आम जन का मीडिया
Jignes Mawani has become the most prominent face of the Dalit movement.

दलित आंदोलन का सबसे प्रमुख चेहरा बन गये है जिग्नेश मेवाणी !

-प्रमोदपाल सिंह

बहुत कम समय में जिग्नेश मेवाणी देश में नए दलित नेता के रूप में उभर कर सामने आए हैं। नई दिल्ली में 9 जनवरी को रोक के बावजूद रैली कर हूंकार भरी। उनका मकसद चंद्रशेखर व रोहित वेमुला के लिए न्याय की मांग करना था। नेपथ्य में देश व्यापी पहचान स्थापित करने की मंशा भी हो। लेकिन धार खोते जा रहे दलित नेताओं के बीच जिग्नेश का अभ्युदय सचमुच चमत्कृत करने वाला हैं। उनका उभार ऊना में हुए अत्याचार की प्रतिक्रिया में हुआ था और विधायक चुने जाने के बाद वे तेजी से देश के दलित आंदोलन का चेहरा बनकर उभरे।

एनजीटी के निर्देश के चलते दिल्ली पुलिस की रोक के बावजूद गुजरात के वडगाम विधायक जिग्नेश मेवाणी और उनके समर्थकों ने राजधानी दिल्ली के संसद मार्ग पर युवा हुंकार रैली की और सफल रहे। जिग्नेश मेवाणी ने रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जुबानी हमला बोलकर अपनी पहचान व्यापक बनाने की कोशिश की। इस रैली में स्वराज इंडिया के प्रशांत भूषण और दिल्ली स्वराज इंडिया के प्रदेश अध्यक्ष अनुपम सहित स्वामी अग्निवेश जैसे पुराने आंदोलनकारी भी पहुंचे। रैली का आयोजन जिस तरह से किया गया। वह अन्ना आंदोलन की याद दिला रहा था।

जिग्नेश मेवाणी ने इस रैली को लेकर ट्वीट कर भाजपा को चुनौती दी कि बांध ले बिस्तर बीजेपी, राज अब जाने को है, जुल्म काफी कर चुके पब्लिक बिगड़ जाने को है। यह पुरानी राजनीति के बीच एक उर्जा से लबरेज नवोदित नेता की नई भाषा है।

गुजरात चुनाव से पहले ऊना प्रकरण के दौरान से जिग्नेश की पहचान सिर्फ गुजरात प्रदेश में बनी थी। लेकिन उनको देश भर में पहचान राहुल गांधी ने दी। जब राहुल ने हार्दिक पटेल,अल्पेश ठाकोर व जिग्नेश मेवाणी का समर्थन चाहा और उन्हें अपना मंच साझा करने का अवसर दिया। इसी के साथ इस तिकड़ी की देश भर में चर्चा होने लगी। जिग्नेश की एक निर्दलीय विधायक के रूप में जीत से दलितों को सशक्त नेता मिल गया।

यह वर्ग अब तक बाबू जगजीवनराम, रामविलास पासवान,कांशीराम,मायावती,रामदास आठवले,रामराज जैसे नेताओं पर भरोसा करता रहा। लेकिन दलितों के मन में रिक्तता भरने का काम जिग्नेश ने किया। वे सबसे अलग जमीनी संघर्ष करने वाले जिग्नेश राजनीतिक पटल के नए और युवा हस्ताक्षर हैं।

11 दिसंबर 1980 में गुजरात के मेहसाणा में जन्मे मेवाणी इन दिनों अहमदाबाद के दलित बहुल इलाके मेघानी नगर में रह रहे हैं। उनका परिवार फैजाबाद जिलाके मिऊ गाँव का मूल निवासी है। उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई अहमदाबाद में स्वास्तिक विद्यालय में की। उन्होंने वर्ष 2003 में अहमदाबाद के एचके आर्ट्स कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में कला स्नातक की। 2004 में उन्होंने पत्रकारिता और जन संचार में डिप्लोमा किया। 2004 से 2007 तक गुजराती पत्रिका में अभियान में एक रिपोर्टर के रूप में सेवा की। 2013 में उन्होंने डीटी लॉ कॉलेज, अहमदाबाद से कानून में स्नातक उपाधि प्राप्त कर वकालत शुरू की। कुछ समय तक वे आम आदमी पार्टी से भी जुड़े। लेकिन जल्दी ही उनका मोह भंग हो गया।

