‘कालूड़ी’ का ‘काला सच’ – दलित गाँव छोड़ने को है मजबूर !

राजस्थान के बाड़मेर जिले के कालूड़ी गांव के 70 दलित परिवारों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया है ,जिससे वे  गांव छोड़ने को विवश हो चुके है .

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– भट्टा राम
देश आजाद होने के 71 वर्षों के बाद भी दलित गुलामी में जी रहे है।
बाड़मेर जिले के पुलिस थाना बालोतरा के अंतर्गत कालूड़ी गांव के अनुसूचित जाति के मेघवाल जाति के 70 परिवारों की बहिष्कृत कर दिया गया है। कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर कालूड़ी गांव के सवर्ण वर्ग के राजपुरोहितों ने दलितों को डेढ, नीच बोलकर पोस्ट लिखा था जिसके विरोध में रावता राम बायतु ने बालोतरा पुलिस थाने में अनुसूचित जाति जनजाति अत्यचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दायर की थी।
उन युवको पर एफआईआर दर्ज होने के कारण सवर्ण मनुवादी लोगो ने गांव में पंचायत बुलाकर दलितों का बहिष्कार कर दिया। कुछ युवकों के साथ मारपीट की, मेघवाल जाति के 70 परिवारों को गांव से बहिष्कृत कर जीना दुश्वार कर दिया है, उनका हुक्का-पानी बंद कर दिया, दुकानदारों ने राशन सामग्री देना बंद कर दिया है। गांव के सार्वजनिक टांके से पानी भरना बंद कर दिया है । कालूड़ी गांव में मजदूरी करने पर रोक लगा दी गयी है, दिनांक 16.08.2018 को 8वीं से 10वीं कक्षा तक पढ़ने वाले 9 विद्यार्थियों का रास्ता रोक कर उन्हें तृमासिक टेस्ट/परीक्षा देने से वंचित कर दिया।  दिनांक 16.08.2018 को बालोतरा पुलिस थाना में प्र.सू.रि. सं. 323 दर्ज हुआ किन्तु 14 दिन व्यतीत होने पर प्रकरण में पुलिस प्रशासन ने उचित कार्रवाई नहीं की है।
अनुसूचित जाति के मेघवाल जाति के लोगों का कहना है कि कालूड़ी गांव में जीवन यापन करना मुश्किल है और हम सामुहिक रूप से गांव छोड़ना चाहते हैं सरकार हमें सुरक्षित स्थान पर बसाने की व्यवस्था करदे ।मुख्यमंत्री के नाम उपखंड अधिकारी को ज्ञापन सौंपकर मेघवाल समाज कालूड़ी के समस्त परिवारो का कालूड़ी गांव से अन्यत्र पुनर्वास कराने की मांग की है। इस मामले पर 17 आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है लेकिन अभी तक एक भी आरोपी गिरफ्तार नही हुआ है।
इससे गुस्साए लोगों ने दिनांक 28.08.2018 (मंगलवार) को आक्रोश रैली निकाल कर आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग की। दलितों ने फ़ेसबुक पर कमेंट करने वालो तथा दलितों का हुक्का- पानी बंद करने का हुक्म सुनाने वाली पंचायत के खिलाफ गिरफ्तारी की मांग कर रहे है।
इस रैली में बालोतरा उपखंड के निकटवर्ती गांवो के साथ-साथ दूरदराज इलाको से भी दलित समाज के लोगो ने हिस्सा लिया। आक्रोश रैली में महिलाओं ने भी बड़ी तादाद में भाग लेकर आरोपियों की गिरफ्तारी को मांग की परन्तु अभी तक कोई कार्यवाही नही हुई हैं।
कालूड़ी गांव में देश आजाद होने के बाद भी दलित गुलामी में जिंदगी जी रहे है। कालूड़ी गांव में सामन्तवाद चलता है । गांव की गलियों से दलित नही गुजर सकते है। संविधान में प्रदत स्वतन्त्रता के अधिकार (अनुच्छेद 19 ) के बावजूद भी दलित सार्वजनिक जगह पर नही जा सकते है। अनुच्छेद 17 छुआछूत को समाप्त करता है लेकिन इन मनुवादी लोगो द्वारा आज भी दलितों के
ऊपर अत्याचार किया जाता है। विधालय में दलित लड़को के लिए अलग से पानी की व्यवस्था की जाती है जो कि मानवताविरोधी है।
भारतीय संविधान में प्रदत समानता का अधिकार (अनुच्छेद 15 ) जो कि सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है लेकिन इन मनुवादी सवर्ण समुदाय के  लोगो द्वारा जाति आधारित भेदभाव किया जाता है। दलितों को सार्वजनिक पानी के स्रोतों से पानी नही लेने दिया जा रहा है। अनुच्छेद 21A 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों को पढ़ने का अधिकार देता हैं लेकिन मनुवादी लोगो द्वारा इनको विधालय जाने से रोका जा रहा है।
अन्य प्रकरण- 
डांगावास हत्याकांड जो को मई 2015 में हुआ था जिसमे 3 दलितों को मार दिया गया था और 15 दलितों को पीट पीट कर घायल कर दिया था। ये मामला भी सवर्णों की पंचायत से शुरू हुआ था।
दलितों के पढने पर उनकी सांस्थानिक हत्या की जाती है। (डेल्टा मेघवाल हत्याकांड मार्च 2016 )
दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने पर पीट दिया जाता है।(भीलवाड़ा प्रकरण अप्रैल 2018), (बोरानाडा जोधपुर घटना 12 मई,2018)
इस प्रकार की मानवताविरोधी घटनाओं का विरोध करने की बजाय इस प्रकार की घटनाओं का सवर्ण समाज द्वारा 35 कौम (समाज) बोलकर इस प्रकार की घटनाओं का समर्थन किया जाता है जो कि सोचने योग्य है,मानवताविरोधी ओर संविधान विरोधी हैं।सविंधान के द्वारा दिये गए अधिकारों से भी सवर्ण लोगो की मानसिक  (मनुवादी) सोच को नही बदला जा सकता है। अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम लागू होने के बाद भी प्रशासन द्वारा कार्यवाही नही करना निंदनीय है। प्रशासन में सवर्ण लोगो का प्रभाव होने के कारण कार्यवाही नही हो रही है। अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में तत्काल गिरफ्तारी का आदेश होता है लेकिन हकीकत में कुछ और ही हो रहा है। प्रशासन द्वारा तुरंत कार्यवाही नही करना ये साबित करता है कि आज भी दलित आजाद नही है।सबूतों ओर गवाहों के बावजूद भी कालूड़ी अपराधी खुलेआम घूम रहे है । फिर कैसे कहे कि हम आजाद है? आखिर कब तक दलित गुलामी में जिंदगी जीते रहेंगे??
( लेखक एम ए वाटर पोलिसी and गवर्नेंस के स्कूल ऑफ हैबिटेट स्टडीज, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान , मुंबई में अध्ययनरत है ,सम्पर्क सूत्र -Email id – bhattaramtapra999@gmail.com )

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