कर्नाटक चुनाव और दलितों तथा लिंगायतों की बदलती भूमिका

- मोहम्मद इमरान

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पिछले महीने के आखिर में चुनाव आयोग ने कर्नाटक चुनाव की तारीखों की घोषणा की. इससे पहले ही कर्नाटक की सभी पार्टियों ने अपनी कमर कस ली थी क्यूंकि 2018 के कर्नाटक चुनाव उन पार्टियों के आने वाले भविष्य के लिए एक फाइनल मैच की तरह है. कांग्रेस के लिए जहाँ एकमात्र बचे हुए ‘दुर्ग’ को बचाने की चुनौती है, वहीँ दूसरी ओर जेडीएस और बीजेपी के लिए सत्ता में वापसी की उम्मीद. हालाँकि इसी बीच दलित और लिंगायत समुदाय के बीच जिस तरह के राजनैतिक समीकरण देखने को मिल रहे हैं वो अपने आप में अप्रत्याशित है.

सिद्धारमैया की कांग्रेस पार्टी जिसने अहिंदा (पिछड़ा वर्ग, दलित समुदाय और अल्पसंख्यकों का कन्नड़ में शॉर्ट फॉर्म) समीकरण पर पिछला चुनाव जीता था वो फिर से इसी समीकरण को दोहराने की कोशिश में लगी हुई है और इसके साथ ही लिंगायतों को अपने पाले में लाने की भरपूर कोशिश कर रही है. लिंगायत धर्मगुरुओं और मठों से मिल रहे लगातार समर्थन ने कांग्रेस की अपेक्षाओं को कई गुना बढ़ा दिया है. हालाँकि, जेडीएस और बीजेपी ने पिछले कई दिनों से इस राजनैतिक समीकरण को साधने की कोशिश की है और इन दोनों पार्टियों के बड़े नेताओं ने इस समीकरणों के जमीनी हकीकत को एक सिरे से नकारा है. दलितों और लिंगायतों का पूरा वोट कांग्रेस में जाएगा ये कहना एक बहुत बड़ी चूक होगी. क्यूंकि सभी पार्टियों कर्नाटक की लगभग 35 प्रतिशत जनसँख्या बनाने वाले इन दोनों समुदायों को रिझाने की हर कोशिश कर रहा है.

छह करोड़ आबादी वाले कर्नाटक में दलितों की तादाद करीब 18 फीसदी है. इस राज्य में हमेशा से ही दलितों की राजनीति दो प्रमुख जातियों मदीगा और चालावाडी के इर्द गिर्द ही घूमी है. गौरतलब है कि इन दोनों जातियों के बीच हिस्सेदारी को लेकर हमेशा से मतभेद रहे हैं और फ़िलहाल इन मतभेदों का बीजेपी फायदा उठाने की अच्छी कोशिश कर रही है. दरअसल कई सालों से मदीगा जाति के लोग अपने लिए अनुसूचित जाति को मिलने वाले आरक्षण के भीतर ही अलग आरक्षण की मांग पर विरोध-प्रदर्शन करते आ रहे हैं. मदीगा जाति के लोगों का कहना है कि उन्हें कायदे से 8 से 10 फीसदी के बीच आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए, जबकि उनके हिस्से में आ बहुत ही कम रहा है. मदीगा जाति के लोगों की शिकायत है कि दलितों के लिए आवंटित बजट का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ चालावाडी जाति के लोगों को दे दिया जाता है. कर्नाटक में चालावादी जाति के लोग परंपरागत तौर पर कांग्रेस और जेडीएस को समर्थन देते आये हैं और मल्लिकार्जुन खड्गे जैसे नेता इस जाति सबसे बड़े नेता के तौर पर गिने जाते हैं वहीँ मादिगा जाति के परिपेक्ष से देखें तो सात बार से सांसद केएच मुनियप्पा एक बड़े नेता हैं. पर बीजेपी की तरफ से किये गए वादे (अनुसूचित जाति के भीतर मदीगा जाति के लिए आंतरिक आरक्षण) ने कांग्रेस के लिए मुसीबत खडी कर दी है. वहीँ दूसरी ओर जेडीएस और बसपा के बीच के गठबंधन ने दलित राजनीति के समीकरणों को बदला है. हालाँकि, बसपा को एचडी कुमारस्वामी की जेडीएस ने केवल 14 सीटें ही दी हैं पर दोनों पार्टियों के बीच का गठबंधन दलित वोटों को जरुर प्रभावित करेगा. अगर इन सारे समीकरणों की सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए तो कर्नाटक विधानसभा में दलितों के प्रभाव वाली 60 सीटों का महत्व खासा बढ़ चुका है.

