ग्रामीण भारत में हुनरमंद स्कूली शिक्षा की जरूरत

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– सुरेन्द्रसिंह शेखावत
हमारे देश में प्रचलित स्कूली मॉडल मुख्यत: शहरी क्षेत्र को ध्यान में रख कर बनाया गया है इसीलिए उसका पूरा का पूरा ढांचा शहरी बैकग्राऊण्ड के बच्चों को पढ़ाने को लेकर तैयार किया गया।वास्तव में लॉर्ड मैकाले के समय में जब इस आधुनिक शिक्षा पद्धति की नींव डाली गई तब स्कूलिंग के उद्देश्य दूसरे थे जो समय के साथ पूरी तरह से बदल गये, मगर नहीं बला तो हमारा स्कूली ढांचा।
जब इस आधुनिक एज्यूकेशनल पैटर्न को डवलप किया गया उस समय तत्कालिक शासकों को उनके शासन में भागीदारी करने वाले कलर्क एवं कार्मिकों की आवश्यकता थी और उसी उद्देश्य से उन्होंने कलर्क और दूसरे तरह के सरकारी कामकाज करने वाले भारतीयों को पढऩे के लिये एक सिस्टम विकसित किया। यही सिस्टम आधुनिक शिक्षण पद्धति है।हालांकि बाद के सालों में खूब सारे प्रयोग स्कूलिंग सिस्टम को ठीक करने के लिये किये गये और किये जा भी रहे हैं परन्तु इसके मूल ढांचे में बदलाव की आवश्यकता महसूस नहीं की गई।इस आलेख में ग्रामीण स्कूलों के ढांचे पर बात करेंगे।
दरअसल इन स्कूलों का पैटर्न ग्रामीण क्षेत्र के अनुरूप किसी भी तरह से नहीं बैठता। हालांकि स्कूल्स का यह मॉडल हमारे शहरों के अधिक उपयुक्त भी नहीं है फिर भी शहरी बच्चा तो अपने आप को इसके अनुरूप फिर भी ढाल लेता है और उसे अनेक वैकल्पिक अवसर मिल जाते हैं लेकिन ग्रामीण परिवेश के बच्चे का साम्य किसी भी तरह से स्कूलों में स्थापित नहीं हो पाता।
हमारे देश की 62 फिसदी आबादी खेती पर निर्भर है और ग्रामीण भारत की बहुसंख्यक आबादी खेत-खलिहान से जुड़ी है। हमारे गावों में रोजगार का संकट भयावह है। हाल के वर्षों में गैर लाभकारी मुल्य, श्रम की कमी, कम वर्षा और दूसरे कई कारणों से खेती को मुश्किल बना दिया है जिसमें ग्रामीण जीवन दुष्कर हो गया है।
मानव श्रम की बढ़ती कमी मुख्य रूप से स्कूली से पढ़ कर निकलने वाले युवाओं की वजह से है। स्कूलों में पढ़ कर निकलने वाले युवाओं का मानसिक प्रशिक्षण सरकारी नौकरियों या फिर व्हाईट कॉलर जॉब के लिये किया जाता है। उन्हें मानसिक रूप से खेत में काम करने से विलग कर दिया जाता है, इसकी प्रमुख जिम्मेवार हमारी स्कूली शिक्षा पद्धति है।
स्कूलों से निकले बच्चे खेती के साथ ही पशुपालन जो पश्चिमी राजस्थान की अर्थव्यवस्था का आधार स्तम्भ है, से भी दूर हो रहे हैं। परम्परागत व्यवसायों के प्रति अरुचि भी यह स्कूली शिक्षा बढ़ा रही है जबकि सैकड़ो  वर्षों से गावों में रहने वाले कमेरे वर्ग के लोग कारपेंटर, मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार, केश कला का काम करने वाले नाई, रंगरेज, घड़ाई करने वाले लोग, सोने के आभूषण बनाने वाले, लोहे का काम करने वाले वर्ग अपनी आजीविका चलाते आ रहे हैं परन्तु इन स्कूलों में पढ़ कर निकलने के बाद इन परम्परागत व्यवसायों को हेय दृष्टि से देखने लगते हैं। इस दृष्टि से परम्परागत व्यवसायों में प्रवेश करने के लिये हमारा युवा तैयार नहीं होता है और निम्न स्तरीय स्कूली शिक्षा के कारण व्हाइट कॉलर जॉब उसे कहीं मिलता नहीं है। इन सब कारणों से ग्रामीण रोजगार का गम्भीर संकट पैदा हो गया है।
