पाली के पूर्व जिला प्रमुख खुशवीरसिंह ने फेसबुक पर उजागर की अपने मन की पीड़ा

कहा - दलितों का अपमान करनेवाले तत्व राजपूत समाज को नीचा दिखा रहे है !

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3 अप्रेल से मै सोशल मीडिया पर देख रहा हूँ और ऑडियो भी सुन रहा हूँ.जैसे मैंने कोई राष्ट्र द्रोह कर दिया हो.कई राजपूत समाज के नासमझ बच्चे जिन्होंने मेंरे लिये जिन-2 शब्दों का उपयोग किया हैं,मुझे तो वो शब्द दोहराते भी शर्म आती है,मैंने ऐसा कौन सा समाज विरोधी काम किया या कोई घ्रणित कृत्य कर दिया या गरीबो के साथ जुल्म और अत्याचार कर समाज को नीचे दिखाने का काम किया हो.

मैं और मेरा परिवार राजनीति में सन 1952 से है.मेरे पिताश्री विधायक रहे,मेरे अग्रज भी प्रधान,सरपंच लम्बे समय तक रहे, मैं भी राजनीति में विभिन्न पदों पर रहा हूँ .प्रधान,एमएलए,राज्य वित्त आयोग का सदस्य,ज़िला प्रमुख,राजस्थान ज़िला प्रमुख संघ का प्रदेश अध्यक्ष भी रहा.यह सब मुझे जो कुछ मिला जनता के आशीर्वाद से ही मिला,कोई भी व्यक्ति सिर्फ एक जाति के बलबूते पर राजनीति नही कर सकता.

मुझे छत्तीस ही कौम का आशीर्वाद है,मेरा और मेरे परिवार का गौरवशाली इतिहास व ईमानदार बेदाग राजनीति पृष्ठभूमि रही है. मारवाड़ रियासतकाल में मेरे पूर्वजो ने अपनी मातृभूमि के लिये बलिदान दिया है, मारवाड़ रियासत के अन्तिम ठाकुर श्यामसिंह जी जिनका सर धड़ से अलग होने के बाद भी लड़ते-2 शहीद हुए,जिनकी छतरी आज भी जोधपुर दुर्ग के बाहर स्थित है.मेरे दाता हुकम ने कांठा(अरावली)में सन 1954 से 1958 के बीच लगभग 50 डाकुओं के आत्मसमर्पण में सहयोग कर क्षेत्र में शांति व्यवस्था स्थापित की.

आजादी से पूर्व जोधपुर रियासत से 1- सोजत से देसूरी और 2- जोधपुर- सरदारसमन्द जोजावर तक ग्रेवल सड़क का (छिनवा काल)में निर्माण करवाया था.जोधपुर से उदयपुर रेल मार्ग प्रारम्भ करवाने में भी पूर्ण सक्रिय भूमिका निभाई,जिसकी दो बार भास्कर में खबर भी छपी थी.

मैं धन्यवाद तो मेरे राजनीति प्रतिद्वंदी को देना चाहूंगा जिन्होंने कभी भी मेरे और मेरे परिवार पर भ्रष्टाचार, बे-बुनियाद आरोप या कभी अभद्र(ओछी)भाषा का उपयोग नही किया.मेरे परिवार ने ईमानदारी से जनता की सेवा की है.मैं समाज के उन बुद्धिजीवी पढे-लिखे जो थोड़ी-बोत राजनीति/सामाजिक सोच रखते है जिन्होंने सोशल मीडिया पर वो पोस्ट पढ़ी या सुनी है, उनका इस ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा उनके बारे में आप क्या कहोगे और लिखोगे ?