वहीँ दूसरी ओर लिंगायतो के वोट किस तरफ जाएँगे ये अभी भी एक टेड़ी खीर जैसा एक सवाल बन चुका है. राज्य की 18 प्रतिशत जनसँख्या के साथ सबसे प्रभावशाली तबका कहे जाने वाले लिंगायत इस चुनाव में काफी दुविधा में है. दरअसल आज़ादी के बाद से ही लिंगायत समुदाय एक अलग धर्म की पहचान को लेकर संघर्षरत थी और उनके आंदोलोनों को सभी पार्टियाँ लगातार नज़रंदाज़ करती आ रही थी. पर पिछले साल हुए आंदोलोनों को सत्तारूढ़ कांग्रेस ने जिस तरह से समर्थन दिया उससे बीजेपी की जमीन खिसकने का डर पैदा हो गया. विदित है की लिंगायत समुदाय 70 के दशक में देवराज उर्स ने पिछडो, दलितों और अल्पसंख्यकों को एकसाथ लाकर प्रदेश में सरकार बनायीं और तब से ही अमूमन लिंगायतों ने कांग्रेस के विरोध में ही वोट किया किया है. 80 के दशक के बाद रामकृष्ण हेगड़े और उनके बाद बीएस येदियुरप्पा ने लिंगायतों का प्रतिनिधित्व किया. लिंगायतों से मिलने वाले भरपूर समर्थन ने बीजेपी को 2008 में दक्षिण में पहली सरकार बनवाने में अहम किरदार निभाया. हालाँकि 2011 में, खनन घोटाले में लिप्त होने के आरोपों के बाद येदियुरप्पा ने इस्तीफा दिया और पार्टी के भीतर तवज्जो न मिलने पर उन्होंने ‘कर्नाटक जन पक्ष’ के नाम से एक अलग पार्टी बनायी और 2013 में हुए विधानसभा के चुनावों में उन्होंने भाजपा के लिए ऐसा रोड़ा खड़ा कर दिया जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिला. इसका नतीजा ये हुआ कि भाजपा 110 सीटों से मात्र 40 सीटों पर सिमट गयी और सिद्धारमैया के नेतृत्व में राज्य में कांग्रेस की सरकार बन गयी.
मौके की नजाकत को देखते हुए 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व बीजेपी को येदियुरप्पा को वापस बुलाया और इससे पार्टी के जनाधार में जबरदस्त इजाफा हुआ. हालाँकि लिंगायतों के अलग धर्म के मामले में बीजेपी कांग्रेस से परास्त हो गयी और उनकी हिन्दुत्ववादी विचारधारा इस राजनीति में सही विकल्प मुहैय्या कराने में पूरी तरह नाकाम रही.

कर्नाटक की राजनीति में मठों का काफी महत्व है. यहाँ की लगभग हर जाति के अलग-अलग मठ हैं और पिछले कई दिनों से अमित शाह और राहुल गाँधी विभिन्न मठों का दौरा कर रहे हैं और अपनी पार्टी के समर्थन के लिए गुहार लगाते फिर रहे हैं. इसी बीच दिलचस्प बात ये हुई है कि लिंगायत समाज के मठाधीशों की सबसे बड़ी संस्था ‘फ़ोरम ऑफ़ लिंगायत महाधिपति’ ने 8 अप्रैल को आधिकारिक तौर पर ये घोषणा कर दी कि आने वाले विधानसभा चुनावों में उनका समाज कांग्रेस का समर्थन करेगा. अब सवाल ये है कि क्या लिंगायत समाज अपने मठों की बात मानेगा या अपने समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले (येदियुरप्पा) की? इसके साथ ये भी प्रश्न है कि क्या लिंगायत वोट अच्छी मात्रा में कांग्रेस के पाले में आ पाएगा या गुजरात के पटेलों की तरह लिंगायतों का वोट भी बीजेपी के साथ बरक़रार रहेगा.

पिछले दिनों सिद्धारमैया ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमे उन्होंने कर्नाटक के विकास के मॉडल को “गुजरात मॉडल” से बेहतर बताया था. उन्होंने पिछड़े, दलितों, उच्च जातियों और मुस्लिमों के औसत आय में आये सुधार से इस मॉडल को एक समावेशी विकास का मॉडल करार दिया था. हालाँकि ये भी बात स्वीकार्य है कि कर्नाटक उन गिने चुने राज्यों में से एक है जिनमे देवदासी जैसी प्रथा आज भी प्रचलन में है, विभिन्न मानवधिकार संस्थानों के हस्तक्षेप के बावजूद इस कुप्रथा में होने वाले जमीनी सुधार नगण्य के बराबर हैं. इसके अलावा कर्नाटक के आदिवासियों और दलितों पर होने अत्याचार दक्षिण के कई राज्यों से ज्यादा हैं. सीमावर्ती कर्नाटक के शहरों में बढती साम्प्रदायिकता भी सिद्धारमैया जी के ‘समावेशी मॉडल’ पर सवाल खड़ा करती हैं. समावेशी विकास को केवल आर्थिक आधार पर मापना ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार विकास और जीडीपी को एक दूसरे का पर्यायवाची बताना.

( लेखक दलित एंड ट्राइबल स्टडीज एंड एक्शन, स्कूल ऑफ़ सोशल वर्क,टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई के छात्र है ,सम्पर्क सूत्र -ईमेल: imraniramtwit@gmail.com )

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