उनके पिता नगर निगम में क्लर्क थे और अब रिटायर हो चुके हैं। दो साल पहले यानी 11 जुलाई 2016 गुजरात के ऊना तालुक के मोटा समधियाला गांव के निकट दलित लोगों की बेरहमी से पिटाई होने के बाद उन्होंने दलित अस्मिता यात्रा का आयोजन किया। इसी यात्रा ने शोषित-वंचित वर्ग को नया नेता दिया। जिस की गूंज अब देश की राजधानी में भी सुनी जानी लगी हैं। उस समय गुजरात में मरी गाय की चमड़ी उतार रहे कुछ दलित युवकों की पिटाई के बाद बीस हजार दलितों ने इस यात्रा में भाग लिया था। उस समय वे ऊना दलित अत्याचार लड़त समिति (यूडीएएलएस) के संयोजक थे। उन्होंने तत्कालीन भाजपा सरकार से कहा था कि गाय की दुम आप रखो, हमें हमारी ज़मीन दो। आप मरी गाय की चमड़ी उतारने पर हमारी चमड़ी उतार लेंगे? हमें ज़मीनों का आवंटन करो। हम रोज़गार की ओर जाएंगे।जिस पेशे के लिए हमें अछूत घोषित किया गया। आप उसी के लिए हमारी चमड़ी उधेड़ रहे हो। यह कैसे चलेगा,अब दलित समाज के लोग मरे हुए पशुओं का चमड़ा निकालना और मैला ढोना जैसा काम नहीं करेंगे। इसी बयान से वे चर्चा में आए थे।

बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती की गिनती देश में सबसे बड़े दलित नेता के रूप में होती है। लेकिन मायावती ने सहारनपुर हिंसा के दौरान वहां जाने की जहमत काफी देर बाद ही उठाई थी और अब महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में दलितों पर हुए हमले को लेकर उनकी चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। इस मामले में भारिप बहुजन महासंघ के नेता एवं डॉ. भीमराव अम्बेडकर के पौत्र प्रकाश अम्बेडकर दलितों के मन में गहरी छाप छोड़ गए। उनके आह्वान करने भर से महाराष्ट्र ठप्प हो गया। मेवाणी को छोड़कर ओर कोई नेता इस आह्वान में सक्रिय दिखाई नही दिया। भीमा कोरेगांव की घटना के बाद जिस तरह से जिग्नेश मेवाणी बतौर नेता उभरे। उसके आगे मायावती की आवाज़ कमज़ोर पड़ सकती है।

भीमा कोरेगांव प्रकरण में उनकी पुणे में सक्रियता ने उन्हें साबित किया। उन्हें दलित आंदोलन की नई उम्मीद के रूप में देखा जा रहा हैं। देश में मतदाताओं की तादाद में दलितों का अनुपात 16.6 प्रतिशत है। मेवाणी अभी राजनीति की पहली सीढ़ी पर खड़े हैं। लेकिन उनमें देश की दलित राजनीति में एक करिश्माई नेता की ज़रूरत को पूरा करने की संभावना हैं। जिग्नेश मेवाणी भाजपा के लिए हार्दिक-अल्पेश से बड़ी चुनौती बनकर उभरे है। 1974 के गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन से उठे नरेन्द्र मोदी को 2016 के गुजरात के ही दलित अस्मिता आंदोलन से उपजे एक निर्दलीय नेता से दो-चार होना पड़ रहा हैं।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार है )

1 Comment
  1. हरिश सोलंकी says

    आपका द्वारा लिखा गया लेख भी बहुत सराहनीय है सर… और आपका भी बहुजने के प्रति सामाजिक सक्रियता चुपी हुई नही है… जै भीम…

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