिया से उठा जन सैलाब ‘न्याय और बराबरी की चाह’ के अधिकार से प्रेरित हो उसे लेने सड़क पर उतरा । कोई नहीं जानता कि बंद का आव्हान किसने किया । इसीलिए ये ‘आन्दोलनकरी’ जिन्हें भीड़ भी कहा जा रहा है, बिना किसी नेता के ही सड़क पर आ गए । जो एक ऐतिहासिक घटना है । ये केवल संयोग नहीं है कि उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार, जहाँ सबसे ज्यादा लोग सड़क पर आये,वही राज्य है जहाँ नेशनल क्राइम ब्यूरो में दलितों पर सबसे ज्यादा अत्याचार के मामले दर्ज हुए हैं । जो पूरे भारत में दर्ज 40801 मामलों में 26183 जो कुल का 64 प्रतिशत हैं । इसलिए देखा जा रहा है कि आन्दोलन इन राज्यों में ज्यादा उग्र रहा है ।

‘दर्ज अपराधों के मामलों के क्रम’ और ‘आन्दोलन करने वाले राज्यों’ में एक सह सम्बन्ध दिखता है। उन राज्यों में ज्यादा लोग सड़क पर आये जहाँ अत्याचार के मामले ज्यादा दर्ज हुए है । जिसमें उत्तर प्रदेश ( 10426 केस के साथ पहले स्थान), बिहार ( 5702 के साथ दूसरा स्थान), राजस्थान (5134 के साथ तीसरा स्थान ) मध्य प्रदेश ( 4922 के साथ चोथे स्थान ) और ये क्रम उपरोक्त धारणा को पूरी तरह से स्थापित करते है ।

इस स्वतस्फूर्त आन्दोलन को मैंने जयपुर में करीब से देखा । यह पाया कि आन्दोलनकारियों की औसत उम्र 28 या 30 वर्ष रही होगी । यानि इनमें से किन्ही की यादों में कुम्हेर कांड, भरतपुर(1992) या पनवारी कांड-आगरा (1990)का भय नहीं है। इसके बरक्स इन युवाओं ने पिछले एक दशक में अपने होशो हवाश में जिन आंदोलनों को देखा है,उनमें प्रमुख गुज्जर आन्दोलन (2007, 2013 ), जाट
आन्दोलन (2008), अन्ना आन्दोलन (2014 ) पाटीदार आन्दोलन ( 2016), मराठा आन्दोलन(2017),) है । इन्होंने देखा कि सभी जाति आन्दोलन (अन्ना आन्दोलन को छोड़कर) हिंसक थे. प्रशासनिक स्तर पर सरदर्द बने रहे थे,फिर भी सरकारें पिछले टांगो पर मन्नतें करती हुई दिखी ।

इसी दशक में इन्होने दलितों के द्वारा या उनके अधिकारों के पक्ष में हुए आन्दोलनों जैसे रोहित बेमुला ( 2015)और उससे जुड़ा जेएनयू कन्हैया कुमार कांड (2015, ज्यादातर लोग इसे इसी नजर से देखते है ), उना आन्दोलन ( 2016 ), भीमा कोरे गाँव ( 2017) को भी देखा । वो हर रोज अपने अधिकारों को लेने के लिए- चाहे वो बाल कटाने, घोड़े पर बारात निकलने से लेकर दलितों की जमीं हथियाने, उन्हें नीचा दिखाने, मंदिर में प्रवेश न करने देने और बलात्कार जैसे मामले हों, को रोज रोज देख रहे थे और लड़ रहे थे । इन सब में कानून का होना मददकर्ता के होने जैसा था, जबकि असल में ‘लागू करने वाले- पुलिस और न्यायपालिका’ इसे अप्रभावी बनाये बैठे थे । इसी बजह से राष्ट्रीय क्राइम ब्यूरो 2016 की रिपोर्ट के अनुसार सजा की दर बहुत कम करीब 16 प्रतिशत और 8 प्रतिशत थी। क्या ये तथ्य भी मायने रखता है कि ये दर 2010 में 38 प्रतिशत और 26 प्रतिशत थी । जो भाजपा सरकार के 2014 के समय से लगातार गिरी है ।

