महाराष्ट्र का किसान आन्दोलन और लेफ़्ट की राजनैतिक फसल

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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े संगठन ऑल इंडिया किसान सभा ने 6 मार्च को महाराष्ट्र के नासिक जिले से एक पदयात्रा निकाली, जिसकी संख्या मुंबई में आकर 35 हज़ार से ज्यादा की हो गई. जिन मांगों को लेकर ये पदयात्रा शुरू हुई थी वो काफी दिनों से महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में हर पार्टी के किसान इकाइयों के लिए चर्चा का विषय बने हुए थे और कई नए आन्दोलन समय समय पर खड़े हो रहे थे. पूर्ण कर्ज़माफी, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को सम्पूर्ण रूप से लागू करने और आदिवासियों को वन ज़मीन का अधिकार देने जैसे मांगे प्रमुख तौर पर दिखाई और पेश की गई. महाराष्ट्र की प्रमुख पार्टियों से मिले राजनैतिक समर्थन ने इस पदयात्रा की राजनैतिक महत्वता को प्रदर्शित किया, वहीँ फडणवीस सरकार ने मौके की नजाकत को देखते हुए एक आयोग बनाने का वादा कर दिया और ये भी दिलासा दी कि किसानों द्वारा उठाये गए सारे मुद्दे 6 महीनों के भीतर ही सुलझा दिये जाएँगे.
हालाँकि ये विदित है कि पिछले साल, महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार ने करीब 34 हज़ार करोड़ का बजट कर्जमाफी के लिए आवंटित किया था. जिसकी ज़मीनी हकीकत छह महीने बाद ही दिखने लगी थी जब भाजपा की सहयोगी शिवसेना और अन्य विपक्षी पार्टियों ने इसके कार्यान्वयन उपर तीखे सवाल खड़े किये थे. महाराष्ट्र सरकार के एक सर्वेक्षण के मुताबिक राज्य के लगभग 37% गांवों में सूखे जैसी स्तिथि बनी हुई है और हाल ही में हुए राज्य के 2017-18 के आर्थिक सर्वेक्षण ने कृषि विकास की दर ऋणात्मक तौर पर 8.3 प्रतिशत आँकी थी. इन सब पहलुओं को परखने के बावजूद सवाल ये है कि किसानों के मुद्दे आत्महत्या और कर्जमाफी तक ही क्यूँ सिमित रह जाते है. भारत में किसानों की समस्या संरचनात्मक है और इसके सामाजिक और आर्थिक पहलू जाति और जमीन स्वायत्ता से जुड़ा हुए हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई बार सार्वजनिक मंचो से ये दावा किया है कि देश के किसानों की आमदनी, 2022-23 तक 2015-2016 के पैमाने से दुगुनी हो जाएगी जिसकी मान्यता और कार्य योजना नीति आयोग ने भी तय कर दी है. पर प्रश्न ये है कि क्या दुगुनी हुई आमदनी बढती हुई महंगाई के साथ किसानों के ज़मीनी हकीक़त बदलने में कामयाब हो पाएगी या चीज़ें बाद में बदतर होती चली जाएंगी. ऐसे जटिल सवालों के जवाब तो आने वाले कुछ वर्ष ही तय करेंगे और समय के साथ सवाल और भी कठिन होते चले जाएँगे.

पर अहम सवाल ये है की क्या कर्जमाफी से या बार-बार गठित होने वाले आयोगों से किसानों की समस्याएँ हल हो जाएंगी. उत्तर हमेशा न में ही मिलेगा क्यूंकि बिना किसी कृषि अनुसन्धान के ढांचागत बदलाव के, सिंचाई के उपयुक्त साधनों के विकास के, असली ज़मीन सुधार के और कृषि आधारित आधारभूत संरचना के विकास के चीज़ें बदलने नहीं वाली. हालाँकि 2017 के बजट में कृषि अनुसन्धान, नाबार्ड को मिलने वाले कोष, कृषि वित्तपोषण (फाइनेंस), क्रेडिट प्रणाली को अच्छे से लागू करने पर और मिट्टी की जांच के लिए कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना पर विशेष जोर दिया गया था. परन्तु असल समस्या तब हल होगी जब इन पहलुओं को ज़मीनी स्तर पर लागू किया जाए और किसानों को आने वाली सामाजिक और आर्थिक अडचनों को भी बराबर की महत्वता दी जाए.
भारत में किसानों के मुद्दों पर होने वाली राजनीति को अधिकांश मौकों पर प्रभावशाली और आर्थिक तौर पर मज़बूत समाज से आने वाले के नेताओं ने की है. वहीँ अगर सामजिक पहलुओं पर और जोर डालें तो यही पता चलेगा कि किसानों के मुद्दों पर आधारित अधिकांश आंदोलोनों की भीड़ दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों से आने वाले समाज से बनती है. अपवादों को छोड़ दें तो यही जान पड़ता है कि ऐसे आंदोलोनों का राजनैतिक फायदा हमेशा की तरह उसी शासक समाज (भारत में अगड़ी जातियों) को होता आया है जिन्हें पता होता है कि कैसे किन मुद्दे से किस तरह का फायदा उठाया जा सकता है. भारत में लेफ्ट की राजनीति भी उसी मॉडल का हिस्सा है, जिसमे दबा-कुचलों के मुद्दों को राजनैतिक तौर से उठाया जाता है पर सामाजिक और आर्थिक तौर पर वहीँ का वहीँ रहने दिया जाता है.
बाबासाहेब आंबेडकर और मान्यवर कांशीराम ने समय समय पर भारत में फ़ैले लेफ्ट की राजनीति, विचार और उसे कर्मों की हमेशा ही आलोचना की है, जो कई मायनों में स्वीकार्य भी है. त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और केरल में ऐतिहासिक तौर पर दबाये गए दलित और आदिवासी इसका बहुत ही अच्छा उदाहरण हैं. महाराष्ट्र में लेफ्ट की मौजूदगी बहुत ही नगण्य है और माओवादी आंदोलोनों ने आदिवासी इलाकों में वामपंथ को थोडा बहुत बचा रखा है. इसके अलावा मौजूदा राजनीतिक स्तिथि में सिकुड़ता हुआ वामपंथी कुनबा भारतीय राजनीति में अपनी मौजूदगी को दिखाने का प्रयत्न ऐसे ही आन्दोलनों के माध्यम से कर रहा है और आने वाले दिनों में ऐसे ही प्रयोग करता रहेगा.
एतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो बहुजनों की इसमें हिस्सेदारी उन्ही के लिए घातक सिद्ध होगी और समय के साथ उनको ये पहचानना बहुत ही जरुरी है. किसानो और आदिवासियों के मुद्दों को लेकर वामपंथियों ने महाराष्ट्र में जो फसल बोई है उसकी उपज़ का फायदा किसे और कितना मिलेगा ये भविष्य में तय हो जाएगा. पर ये निश्चित है कि दबों-कुचलों की राजनीति करने वाले वामपंथियों के द्वारा किये गए ऐसे आन्दोलन हमेशा की तरह दलित-आदिवासियों को उनके हिस्सेदारी से दूर ही रखने का भरपूर प्रयास करेंगे.

लेखक- मोहम्मद इमरान (छात्र)
दलित एंड ट्राइबल स्टडीज एंड एक्शन, स्कूल ऑफ़ सोशल वर्क,
टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई.
ईमेल: imraniramtwit@gmail.com

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