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Marx- Ambedkarism alliance: A Greater Need of History

मार्क्स -आंबेडकरवाद  का मेल : इतिहास की बड़ी जरुरत

-एच एल दुसाध

मेरा मानना है भारत के बहुजन अगर मार्क्स के नजरिये से भारत की हिस्ट्री को परिभाषित करते हुए अपना आन्दोलन आगे बढ़ाते तो हमारे आन्दोलन का चेहरा कुछ और होता. मार्क्स ने समतामूलक समाज का जो बेमिसाल सपना देखा ,उसके साकार होने की सर्वाधिक सम्भावना भारत और दक्षिण अफ्रीका में रही.
इन दोनों देशों में शोषक और शोषितों का वर्ग जितना क्लियर था , उतना रूस और चाइना में भी नहीं रहा. लेकिन भारत के मार्क्सवादियों द्वारा इस इज्म को हाइजैक कर लिए जाने के कारण भारत में क्रांति कि भ्रूण हत्या हो गयी.
आज भारत के जन्मजात शोषको का सिर्फ धन-दौलत ही नहीं, शक्ति के समस्त स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक-सांस्कृतिक इत्यादि) पर जिस तरह 90% से ज्यादा कब्ज़ा कायम हुआ है एवं जिस तरह दलित-आदिवासी- पिछड़े और इनसे धर्मान्तरित आबादी महज 10% धन-सम्पदा पर गुजर-बसर करने के लिए अभिशप्त हुई है, उससे विश्व इतिहास में फ्रेच-रसियन क्रांति से भी बेहतर हालात भारत में पैदा हो गए हैं.
 यहाँ जिस तरह 90% आबादी सापेक्षिक वंचना ( relative deprivation ) का शिकार है, वैसा मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में कभी शोषितों के साथ नहीं हुआ. अतः आज भारत में अम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद(सवर्ण-रहित ) के मेल  से विश्व में सबसे यूनिक क्रांति को अंजाम दिया जा सकता है.
ऐसा करने पर भारत में दक्षिण-अफ्रीका की भाँति मूलनिवासी वंचितों की  तानाशाही सत्ता कायम हो सकती है: यहां के जन्मजात  शोषकों को दक्षिण अफ्रीका के गोरों की भाँति  काबू में किया  जा सकता है. इसके लिए दो जरुरी काम करने होंगे. पहला, बहुजनों को ब्राह्मणवाद विरोध जैसे अमूर्त मुद्दों से दूर करने  के साथ मार्क्सवाद को सवर्णों से पूरी तरह मुक्त करना होगा. और अगर ऐसा हुआ तो भारत में एक स्वप्निल क्रांति को अंजाम देना जरा भी कठिन नहीं होगा.

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