वैसे भी गावों में स्थित इन स्कूलों का स्तर इतना अच्छा नहीं होता कि इन्हें प्राइवेट सेक्टर में रोजगार मिल सके, इसलिये सारी भाग-दौड़ देश में उपलब्ध रोजगार में केवल 2 फिसदी हिस्सेदारी रखने वाली सरकारी नौकरियों के लिये की जाती है जबकि 60 से 70 फिसदी रोजगार खेती, पशुपालन और परम्परागत व्यवसायों से निकल रहा है।
पिछले दिनों प्रकाश में आई एस्पाइरिंग माईंड्स की ‘नेशनल इम्पलायबिलिटी रिपोर्ट’ चिंतित करने वाली है। वह रिपोर्ट बताती है कि इंजिनियरिंग डिग्री करने वाले स्नातकों में 80 फिसदी में कुशलता की कमी है और वे रोजगार के काबिल नहीं है।यह रिपोर्ट देश के 650 इंजिनियरिंग कॉलेजों में पढ़ रहे डेढ़ लाख छात्रों पर किये गये अध्ययन पर आधारित है।
कुछ सप्ताह पहले ‘एसोचैम’ की एज्यूकेशन कमेटी के सर्वेक्षण से जाहिर हुआ है कि देश में चल रहे साढ़े पांच हजार बिजनेस स्कूलों में से सरकार द्वारा संचालित आईआईएम और कुछ मुट्ठी भर संस्थानों को छोड़ कर शेष सभी स्कूली व संस्थाओं से डिग्री लेकर निकलने वाले ज्यादातर छात्र-छात्राऐं कहीं भी रोजगार पाने के लायक नहीं है।
रिपोर्ट को मानें तो आईआईटी को छोड़ कर अन्य संस्थानों से निकलने वाले पेशेवरों में केवल 7 फिसदी रोजगार पाने के लायक हैं।
हालात यह है कि एमबीए और बी.टेक. डिग्रीधारी नौजवान दस हजार रूपये से कम की पगार पर नौकरी कर रहे हैं।
इन सब सर्वे में आई बातें हमारी चिंताएं बढ़ाती है। अभी कुछ दिन पहले हमारे यहीं के कृषि विश्वविद्यालय में बी.एससी. प्रथम वर्ष के करीब 300 छात्र फैल हो गये।
इतनी बड़ी संस्था के छात्रों के फैल होने के कारणों की पड़ताल की तो सामने आया कि ये सभी छात्र ग्रामीण पृष्ठभूमि के हैं। ग्रामीण स्कूलों में शिक्षण के कमजोर स्तर से पढ़ कर आने और बी.एससी. में पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से होने के कारण वे फैल हो गये।
भाषा भी हमारे यहां बड़ी समस्या है। हिन्दी माध्यम से पढ़े छात्रों को अचानक अंग्रेजी माध्यम की ओर मोड़ देना बड़ी कठिनाई वाला काम होता है। वैसे भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र है। मगर हमने अंग्रेजी को ही ज्ञान का आधार मान लिया। हालात यह है कि इंजिनियरिंग, मैनेजमेन्ट, मेडिकल की किताबें हिन्दी में उपलब्ध नहीं है। ग्रामीण छात्रों के लिये भाषा का माध्यम भी बड़ा संकट है।
दरअसल हमारे यहां गावों में स्कूली शिक्षा को गरीबी से बाहर निकलने के पासपोर्ट के रूप में देखा जाता है। हमने मानसिकता विकसित कर ली कि डिग्री का सम्बन्ध रोजगार से है जबकि सत्यता यह है कि रोजगार का सम्बन्ध डिग्री से न होकर कौशल से है, स्किल से है।
