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Kaveri Water Dispute: Historical Decision of the Supreme Court

कावेरी जल विवाद : सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

-अनुराग चौधरी

कावेरी नदी कर्नाटक के कोडागू जिला के ब्रह्मागिरी पहाड़ी के तलाकावेरी क्षेत्र से निकलती है जो तमिलनाडु से बहती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है.कावेरी नदी के पानी का सबसे ज्यादा जरुरत कर्नाटक और तमिलनाडु को है.दोनों राज्यों में काफी बांध भी बना दिए गये है जिससे जल विवाद बढ़ता ही जा रहा था.

कावेरी जल विवाद को लेकर झगडा अंग्रेजी हुकूमत के समय से ही है क्योंकि यह नदी कर्नाटक से निकल कर तमिलनाडु को ज्यादा फायदा दे रही थी.तमिलनाडु में किसान इसके पानी से खेतों की बहुतायत में सिंचाई करते हैं.1892 से 1924 तक अंग्रेजी हुकूमत के दौरान ही इसके पानी के प्रयोग को लेकर मैसूर साम्राज्य व मद्रास प्रेसीडेंसी के बीच करार भी हुआ था.कर्नाटक राज्य उस समय मैसूर साम्राज्य व तमिलनाडु राज्य मद्रास प्रेसीडेंसी में आता था.

1913-1916 के बीच मैसूर की सरकार ने मद्रास प्रेसीडेंसी को एक खत लिखता है.मै कावेरी नदी पर एक जलाशय का निर्माण करना चाह रहा हूँ.मद्रास प्रेसीडेंसी को शक होता है की मैसूर की सरकार पानी ज्यादा जमा कर लेगी जिससे जो भी किसान मद्रास में खेती कर रहे है उनको काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है.इसीलिए अंग्रेजी हुकूमत को मामले को सुलझाने के लिए बीच में आना पड़ता है.जिससे काफी बातचीत के बाद मैसूर सरकार को एक छोटा सा बांध बनाने की अनुमति मिलती है पर फिर भी मद्रास प्रेसीडेंसी खुश नही होती है और इस फैसले को चुनौती देती है.फिर 1934 में यह मामला एक समझौते पर राजी होता है,जिसमे मैसूर और मद्रास एक करार करते है.जहाँ मैसूर राज्य को कन्नामडी गाँव में एक बांध बनाने की अनुमति मिल जाती है पर यह करार सिर्फ 50 सालों के लिए ही होता है और सशर्त की मद्रास को पानी कम नही होना चाहिए जिससे मद्रास के किसानों को कोई नुकशान ना हो.तब इस करार के तहत कृष्णाराजा सागर बांध बन कर तैयार हो जाता है.

1924 में जो करार मद्रास साम्राज्य के बीच हुआ था 1974 में 50 साल पूरे होने के बाद कर्नाटक ज्यादा पानी प्रयोग करना शुरू कर देता है.तब तमिलनाडु सरकार को लगता है कि कावेरी नदी में पानी कम आ रहा है जिससे किसानो को काफी नुकशान हो रहा है,
चूँकि 1974 तक बैंगलोर में शहरीकरण काफी फल फूल रहा था जिससे कावेरी नदी के पानी को सिंचाई के अलावा उद्ध्योग धंधे में भी प्रयोग में लाया जा रहा था,इसीलिये 1986 में तमिलनाडु सरकार केंद्र सरकार के पास जाकर गुहार लगाती है की करार खत्म होने के बाद मुझे समुचित पानी नही मिल रहा है,इसीलिए आप एक ट्रिब्यूनल बनाइये जिससे हम लोगों को भी पर्याप्त पानी मिले इस तरीके का अन्याय हम ज्यादा बर्दास्त नही करेंगे.आप नियम कानून बनाइये जिससे सभी राज्यों को समुचित पानी मिले.

2 जून 1990 को न्यायाधीश चित्तातोस मुख़र्जी की अध्यक्षता में कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल(CWDT) केंद्र सरकार के दयारा उच्चतम न्यायालय के दिशा निर्देश पर बनाया जाता है.

25 जून 1991 को कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल ने एक अनंतिम फैसला करता है जिसमे कहा जाता है कर्नाटक 205 हजार मिलियन क्यूबिक फीट पानी तमिलनाडु को देगा और कर्नाटक को साथ में ये भी कहा की वह अपना सींचित भूमि को 1,12000 एकड़ है उसको और ज्यादा ना फैलाये क्यूंकि जितना ज्यादा खेती बढ़ाएंगे उतनी ज्यादा उन्हें पानी की अवश्यकता होगी जिससे फिर से दोनों राज्यों में तनाव बढेगा,फिर भी दोनों राज्यों में इस फैसले के खिलाफ हिंसाएँ हुई ,विरोध हुए.

कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल ने चार राज्यों में कावेरी नदी का पानी 740 हजार मिलियन क्यूबिक फीट पानी था जो इस प्रकार से विभाजित किया :-
तमिलनाडु – 419 हजार मिलियन क्यूबिक फीट
कर्नाटक – 270 हजार मिलियन क्यूबिक फीट
केरल – 30 हजार मिलियन क्यूबिक फीट
पुंडीचेरी – 7 हजार मिलियन क्यूबिक फीट

बचे हुए 14%पानी को पर्यावरण संरक्षण के लिए सुरक्षित कर दिया गया,जबकि असल में जरुरत चारों को 1000 हजार मिलियन क्यूबिक फीट पानी की जरूरत थी जिसके कारण इतना बड़ा आज विवाद जन्म ले लिया.बात है 2000 की जब बंगलोर एक बहुत बडा शहर बन चूका था अब यह शहर अंतर्राष्ट्रीय शहर में शुमार करने लगा था.अब इस शहर में बहुत सारे कारखाने ,उद्योग धंधों का यहाँ निर्माण हो चूका था.इस शहर की जनसंख्या पूरे भारत में सबसे तेजी से बढ़ रही है जिसके वजह से कर्नाटक को सारी समस्याये झेलनी पड़ रही थी.

1991 जो भी फैसला कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल ने दिया था कर्नाटक उसका पालन नही कर पा रहा था,जिसके कारण तमिलनाडु ने उच्चतम न्यायालय में गुहार लगाई की कावेरी प्रबंधन बोर्ड जिससे हमें जितना पानी मिलना चाहिए मिले क्योंकि तमिलनाडु को उचित पानी ना मिलने की वजह से यहाँ के किसान और उद्योग धंधों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है.

28 मई 2013 को तमिलनाडु उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाता है और कहा मुझे कर्नाटक 2,480 करोड़ क्षति/ भरपाई के रूप में दे,क्योंकि उसने कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल के आदेशों का अनुपालन नही किया,जिससे हमारे राज्य को काफी नुकसान हुआ है.
फिर इस मामले को उच्चतम न्यायालय अपने पास ले लेता है और उसने फैसला सुनाया कि-
1.कावेरी नदी एक राष्ट्रिय सम्पदा है.
2.यह नदी तट राज्यों के बीच अंतर्राष्ट्रीय नदी के पानी के सामान विभाजन को सही ठहराया.
3.तमिलनाडु के किसानो को ना ध्यान देकर बंगलोर के लोगों के अजीविका को लेकर ज्यादा ध्यान दिया गया है.
4.तमिलनाडु के पास चूँकि अभी काफी भूमिगत जल भी है जबकि कर्नाटक के पास ज्यादा भूमिगत जल नही है.आपको ये जानकर हैरानी होगी की बंगलोर में एक भी नदी नही है सिर्फ झील ही है.
5.कर्नाटक को 14.75 हजार मिलियन क्यूबिक फीट और ज्यादा पानी मिलेगा जबकि तमिलनाडु को 404.25 हजार मिलियन क्यूबिक फीट ही मिलेगा.
6.कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल के फैसले को उच्चतम न्यायालय ने बदल दिया है.

अगर बंगलोर शहर की बात की जाय तो यह शहर काफी बड़ा है और यहाँ कोई भी नदी नही है और इस शहर के आसपास 100 KM तक कोई बारहमासी नदी नही है,कावेरी नदी भी लगभग 100 KM दूर से बहती है.

बंगलोर को पहले से ही “झीलों का शहर” कहा जाता है पर इन झीलों से पूरे शहर को जल आपूर्ति करना मुश्किल हो गया है.ये झीलें बहुत प्रदूषित हो गयी हैं.इसमें कभी कभी आग भी लग जाती है क्यूंकि बंगलोर का सारा सीवेज झीलों में ही जाता है जिससे मीथेन और फास्फोरस उत्सर्जित होती है जो ज्वलनशील होती है.

अनुमान है की बंगलोर की जनसंख्या 2020 तक 1 करोड़ पहुँच जायेगी तो और विकट समस्या उत्पन्न होगी.भारतीय विज्ञान संस्थान के एक रिपोर्ट के अनुसार 2025 तक बंगलोर में रहना दूभर हो जायेगा.

अगर इन समस्याओं से निजात पाना है तो कर्नाटक के नागरिकों और सरकार को कुछ खास कदम उठाने पड़ेंगे जैसे बंगलोर के नागरिकों को दूसरे शहर में विस्थापित किया जाय,सीवेज सिस्टम बनाये जाये, ड्रेनेज सिस्टम बनाये जाये ,किसान गन्ना और धान की खेती करने बचें जिससे पानी की खपत कम हो.

( लेखक डॉ राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय,लखनऊ के तृतीय वर्ष के विधि छात्र है )

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