संकट में है कलंदर समुदाय

पुरानी आजीविका छिन गई और नई आजीविका मिल नहीं रही

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– भारत डोगरा

हमारे देश में कुछ समुदाय ऐसे हैं जिनकी परंपरागत आजीविका बहुत तेजी से कम हुई है। इनमें से कुछ समुदायों की आजीविका तो व्यापक आर्थिक बदलावों के कारण कम हुई पर ऐसे भी समुदाय हैं जिनकी आजीविका को अनुचित व अन्यायपूर्ण कानूनों व नीतियों ने छीन लिया। कलंदर समुदाय एक ऐसा ही समुदाय है। कुछ अन्यायपूर्ण कानूनों ने उनकी परंपरागत आजीविका उनसे छीन ली है। तिस पर भी यदि सरकार कम से कम वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था करती तो इस समुदाय को कुछ राहत मिलती। पर अन्यायपूर्ण कानूनों से परंपरागत रोजगार छीनने के बाद सरकार ने तो अब इस समुदाय की ओर से आंखें मूंद ली हैं। उन्हें अपने हाल पर ही छोड़ दिया व यह तक नहीं पूछा कि परंपरागत रोजगार छिनने के बाद उन्होंने कितने दिन सूखी रोटी खाई और कितने दिन भूखे रहे।

कलंदर समुदाय की व्यथा समझने के लिए हमने राजस्थान के टोंक शहर में कलंदर समुदाय की एक बस्ती (मोहल्ला बहीर, वार्ड पांच) से बातचीत की तो एक दर्द भरी कहानी सामने आई। लगभग 50 वर्ष पहले की स्थिति के बारे में लोगों ने बताया कि उस समय यहां के परिवार अपना रीछ का नाच तमाशा दिखाने की परंपरागत आजीविका के आधार पर संतोष से अपनी घर-गृहस्थी चला रहे थे। वर्षा के लगभग तीन महीनों तक वे यहां रहते थे। उसके बाद वे अपने मार्ग निर्धारित कर लेते थे व जगह-जगह अपने रीछों का खेल-तमाशा दिखाते थे। उन दिनों की याद कर यहां के बुजुर्गों ने बताया कि हमारा जीवन बहुत संतोषजनक था। बहुत सी दैनिक जीवन की आवश्यकताएं अनाज-दाल-तेल तमाशा देखने वालों से ही मिल जाती थीं। पैसा भी मिलता था। रीछ को रामभक्त जामवंत का वंशज मानने के कारण, रीछ का आशीर्वाद कुछ लोग बाल-बच्चों की भलाई के लिए लेते थे तो अतिरिक्त पैसा और नारियल देते थे। रीछ का तमाशा गांव-मोहल्ले के अमीर-गरीब मिल कर बिना किसी टिकट के देखते थे। पैसा हो तो दो, नहीं हो तो न दो। सबके लिए खुला मनोरंजन था। रीछ ही आजीविका का मूल थे अतः उनका बहुत ध्यान रखा जाता था। कुछ विशेष व्यंजन परिवार में बनता था तो उसका हिस्सा रीछ को भी मिलता। मौसम की मार से बचाने के लिए समय पर गुड़, शहद, घी भी खाने को दिया जाता। बीमारी होने पर इलाज करवाया जाता। रीछ भी बहुत वफादरी दिखाते। एक कलंदर को अचानक बाहर जाना पड़ गया तो उसके लौटने के बाद ही रीछ ने खाना खाया।

वास्तविक स्थितियों की उपेक्षा करते हुए व कलंदर समुदाय से कोई संवाद किए बिना 1970 के दशक से रीछ पालने व उनका खेल-तमाशा दिखाने पर सरकार ने तरह-तरह के प्रतिबंध लगा दिए। अनुभवी कलाकारों को जेल भेजा जाने लगा। वे लाइसेंस के लिए सरकारी दफ्तरों का चक्कर लगाते-लगाते परेशान हो गए पर उन्हें लाइसेंस नहीं मिला। इस कारण धीरे-धीरे रीछ व रीछ के खेल पर आधारित आजीविका समाप्त होने लगी। जो थोड़े से रीछ बचे थे उनके बारे में कहा गया कि इन्हें सरकार द्वारा तय स्थानों पर ‘सरेंडर’ करवा दो व यहां के कलंदरों ने ऐसा ही किया। इस तरह कई पीढ़ियों से चली आ रही आजीविका केवल नासमझी के कानूनों के कारण समाप्त हो गई। परंपरागत रोजी-रोटी के अवसर छीनने के बाद यदि सरकार इस समुदाय के लिए नए रोजी-रोटी के अवसर प्रदान करने का प्रयास करती तो भी स्थिति को संभाला जा सकता था। पर सरकार ने कलंदर समुदाय को उसके अपने हाल पर छोड़ दिया। इस स्थिति में जहां कलंदरों ने एक ओर गहरे दुख-दर्द और अभाव का सामना किया, वहां कभी निर्माण मजदूरी करने तथा कभी मंजन बेचने तो कभी साड़ियों व थैले बनाने से जुड़ी कोई दस्तकारी करने का प्रयास किया। एक एनजीओ ने यहां थोड़ा-बहुत बैग बनाने का काम भी शुरू किया पर यह सब थोड़ी बहुत मरहम-पट्टी जैसा ही है। कुल मिलाकर कलंदर समुदाय की स्थिति आज भी वैसे समुदाय की चिंताजनक स्थिति जैसी है जिससे उसका परंपरागत रोजगार छीन लिया गया हो और कोई संतोषजनक विकल्प न दिया गया हो।

आज भी इस बस्ती में कलंदर समुदाय के बहुत से परिवार तंबूनुमा आवास में ही रह रहे हैं। जिनका पहले से आवास बन गया है उनकी स्थिति कुछ ठीक है, पर अनेक अन्य परिवारों का मौसम की मार, गर्मी-सर्दी-बरसात से सही बचाव नहीं है। प्रचंड गर्मी के दिनों में दूर से पानी भर कर लाना पड़ता है। राजस्थान की प्रचंड गर्मी में सप्ताह में एक दिन ही नहाने का पानी मिलता है। खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। इस कारण महिलाओं को बहुत असुरक्षित स्थितियां झेलनी पड़ती हैं। अब समय आ गया है कि सरकार कलंदर समुदाय की भलाई के लिए महत्त्वपूर्ण कार्यवाही शीघ्र आरंभ करें। यह कार्य कलंदर समुदाय की भागेदारी से होने चाहिए। कलंदर समुदाय के सामाजिक कार्यकर्ता नूर मुहम्मद ने बताया कि हम निरंतरता के समस्या सरकार तक पंहुचाने का प्रयास कर रहे हैं, आश्वासन भी मिलते रहे हैं पर अभी तक कोई बड़ी राहत नहीं मिली है,कोई बड़ा प्रयास सरकार ने नहीं किया है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं) (विविधा फीचर्स)

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