गरीब को एक सपना बेचा जाता है कि डिग्री से रोजगार मिलेगा। गांव का किसान, मजदूर पेट काट कर अपने बेटे को स्कूली-कॉलेज में पढ़ाता है, उसे अपने परम्परागत पेशे से दूर रखता है। उससे खेती नहीं करवाता, पशु नहीं चरवाता और आखिरकार वह एक डिग्रीधारी बेरोजगार की फौज में भर्ती हो जाता है। किसान नहीं चाहता कि उसका बेटा किसान बने। परम्परागत रोजगार में लिप्त परिवार भी अपने बच्चों को उस स्किल से बाहर निकालने का रास्ता ढूंढते है। इस तरह स्कूली डिग्री का सपना आसानी से खुल कर बेचा जाता है।
कमजोर से कमजोर तबका, मजदूर और दलित सभी अपने बच्चों को किसी भी कीमत पर शिक्षित करना चाहते हैं।
लेकिन पूअर स्कूलिंग के चलते हम पूरी पीढ़ी को किसी लायक नहीं छोड़ते और बेरोजगारी के समुन्द्र की तरफ धकेल देते हैं। इन स्कूलों से निकला युवा पूरी तरह से ग्रामीण आजीविका और खेती के लिये अनफिट हो जाता है। स्कूलों में उसे सिखाया जाता है कि ये रोजगार हेय हैं और कागज कलम वाले रोजगार ही सम्मानजनक है। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद ये नौजवान अपने अभिभावकों की तरह शारीरिक श्रम और कठोर मेहनत करने में असमर्थ हो जाते हैं।
अफसोस की बात है कि उन्हें जो सपना दिखाया गया था ‘व्हाईट कॉलर जोब’ का वह उसमें प्रतिस्पर्धा के अयोग्य है क्योंकि उसे जो स्कूली शिक्षा दी गई उसका स्तर कॉम्पीटिटिव एक्जाम के अनुरूप नहीं था। उनके बुजुर्ग जो परम्परागत व्यवसायों का ज्ञान रखते हैं, वह कहीं भी उनकी डिग्री एज्यूकेशन में काम नहीं आता।ऐसे में ही नौजवान न तो उच्च स्तरीय क्वालिटी स्कूली एज्यूकेशन ले पाते हैं न ही अपने परम्परागत व्यवसायों में गुणवत्ता स्थापित कर पाते हैं जो उनके बुजुर्गों के पास है।
सरकारों ने पिछले 70 सालों में सामाजिक न्याय स्थापित करने का काम किया है उसमें हमारी सरकारों ने केवल आरक्षण को ही सोशल जस्टिस का आधार मान लिया है जबकि आरक्षण तो सामाजिक न्याय का एक बहुत छोटा हिस्सा है। बिना शिक्षा और रोजगार के सामाजिक न्याय कैसे सम्भव है। सरकारों ने आरक्षण के साथ ही शिक्षा और रोजगार की तरह सामाजिक न्याय की दृष्टि से काम करने की जरूरत महसूस नहीं की।
इसके अलावा एक बड़ा सवाल यह भी है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में कान्वेन्ट एज्यूकेशन हासिल किए हुए उम्मीदवार के साथ सुदूर देहात के सरकारी स्कूलों से पढ़ कर आये उम्मीदवारों को एक ही पारी में एक साथ दौडऩे को कहा जाता है।कल्पना कीजिए वो बराबरी की दौड़ कैसे हो पायेगी जिसे न स्तरीय शिक्षा मिली, न वातावरण मिला और न ही प्रतिद्वन्दी के समान अवसर।
इन सब तथ्यों के मद्देनजर हमें हमारी ग्रामीण स्कूली ढांचे में अमूलचूल परिवर्तन करने की बड़ी भारी आवश्यकता है।
क्या निकले हल ?
