जाटों की दुर्गती राहुल चौधरी तक आ पहुंची है !

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यह किसी अजूबे से कम नहीं है कि जिस क़ौम के ज़वानों को डोकलाम में चीन के ख़िलाफ मोर्चा संभालने की जिम्मेदारी दी गई है, जिस क़ौम ने देश को चौधरी छोटूराम और सुरजमल जैसे राष्ट्रनायक दिये, जिस क़ौम ने देश को चौधरी चरणसिंह जैसे किसान मसीहा-पिछड़ा मसीहा प्रधानमंत्री दिया. जो क़ौम खेतों से लेकर देश की सरहदों तक हर बार अपनी जान की बाजी लगा देती है,उसी जाति के एक छात्र राहुल चौधरी को जातिगत भेदभाव से तंग आकर आत्महत्या करनी पड़ती है.

जाट बहुल पश्चिमी यूपी, हरियाणा और राजस्थान में जातिवादी वर्चस्ववादी ब्राह्मणवादी आरएसएसवादी ताकतें जाटों को सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक हर मोर्चें पर लगातार निशाना बना रही हैं. उन्होंने एकजुट होकर जाटों के ख़िलाफ सतह के नीचे ही नीचे जाट विरोधी मुहिम छेड़ रखी है क्योंकि वे जानते हैं कि इस पूरे इलाके में अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए आबादी के हिसाब से बड़े समुदाय जाटों एकजुट और संगठित नहीं होने देना है.

इसीलिए वे बार-बार ओबीसी जातियों को जाटों के ख़िलाफ भड़काते हैं, वे जाटों को बार-बार सुपरमैन बताते हैं, वे हरियाणा में जाटों के ख़िलाफ एक बनाम पैंतीस का नारा देते हैं, वे चौधरी चरणसिंह घाट के बहाने चरणसिंह की विरासत को मिटाने की कोशीश में लगे हैं, वे पश्चिमी यूपी, हरियाणा से लेकर राजस्थान तक में कहीं भी जाटों को किसी भी बड़ी राजनैतिक भूमिका में नहीं देखना चाहते क्योंकि वे जानते हैं कि जाटों का उभार आरएसएस के एजेंडे के लिए ख़तरा है.

ख़ैर, मनुवादी कोई भी काम नफ़े-नुकसान का आकलन किया बिना नहीं करते. यह मामला सिर्फ राहुल चौधरी की आत्महत्या का नहीं है, यह दिखाता है कि मनुवादियों ने जाट समुदाय़ को पूरी तरह अपने चंगुल में ले लिया है. उन्हें बिल्कुल भी डर नहीं है कि जाट इसका विरोध करेंगे, वे मनुवादी स्वयंसेवक संघ की शाखाओं का बहिष्कार करेंगे, वे बीजेपी का बहिष्कार करेंगे, वे ट्रेनें रोके देंगे, वे आने वाले चुनावों में बीजेपी की खाट उल्ट देंगे, वे अपना धर्म बदल लेंगे.

पश्चिमी उत्तरप्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के जाट बहुल इलाकों में ज़मकर संविधान विरोधी काम कर रहे हैं.उन्होंने पहले पहलु ख़ान, जाट आरक्षण गोली कांड, गुर्जर आरक्षण गोली कांड, भगेगा, बिजनौर, कैराना, सुनपेड, मुजफ्फरनगर, अखलाक, डेल्टा मेघवाल, उना, डांगावास, धनाउ, सोती, बुडाना और मिर्चपुर यह सब करके देखा. उन्होंने इस पूरे इलाके को मनुवाद की आग में जलाकर देखा. उन्होंने देखा कि इस पूरे इलाके में अब जाट समुदाय सबसे ज्यादा मनुवाद से ग्रसित हो चुका है,जो अपने इतिहास को नहीं जानता, जो अपने महापुरूषों को नहीं जानता, जो पूरी तरह टूट-फूट चुका है. जिसने महेंद्रसिंह टिकैत के आंदोलनों के बाद सबके दुख में शामिल होना छोड़ा दिया है, आंदोलनों में भाग लेना छोड़ दिया है और जो बड़ी मात्रा में संघ की शाखाओं में जाता है और वहां हिंदू-बनाम मुसलमान सिखता है.

