जितेन्द्र महला का यह पत्र सबको पढ़ना चाहिए !

जाति की हदबंदी को तोड़ कर शादी करनेवाले युवा विचारक जितेन्द्र महला ने लिखा अपने परिजनों को पत्र !

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आदरणीय माँ,नानाजी,मम्मीजी और पापाजी,

आपके इस बेटे पर जातिवादी समाज का यह इलज़ाम है कि मैंने आपकी ज़िंदगी ख़राब कर दी. इस पर मेरे पक्ष का एक हिस्सा यह रहा-

” नानाजी, मुझे हमेशा याद रहेगा कि गाँव में सोहन मेघवाल आपके सबसे अच्छे दोस्तों में से थे.आपकी और उनकी दोस्ती के किस्से आपसे बचपन से सुनता रहा हूँ.आप दोनों जानवरों के पाँवों के निशान खोजने में माहिर रहे हैं.जब भी हमारे घरों की भैंस, बकरी और ऊंट कहीं खो जाते थे,तो आपकी मशहूर जोड़ी उन्हें खोजने निकलती थी.ऐसा एक भी वाकया याद नहीं जब आप किसी खोये हुये जानवर को खोजने निकले और वापस खाली हाथ लौटें.गाँव के दूसरे जानवरों को भी आप खोजने जाते थे.

यह आप ही कहते रहे हैं कि आप लोगों कोई चालीस साल पहले गुड़गाँव तक ऊंटों गाड़ों में गुड़ लाने जाते थे.मैं ख़ुद आपके साथ सोहन नानाजी के खेत में छानी कटवाने गया हूँ.वे खुद हमारे खेत में मदद करवाने पहुँचते थे.मनकोरी नानीजी के साथ माँ की गहरी दोस्ती है,वे दोनों खेत में आते-जाते वक्त पक्का एक-दूसरे का हाल-चाल लेती है.घर में बैठकर घंटों बातें करती हैं. पापाजी तो पिछले दो दशकों से हमारे इलाके में विशेष योग्यजनों के लिए काम करने वाले सबसे बड़ें चहरे हैं उनके संस्थान में मेघवाल, मुसलमान सब पदों पर हैं. हमेशा घर आते रहते हैं.

आपकी इसी शानदार विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर थी.साथ में खाने-पीने और दोस्ती करने तक का काम आप कर चुके थे,अब काम उससे आगे का था.मैंने और अलका जिलोया ने आज से ठिक दो साल पहले 23 फरवरी 2015 को अपनी-अपनी जातियों को खुंटी पर टांगकर शादी की.तब से माँ,नानाजी,मम्मीजी और पापाजी,आपके और मेरे बीच जातिवादी समाज ने ऐसी खाई खोद दी है जिसे मैं जितना पाटना चाहता हूँ,वह उससे कई गुना बढ़ती जाती है.जातिवादियों ने आपके और मेरे बीच जाति का ज़हर घोल दिया है.

मेरे जाति से बाहर शादी करने पर आप इतना रोये हैं कि जितना आप मेरी मय्यत पर भी नहीं रोते और इधर इस एहसास के साथ मैं रोज मरता हूँ कि क्या सच मैंने मेरे बुजुर्गों की ज़िंदगी नरक में झोंक दी है ? तब मेरे अंदर से कहीं से विवेक उठता है और कहता है कि वज़ह मैं नहीं हूँ.मैं तो इंसानियत, प्रेम, स्वतंत्रता, समता और न्याय के मूल्यों के साथ हूँ.वज़ह तो जाति है.जो इस ब्राह्मण धर्म और समाज का कैंसर है.जो अंदर ही अंदर हम सबको मारता है.हमें इंसान नहीं बनने देता.यकीन मानिये आपकी ज़िंदगी को इसी जातिवादी समाज ने नरक में झोंक दिया है.जातिवादियों ने आपकी ज़िंदगी को नरक बना दिया है.

नानाजी जाति का ज़हर कितना गहरा है इसे समझिये. हमारे आस-पास चोर-उचक्के, गुंडे-मवाली, हत्यारे- अपराधी सब कुबूल हैं.बस उस जातिवादी समाज को आपका यह बेटा कुबूल नहीं, जिसने देश के सबसे नामी पत्रकारिता संस्थान आईआईएमसी दिल्ली से मास-कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म की पढ़ाई की.जो स्कूल-कॉलेज में अपने राज्य और जिले का कई साल तक वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में प्रतिनिधित्व करता रहा.जिसने देश के केवल्य ऐजुकेशन फाउंडेशन,पीरामल फाउंडेशन,अजीमप्रेमजी फाउंडेशन जैसे नामी शिक्षण संस्थान में सरकारी स्कूलों में बच्चों और शिक्षकों के साथ पांच साल काम किया.जो आजकल वर्ल्ड बैंक,सरकार और लैट्ज ड्रीम फाउंडेशन के साझा कार्यक्रम में महिलाओं की एक सहकारी समिति को लीड करता है.जिसमें ढ़ाई हजार महिलाये जुड़ी हैं,ढ़ाई हज़ार परिवार जुड़े हैं और महीने का पैंतालिस हज़ार रूपये कमाता है,फिर भी जातिवादियों को आपका यह बेटा कुबूल नहीं,क्योंकि आपका यह बेटा जाति से लड़ता है.यह अंतर्जातिय विवाह कर चुका है और क़मबख़्त सबको कहता है कि अंतर्जातिय विवाह इस देश में सबसे बड़ा साहस का काम है.

नानाजी गाँव में आपको याद होगा कि हम जलते हुये चुल्हे के पास बैठकर अक्सर यह बात करते थे कि हमारे गाँव में कोई चालीस साल से मस्जिद है पर यहाँ मंदिर नहीं हैं. पता है आपको क्यों नहीं है क्योंकि हम अलग-अलग जातियों में बंटे हुये गिरोहों में रहने वाले लोग हैं.हमारा सांझा कुछ नहीं है और हां जहाँ मंदिर हैं वहाँ जाति का ज़हर और ज्यादा गहरा है.वैसे नानाजी मेरी अब मंदिर में रूचि बची नहीं. हां गाँव को लेकर सपने लगातार फल-फुल रहे हैं.

नानाजी, तमाम असहमतियों के बावजूद आपको भरोसा दिलाना चाहता हूँ कि जाति के ख़िलाफ लड़ाई पूरी शिद्दत के साथ जारी रहेगी. हमें मालुम हैं कि जाति के ख़िलाफ लड़ते हुये सबसे पहले अपनों से लड़ना पड़ता हैं,हम जाति के अंत के लिए अपनों से लड़ेंगे ताकि हमारी आने वाली नस्लों को जाति के कैंसर से निजात मिल सकें.

आप सबका

जीतेन्द्र

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