अब से पहले हमने इस बड़ी परेशानी का जिक्र तो कर लिया मगर इसका हल कैसे निकले यह बात ज्यादा महत्वपूर्ण है। हल निकलेगा ग्राम स्वराज्य की अवधारणा से। महात्मा गांधी ने जो ग्राम स्वराज्य की अवधारणा दी हमें उसकी ओर लौटना पड़ेगा।
दरअसल हमें हमारी ग्रामीण शैक्षणिक व्यवस्था में अमूलचूल परिवर्तन की दरकार रहेगी। हमारे गावों की समृद्धि उनकी खुबसूरती और वहां उपलब्ध परम्परागत रोजगार के बारे में अपनी सोच में बड़ा बदलाव लाना पड़ेगा। परम्परागत हुनरमंद लोगों को आधुनिक बिजनस पैटर्न में ट्रेंड करके इन परम्परागत पेशों के बारे में नजरीए को बदलना पड़ेगा।
हमारी ग्रामीण आजीविका को, हमारे परम्परागत रोजगारों को, कौशल को, हुनर को फिर से स्थापित करने के लिये मैकेनिज्म डवलप करने की जरूरत है।सीधे-सीधे शब्दों में हमें हमारी ग्रामीण स्कूलों को इम्प्रूव करना पड़ेगा। स्किल डवलपमेन्ट के एक्सपर्ट को इस दिशा में कार्यक्रम बना कर गावों में जाना होगा और स्कूलों को स्किल डवलपमेन्ट के प्रयोग से बेहतर ढंग से बदलाव आए यह सुनिश्चित करना होगा।
हालांकि हमारा जो वर्तमान का सोशल सिस्टम और पोलिटिकल सिस्टम है उससे लगता नहीं कि बदलाव आयेगा लेकिन बदलाव तो लाना पड़ेगा। जरूरत पड़ेगी परम्परागत व्यवसायों के सम्मान को पुन: लौटाने की। ऐसा नहीं है कि परम्परागत व्यवसायों में आमदनी की कमी है, दरअसल वहां केवल सम्मान की कमी है, अत: नये-नये स्किल डवलपमेन्ट के प्रोजेक्ट से जोड़ कर परम्परागत व्यवसायों के नये प्रयोग करने पड़ेंगे। परम्परागत व्यवसायों में नई मशीनरी, बेतहर मार्केटिंग, स्तरीय पैकेजिंग और विज्ञापन को जोड़ कर उन व्यवसायों का सम्मान लौटाना पड़ेगा।
आधुनिक स्कूलों का जो फ्रेम वर्क डिजाइन किया गया है उसमें ‘साक्षरता’ को प्राइमरी स्किल माना गया है, इसको बदल कर नई संरचना में हमारे यहां प्रचलित व्यवसाय खेती और दूसरे परम्परागत कार्यों को तकनीकी कौशल के आधार पर आजीविका से जोडऩे का फ्रेम डिजाइन करना पड़ेगा। हमने अक्षर ज्ञान को स्किल मान लिया है उसके मानक बदलने पड़ेंगे। जो ‘ट्रेडिशनल स्किल्ड पर्सन’ है, परन्तु निरक्षर है उनको भी हमारे स्कूली ढांचे में शामिल करना पड़ेगा। ग्रामीण दस्तकारों को, हमारे परम्परागत लोक संगीतकारों को, बढ़ई का काम करने वाले, खेती में नये-नये प्रयोग करने वाले, प्रगतिशील कृषकों को स्कूली के शिक्षक वर्ग में शामिल करके वैकल्पिक रोजगार के क्षेत्र विकसित करने की तैयारी करनी पड़ेगी।
गांधी के ग्राम स्वराज का, समृद्ध गांव का समग्र मॉडल है उसके अनुसार गांव में ही पूर्ण रोजगार की सम्भावना के साथ अच्छी शिक्षा के स्कूली ढांचे को खड़ा करना पड़ेगा जिसमें शिक्षा और रोजगार दोनों एक-दूसरे के साथ जुड़े रहें।नेशन बिल्डिंग के लिये रोजगार से पूर्ण सम्भावनाओं और सभी परम्परागत कौशल की गरिमा के साथ ‘बिल्डिंग विलेज’ की अवधारणा पर काम करना पड़ेगा।