‘सजा की कम दर’ को जजों ने ‘झूठे केस होने के वजह माना’ जो कि पूरी तरह से गलत है । सजा तय होने के अन्य कारणों में अच्छी तरह से अन्वेषण होना और ठीक और प्रभावी ढंग से वकीलों का केस लड़ना प्रमुख हैं । बथानी टोला (1996), लक्ष्मणपुर बाथे (1997) में 89 दलितों के रणवीर सेना के हत्या आरोपी क्रमश 23 और 26 आरोपी को 2012 और 2013 में बरी कर दिया गया । तो क्या ये माना जाय की हत्या हुयी ही नहीं ? बल्कि ये मानना ज्यादा ठीक होगा कि आरोप सिद्ध नहीं हो सका । जैसा मैने ऊपर कहा कि ये कई कारणों पर तय होता है । ऐसे मामलों में गवाहों का मुकरना ज्यादा देखा गया है जो कि संभावित है.गरीब और दलित का पैसे और तथाकथित उच्च वर्गों के सामने टिकाना मुश्किल हो जाता है । ताकतवर मजबूरियों का दोहन करने में माहिर होते है ।

खैर, इस मददकर्ता (कानून) के ना रहने के आभास ने मार और अत्याचार झेल रहे परिवारों के युवाओं को सड़क पर निकाल लिया । अपनी स्मृति में ये सड़क पर आने के कारनामे देख चुके थे और ऐसा भी नहीं था कि ये पहली बार सड़क पर आये थे । ये पहले भी आये ‘हिन्दू’ बनकर, राजनैतिक संरक्षण में सफलतापूर्वक उद्देश्य प्राप्त कर विजेता सा सम्मान प्राप्त कर वापस चले गए । लेकिन इस बार बाजी पलट गयी थी, अब वो ‘हिन्दू’ नहीं बल्कि ‘दलित’ बनके आये थे । अब लड़ाई ‘उनसे’ नहीं सच्चे हिन्दुओं से थी । जो उन्हें हैसियत दिखाना जानते थे और वही हुआ। हिंसा के प्रमुख कारण के रूप में जबरदस्ती बाजार बंद कराया माना जा रहा है । यानि अब हम ‘इन लोंगो’ के कहने से बाजार बंद करेंगे,यह सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल बन गया ।

भारत में यूँ बाजार बंद होना ‘जबरदस्ती बंद कराया जाना’ कोई नयी बात नहीं है । राजनैतिक पार्टिया ही नहीं सामाजिक संगठन भी अपने स्तर पर ऐसा करवाते रहे हैं, करनी सेना इसका ताजा उदाहरण है । जिसका कई मामलों में विरोध भी रहा पर तब मामला असंतुष्टि के स्तर तक, स्थानीय और वणिक जाति वर्ग ( जिनकी दुकाने बंद कराई गयी) तक ही सीमित रहा । बाड़मेर, हिंडोन, ग्वालियर, मुरेना, भिंड की प्रतिहिंसा बताती है कि विरोध वणिक जाति वर्ग से नहीं अपुति ब्राह्मण, राजपुरोहित और क्षत्रिय से आया । दुकान बंद से नुकसान होना था,तो गुस्सा भी उसी वर्ग से आना था यानि वणिक जाति से। पर ऐसा न हुआ ।

हिंडोन शहर की घटना प्रतिहिंसा की सबसे बड़ी घटना है। प्रतिहिंसा के कारणों और करने वालों की मानसिकता को समझने में भी महत्वपूर्ण है । हिंसा में कांग्रेस सरकारों में दो बार मंत्री रहे भरोसी लाल जाटव ही नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी से वर्तमान दलित महिला विधायक सुश्री राजकुमारी जाटव के घरों को भी आग लगा दी गयी । आरोप है कि इस सबको भगवान सहाय शर्मा जो वर्तमान में कांग्रेस के प्रदेश कमिटी के संदस्य है, अपने समाज के युवाओ को नेतृत्व देते हुए अंजाम दिया ।