यह तैयारी वे आज से नहीं कर रहें थे, जाटों को मनुवाद का प्रशिक्षण दयानंद सरस्वती उर्फ़ मुलशंकर तिवारी के ज़माने से दिया जा रहा है.क्योंकि जब पहली बार 1907 में मुजफ्फरनगर में अखिल भारतीय जाट महासभा की स्थापना की गई, उस समय वह स्वघोषित रूप से आर्य समाज की एक शाखा (अॉफसुट विंग) थी और आर्य समाज ब्राह्मणवाद की सोफ्ट बांई भुजा है, जो कि कट्टर भुजा यानी दांई भुजा से लड़ता है. इस तरह दोनों आपस में एक-दूसरे से लड़ने का ढ़ोंग रचते हैं और ब्राह्मणवाद को सुरक्षित रखते हैं. उसे मजबूत करते हैं. जाति को सुरक्षित करते हैं और मजबूत करते हैं.ब्राह्मणवाद की दांई और बांई भुजा का मतलब है, पक्ष में भी ब्राह्मण और विपक्ष में ब्राह्मण.

जाट महासभा के 1925 के पुष्कर जलसे में तमाम जाट नेताओं के अलावा पंडित मदन मोहन मालवीय आये. 1932 में जाट महासभा का सम्मेलन झुंझुनूं में हुआ और बाद में 1934 में सीकर में. सीकर के सम्मेलन को जाट प्रजापति महायज्ञ सीकर कहा गया.राजस्थान के इन तीनों जाट सम्मेलनों में जाटों ने ब्राह्मणों को अपना गुरू बनाया, अपने घरों से घी लाकर यज्ञों में झोंक दिया. जाटों को बाकायदा आर्य समाजी ब्राह्मणवादियों ने जनेऊ पहनाई. जाटों ने खुद के नाम के पहले कुंवर लिखा.

इन तीनों सम्मेलनों के जरिये जाटों को पहली बार औपाचारिक रूप से ब्राह्मणवाद का प्रशिक्षण का दिया गया. उन्हें अपने इतिहास, संस्कृति,प्रतिकों और सभ्यता से दूर किया गया. उन्हें गोपनीय रूप से जाति-पाति, ऊंच-नीच का प्रशिक्षण दिया गया. अन्याय और अत्याचार के ख़िलाफ जाटों का जो जनसमूह तैयार हुआ था,उसका नेत़त्व सवर्ण जातियों को सौंपने की शुरूआत की गई. जाटों के हर आंदोलन में सवर्ण जातियों ने आगे से हमेशा दखलअंदाजी की और ज़मीन पर जाटों के संघर्ष से उन्होंने बार-बार राजस्थान में सत्ता का सुख भोगा.

जाटों को बार-बार किसान कहकर बहकाया गया.अब भी वे किसान आंदोलन के नाम से भ्रमित है.वे ब्राह्मणवाद से अंजान है.वे जाति के कैंसर को नहीं पहचानते.वे यह बुनियादी सवाल नहीं खड़ा करते कि जाटों और दूसरे पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और मुसलमान की देश के तमाम क्षेत्रों में कितनी हिस्सेदारी है.

पिछड़ी जातियों में सबसे ज्यादा ब्राह्मणवाद की चपेट में जाट आये. आर्य समाज ने जाटों को ब्राह्मणवाद का प्रशिक्षण दिया. जाटों ने आर्य समाज से ब्राह्मणवाद का रिफ्रेस कोर्स किया और जाटलैंड को मुजफ्फरनगर, शामली, मिर्चपुर, कैराना, डांगावास, सोती, बुडाना और धनाऊ जैसे सैकड़ों घाव दिये.

जाटों से आख़िरी सवाल यहीं है कि हमारे इतिहास और महापुरूषों, हमारी संस्क़ति और संविधान के न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के मूल्य़ों के ख़ातिर ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ निर्णायक बिगुल कब बजायेंगे ? अब किस बात का इंतजार है ?

– जीतेन्द्र महला
( लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है )

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