हालांकि यह बहुत मुश्किल काम है क्योंकि जो सामाजिक परिस्थितियां हमारे आस-पास है, उसके अनुसार बच्चा स्कूल ही इसीलिए जा रहा है कि उसे परम्परागत व्यवसायों से दूर किया जा सके फिर नई अवधारणा में उसे पुन: परम्परागत व्यवसायों की ओर लौटाना बहुत चुनौतीपूर्ण है। लेकिन इस चुनौती को स्वीकार करना पड़ेगा। हमारे गावों में डिग्रीधारी बेरोजगारों की फौज बढ़ती जा रही है। कॉलेज पूरी करने के बाद वे खेती भी नहीं कर पा रहे हैं इसलिये असफल स्कूलिंग मॉडल को बदलने के लिये ग्रामीणों को आस-पासा की स्थितियों से अवगत करवाते हुए जीवंत ग्रामीण अर्थव्यवस्था के ढांचे की ओर लाना होगा ताकि स्कूलिंग के बाद स्थानीय व्यवसायों के लाभप्रद अवसर से रोजगार सृजन हो सके।
हमारी वर्तमान नीति के अनुसार सभी ग्रामीण बच्चों को व्हाइट कॉलर जॉब नहीं दिया जा सकता, अगर ऐसा हो तो हमें अब रोजगार के अवसर पैदा करने की तैयारी करनी होगी जो हमारे डवलपमेंट के वर्तमान मॉडल में यह सम्भव होता नजर नहीं आ रहा है।
ऐसे में हमारी बुनियादी जरूरतों के मुताबिक विद्यालयी शिक्षा का एक मॉडल जिसमें स्कूली शिक्षा और आजीविका प्रशिक्षण एक साथ हो ऐसा शैक्षिक और सामाजिक ढांचा खड़ा करना पड़ेगा।गौरतलब है कि भारत सरकार ने लोगों को रोजगार प्रदान करने के लिये स्किल इंडिया के अंतर्गत 2022 तक चालीस करोड़ लोगों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य बनाया है। वर्तमान में एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर दस युवाओं में से केवल एक युवा को कारोबारी स्किल हासिल है।
पढ़े-लिखे नौजवानों का रूझान मेडिकल और इंजीनियरिंग क्षेत्र में ज्यादा है मगर रोजगार हासिल करने के लिये केवल 2.5 फिसदी नौजवानों के पास शैक्षणिक योग्यता है।
भारत में हर साल करीब सवा करोड़ शिक्षित युवा तैयार होते हैं जिनमें केवल 37 फिसदी कामयाब होते हैं रोजगार हासिल करने में। कारण सरकारी नौकरियां तो सीमित है और प्राइवेट सेक्टर में कारोबारी प्रशिक्षण की सख्त जरूरत है। देश में सवा करोड़ बेरोजगार लाइन में खड़े हैं और केवल 35 लाख लोगों के लिये कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था है। इन सबमें ग्रामीण बेरोजगारी सर्वाधिक है, जरूरत है इसे अवसर में बदलने की। यह तभी सम्भव होगा जब खेती, पशुपालन, बागवानी, वृक्षारोपण, कृषि यंत्रों की मरम्मत, नये यंत्र निर्माण, परम्परागत ट्रेंड्स का आधुनिक तकनीक के साथ प्रशिक्षण दिया जाये। बेकार पड़ी भूमि को कृषि के अंतर्गत लाया जाये। पॉली हाऊस, ग्रीन हाऊस जैसी नई खेत की तकनीकों से नौजवान दक्ष कृषक तैयार किये गये। गावों में लघु उद्योगों का मॉडल भी विकसित किये जाने की आवश्यकता है। देश के बड़े अर्थशास्त्रियों का मानना है कि लघु उद्योगों में, उतनी ही पूंजी लगने से बड़े उद्योगों की तुलना में पांच गुना लोगों को रोजगार मिलता है।
इसलिए अब यह शुरूआत करने की आवश्यकता है कि स्कूली शिक्षा की प्रकिया में मध्यवर्ती कदम उठाते हुए एक बेहतर ग्रामीण स्कूली मॉडल पेश करें जिसमें आवश्यकतानुसार पाठ्यक्रम में सुधार किया जाए जो वास्तविक रूप से ग्रामीण भारत की आवश्यकता के अनुरूप हो।
(लेखक राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता है)

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