रेलवे के परीक्षार्थियों के लिए मीणा समाज की अच्छी पहल 

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-रवीश कुमार
मुझे नया जानना और आप लोगों को बताना अच्छा लगता है। आज सुबह 24 घंटे ट्रेन लेट होने के कारण भुवनेश्वर में कई छात्रों की परीक्षा छूट गई। मुझे कई लोगों के फोन आए मगर फोन करने वाला हर छात्र खुद को मीणा बताता था। मुझे लगा कि राजस्थान के छात्र हैं तो मीणा होंगे मगर ऐसा कैसे हो सकता है। सिर्फ मीणा तो नहीं हो सकते, दूसरे समाज के लोग भी होंगे। मुझे मीणा समाज के एक सज्जन ने बताया कि मीणा समाज के 50-60 लोगों की परीक्षा छूटी है मगर दूसरे समाज का मिला लें तो संख्या 500 से अधिक हो सकती है। मैं सोचने लगा कि बाकियों के फोन क्यों नहीं आए।
अब मैंने इस पर सुबह पोस्ट लिखा, जिस पर भक्तों ने गंदी गंदी गालियां दीं। अभद्र बातें की। लेकिन रेल मंत्रालय को बात समझ आ गई कि छात्रों का हक मारा गया और उन्होंने दोबारा परीक्षा देने का मौका दे दिया।
अब मैं दूसरी कहानी के बारे में जानने को लेकर उत्सुक होने लगा। जो कहानी मालूम हुई, वो आपको बताना चाहता हूं। अगर मीणा समाज के संगठनों ने अपने 50-60 छात्रों की परीक्षा छूटने पर हल्ला नहीं मचाया होता तो बाकी छात्रों को भी दोबारा परीक्षा देने का मौका नहीं मिलता। सामाजिक रूप से सिर्फ एक संगठन के सक्रिय रहने से सबको लाभ मिला।
मीणा समाज के एक सज्जन ने अपना नाम नहीं बताया मगर कहानी पूरी बताई। उनका कहना था कि सबका काम है, एक का नाम जाएगा तो लगेगा कि मैंने श्रेय लेने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि जब हम लोग रेलवे की ग्रुप सी और ग्रुप डी की परीक्षा देने जाते थे, तो स्टेशन पर रात गुज़ारते थे। खाने के लिए पैसे नहीं होते थे। अब हम सक्षम हैं तो हमने सोचा कि अपने भाइयों को स्टेशन पर भूखे रात गुज़ारने नहीं देंगे।
फिर हम लोगों ने सबको मेसेज किया और 350 नंबर की हेल्पलाइन बनाई। उसे सोशल मीडिया के ज़रिए सभी परीक्षार्थियों तक पहुंचा दिया। कोई डेढ़ सौ स्टेशनों पर लोग परीक्षार्थियों को उतारने, ठहराने और परीक्षा केंद्रों तक ले जाने के लिए मौजूद थे। अपनी-अपनी जेब से चंदा जमा किया और टारगेट रखा कि तीन से पांच लाख परीक्षार्थियों के भोजन पानी की व्यवस्था की जाएगी। सबसे यही कहा कहा गया कि धार्मिक अंधविश्वासऔर कर्मकांड में पैसे खर्च करना व्यर्थ का काम है। इसी पैसे का बेहतर इस्तमाल किया जाए। लोगों की बात समझ आई और हॉल मिला तो हॉल बुक किए गए, घरों में ठहराने का व्यवस्था की गई।
आप इन तस्वीरों को देख सकते हैं। किस तरह सोने से लेकर भोजन की व्यवस्था की गई है। सज्जन ने कहा कि हमने इस बात का भी ध्यान रखा कि सिर्फ मीणा समाज के छात्र ही न होंं। बाकी समाज के छात्रों को भी ठहराया। मुस्लिम छात्रों की भी मदद की। सबको एक साथ ठहराया गया। खिलाया गया। हम चाहते थे कि हमारे प्रयास का लाभ दूसरे समाज के लोगों को भी मिले।
नाम न बताने वाले सज्जन ने कहा कि बड़े अफसरों ने कम मदद की। कुछ अफसरों ने अच्छी मदद की लेकिन ज्यादातर रेलवे में ही काम करने वाले ग्रुप सी और ग्रुप डी के कर्मचारी हैं। कुछ कृषि विभाग और दूसरे विभाग में काम करने वाले वैज्ञानिक और मध्यम श्रेणी के अफसर लोग हैं। हम सबने अपने खर्चे से मदद का ये प्लान तैयार किया ताकि छात्रों को तकलीफ कम हो।
मुझे ये कहानी पसंद आई। लगा कि आपको बतानी चाहिए।

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