चलो मेरे लिये जो लिखा या बोला उसे नजरअंदाज कर देराओ, ऐसे तो समाज के पैसे वाले लोगो ने पहले भी पाली के कांग्रेस भवन में भरी सभा मे मुझे माँ की गालियां तक दे चुके है.तब भी मैं सिर्फ संस्कारों की बात कह कर भूल गया (जिसको घर मे संस्कार ही ऐसे मिले ये उनका दोष नही है) लेकिन वो तत्व जो समाज को नीचा दिखाने का कृत्य कर रहे है, नके लिये तो समाज को कुछ सोचना ही होगा,जो अपने स्वार्थ के लिये समाज का झण्डा दिखा कर स्वार्थ सिद्ध करना चाहते है या फिर किसी दलित समाज के दूल्हे-राजा(बीन्द-राजा)का घोड़े पे बैठने का विरोध कर समूचे समाज की बे-ईज्जती करवाते है। उनके लिये तो सोचना होगा.

हमे याद रखना चाहिए कि ‘बीन्द को राजा का सम्मान’ कोई आजादी के बाद से नही मिला ,यह तो हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्ष पूर्व दिया था. मुझे याद है जोजावर व आस-पास के गांवों में किसी की भी शादी होती तो बारात विदा होने से पहले बीन्द-राजा आशीर्वाद लेने मेरे दाता हुकम के पास आते तब मेरे दाता हुकम खड़े होकर उनका अभिवादन करते थे, चाहे किसी भी जाति का भी बीन्द हो.

मैंने एक बार बचपन मे अज्ञानतावश पुछ लिया कि आप क्यों खड़े होते हो.मुझे फरमाया -बेटा बीन्द राजा है चाहे वो किसी भी जाति का हो उसे अपने पूर्वजो ने राजा की पदवीं दी है.राजा का सम्मान तो करना अपना फर्ज है .मुझे याद है जोजावर में रेगर समाज के शादी में घोड़े रावला से जाते थे.

हाँ, एक बात तो सत्य है, घराने के संस्कार का तो फर्क अवश्य पड़ता है. कोई व्यक्ति जाति या पैसों से बड़ा नही होता है.उस व्यक्ति को घर मे संस्कार कैसे मिले हैं ? किस वातावरण में लालन-पालन हुआ यह सब संस्कारों पर निर्भर करता है.जिन लोगो ने मुझे गालियां दी यह उनका दोष नही है, यह तो उनको घर मे संस्कार ही ऐसे मिले हैं.

एक तरफ तो हम अपने गौरवशाली इतिहास की दुआएं देते है, चाहे महाराणा प्रताप हो, पृथ्वीराज चौहान हो, छत्रपति शिवाजी हो, वीर राठौड़ दुर्गादासजी या फिर चाहे पद्मावती का जौहर, इन सब के त्याग तपस्या और बलिदान पर समाज के ऐसे लोग पानी फेर रहे है।
दलित समाज से घृणा करने वालो को कहना चाहता हुँ कि वो आज भी हमारे पूर्वजों को पूजते है- चाहे बाबा रामदेवजी हो,चाहे पाबूजी राठौड़ हो. मैं उनसे पूछना चाहता हूँ हम उनके कितने मंदिर बनाकर पूज रहे है?

जिस समाज के लिये नादान बच्चों नें मुझे गालियां दी, वो ही समाज आज भी पाबूजी राठौड़ और रामदेवजी को घर-2 मन्दिर बना कर पूज रहे है। याद करो राणा पुंजा(भील) महाराणा प्रताप का सेनापति जिसके सहयोग से महाराणा प्रताप हिंदुआ सूरज कहलाये, याद करो रैदासजी को जिनको मीरांबाई ने गुरु मानकर भगत शिरोमणि कहलाई.याद करो भगवान राम को जिन्होंने शबरी (भील)के झूठे बैर खाकर भी मर्यादा-पुरुषोत्तम कहलाये और उन मर्यादा-पुरुषोत्तम के जीवन चित्रण को बाल्मीकि ने लिखा जो आज भी बाल्मीकि-कृत रामायण से जानी जाती है।

“जाति” से कोई बड़ा छोटा नही होता संस्कारों से बड़ा होता है,मेरी भावना से किसी को ठेस पहुंची हो तो क्षमा चाहता हूँ.

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