मान न लें यदि ये घटनायें- राजनैतिक प्रतिद्वंदी को कमजोर करने में भी उपयोगी थी, तो राजकुमारी जाटव जो कि भाजपा से है का ही मकान जलता । भरोसी लाल का मकान नहीं जलना चाहिए था । क्योंकि दोनों- भरोसी लाल और भगवान दास एक ही पार्टी कांग्रेस से सम्बंधित है । प्रश्न ये भी है कि ब्राहमण युवा अपनी पार्टी भाजपा के विधायक की रक्षा करने की बजाय उसका घर क्यों फूंक दे रहे है । उत्तर सीधा है जाति प्रतिष्ठा सर्वोपरि और जाति व्यवस्था कायम रहे । इसलिए पूरी प्रतिहिंसा की धुरी में ब्राह्मण युवा ही रहा है ।

राजनैतिक रूप से पेचीदा सा दिखाने वाला मामला समाज की सच्चाई है,जिसने सभी राजनैतिक पार्टियों का मुँह बंद किया हुआ है । कोई भी पार्टी और उसका नेता ( चाहे वो दलित ही क्यों न हों) इतनी बढ़ी घटना पर खुलकर नहीं बोल रहा है । पर दलित युवा सुन चुका है । जहाँ एक ओर इस घटना ने जातियों में बटे दलित समुदाय को और करीब कर दिया है । यानि वाल्मीकि,जाटव, मेघवाल, रेगर, बलाई,बैरवा , खटीक, धोबी ही नहीं बल्कि नट, सांसी और कालबेलिया जैसे विभिन्न समाजों को अपने अधिकारों को पाने के लिए एक एकजुट होने के स्तर पर ही सही करीब ला दिया है । वहीँ दूसरी ओर घटना ने भाजपा से दलित वोट और ‘हिन्दू लडाका’ को स्थायी रूप से दूर कर दिया है। आरएसएस विचारधारा का सबसे उग्र ध्वज वाहक, बजरंग दल जिसमें करीब करीब 90 प्रतिशत से ज्यादा या यों कहें कि सभी सड़क लडाका दलित समाज से आते है, को निश्चित रूप से धक्का लगेगा। ये आरएसएस शाखाओ में आई गिरावट से आसानी ने मापा जा सकता है ।

देखना दिलचस्प है कि इन सभी राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सीधे या समर्थन ( केवल बिहार) में सरकार है । इन सीधे राज्यों में भाजपा बहुत बड़े अंतर से अपने प्रतिद्वंदियों को हराकर सत्ता में आयी है। ये सरकारें ऐसे सामाजिक गठबंधन की उपज है,जिसमें दलित,आदिवासी ने एक बड़ी भूमिका निभाई। ये भूमिका दो मायनों में थी एक वोट देकर और दूसरी जो ज्यादा महत्वपूर्ण है, ‘अल्पसंख्यकों को सबक सिखाने’ के रूप में। जिसका पटाक्षेप देश में बहुसंख्यक ( हिन्दू) और अल्पसंख्यक ( मुस्लिम) के धुर्विकरण के रूप में होता है,जो भाजपा की मूल नीति और नीयत को सुहाता है । इस आन्दोलन ने धुर्विकरण के इस फोर्मुले की हवा निकाल दी है । जिसका सीधा असर सामाजिक और राजनैतिक दोनों स्तर पर पड़ेगा । राजनैतिक स्तर पर समझाना आसान है । इसका फायदा किसको मिलेगा बताना भले ही मुश्किल हो,पर इसका नुकसान किसको होगा समझना मुश्किल नहीं है।

(लेखक जेएनयू में शोधार्थी है और सामाजिक मुद्दों पर लिखते है )

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