25 -26 जनवरी को जयपुर में होगा ‘जन साहित्य पर्व’

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आज साहित्य को समाज के दर्पण की विलासिता के स्त्रोत में बदला जा रहा है.उसे आम जन की पंहुच से दूर सिर्फ कुछ लोगों के मनोरंजन के लिए केन्द्रित किया जा रहा है.हमारा मानना है कि आम जन का अपने दुःख दर्दों से लेकर बेहतर भविष्य की कल्पना का साहित्य अब भी रचा जा रहा है लेकिन आवारा पूंजी के हमलों ने उसे हाशिये पर धकेल दिया है.जन साहित्य पर्व समाज को समानता और न्याय की तरफ ले जाने वाले साहित्य पर चर्चा और विमर्श का मंच है.अमानवीयता के खविलाफ प्रतिरोध की संस्कृति ही इस पर्व का केन्द्रीय स्वर है.

वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम किशन शर्मा ने बताया कि इस साल से “संयुक्त सांस्कृतिक मोर्चा” द्वारा जयपुर में ‘जन—साहित्य पर्व’ का दो दिवसीय आयोजन गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर 24-25 जनवरी 2018 को जयपुर में करने का निश्चय किया है.

हमारे देश की संघर्षशील मेहनतकश गरीब जनता को देखते हुए हमारे यहाँ आज भी साहित्य की मूलधारा इसी जन से सम्बन्धित है और उसकी चुनौतियाँ तथा मूल्य—प्रणाली भी अलग हैं.उसके सवाल भी अलग हैं और कला के मानदंड भी.हम चाहते हैं कि हमारा जो सौन्दर्यबोध और मूल्य-पद्धति है, उसमें प्रेमचंद के अनुसार सादगी और उच्च चिंतन की विशेष जगह है.साहित्य पर्व संस्कृति की जीवन्तता का हिस्सा है.

संस्कृति की रचना सदैव जनसाधारण करता है और “श्रम ही संस्कृति है” की उपेक्षा के प्रत्युत्तर में जन साहित्य पर्वों का आयोजन आज के युग की जरूरत है ताकि साहित्य के भी माध्यम से निरंकुशता के विरुद्ध जन आवाजों को अभिव्यक्ति दी जा सके.कार्यक्रम के सम्पर्क व्यक्ति संदीप मील ने बताया कि जन साहित्य पर्व का आयोजक “संयुक्त सांस्कृतिक मोर्चा” है ,जो जनवादी लेखकों,विचारकों और संस्कृतिकर्मियों का एक मोर्चा है,इस पर्व में देश भर के जाने माने लेखक,चिन्तक और साहित्यकार शामिल होंगे

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