आम जन का मीडिया
Jaipur Declaration of people Literature Festival!

‘जन साहित्य पर्व’ का ‘जयपुर घोषणा पत्र’ !

24—25 जनवरी 2018 को जयपुर में दो दिवसीय जन—साहित्य पर्व देश के हिंदी—राजस्थानी और उर्दू—पंजाबी लेखकों, लेखक संघों, साहित्यकारों, कलाकारों, मीडियाकर्मियों, पत्रकारों, जन—संगठनों, सामाजिक क्षेत्र के विचारकों, सिनेकर्मियों एवं युवा –संगठनों द्वारा पूरे जोश—ओ- खरोश और उत्साहपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ| इसमें खासतौर से प्रतिरोध और जनपक्षधरता की संस्कृति पर छः सत्रों में खुला एवं गंभीर विचार विमर्श हुआ.

विमर्श में सभी सहभागियों द्वारा आज के सामाजिक—सांस्कृतिक–आर्थिक-राजनीतिक और नैतिक माहौल के प्रति विशेष चिंता व्यक्त करते हुए कहा गया कि विश्व स्तर से लेकर राष्ट्रीय—प्रांतीय स्तर तक दुनिया एक बेहद गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है.जिन देशों में लोकतंत्र है, वहाँ भी स्थितियां बहुत अच्छी नहीं हैं.इन देशों में लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं का विकास होने के बजाय विभाजनकारी ताकतों द्वारा लोकतंत्र की संस्थाओं को अपने कब्जे में किये जाने की मुहिम चलाकर लोकतंत्र पर ही संकट पैदा कर दिया है,जिससे तेज़ी से एकरूपता और निरंकुशता का ख़तरा पैदा हो गया है.किसी भी देश की विविधता ही उसके लोकतंत्र की गारंटी होती है,क्योंकि प्रकृति और मानव—प्रकृति दोनों ही विविधता के आधार पर विकसित हुई हैं.

सच्चा लोकतंत्र वहां होता है जहां विविधता की रक्षा करते हुए उसे एकता के सूत्र में पिरोकर रखा जात़ा है.इसी काम के लिए संविधान का निर्माण होता है कि कोई शासक वर्ग अपनी मनमानी न कर सके.जो फैसले हों, उनमें जन—जन की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति हो.इसका कारण यह है कि पिछले पच्चीस-तीस वर्षों से बाज़ार, पूंजी और कार्पोरेट की ताकतों ने मानवता के भविष्य की कुंजी अपने हाथ में लेकर मनमानी शुरू कर दी है.सबसे पहले उसने मीडिया पर अपना निरंकुश और इकतरफा नियंत्रण जमा लेने का प्रयास किया है.उसके सामने जो भी सच्चाई को व्यक्त करने की कोशिश करते हैं,उनको रास्ते से ही हटा देने जैसा परिणाम भुगतना पड़ता है.

सत्ता ने स्वयं आतंक का माहौल पैदा करने तथा अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसे लोकतांत्रिक मूल्य पर अंकुश लगाने की कोशिश की हैं.रचना और कला तो जीवित ही अभिव्यक्ति की आज़ादी की गारंटी पर रहते हैं.आज इसी पर पहरा बिठाया जा रहा है.सत्ता से जुडी निर्णयात्मक प्रक्रियाओं में भी नीचे के मेहनतकश वर्ग की लगातार अनदेखी ही नहीं क्रूर उपेक्षा की जा रही है.आर्थिक फैसले जनता की दुखद परिस्थितियों को देखकर नहीं, विकास जैसी अमूर्त धारणा का प्रचार कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों को ध्यान में रखकर किये जा रहे हैं, इसका परिणाम यह हुआ है कि पिछले आठ—दस सालों में तेज़ी से वर्ग-विषमता बढी है.दुनियाभर के अर्थशास्त्री बतला रहे हैं कि उदारीकरण के अर्थशास्त्र ने देश की संपदा को मुट्ठीभर पूंजीपतियों के हाथों में सौंप दिया है.

आम आदमी की पीड़ा यह है कि देश में वह सिर्फ पांच साला वोटर बनकर रह गया है.उसके लिए लोकतंत्र पांच साल में सिर्फ एक दिन आता है.उसकी गरीबी और अशिक्षा ने उसे इतना लाचार बना दिया है कि वह स्वयं अपने भविष्य और वर्तमान के बारे में कुछ सोच ही नहीं पात़ा.वह लगातार भाग्यवादी बनता चला जाता है और ऐसे विचारों की गिरफ्त में आता जाता है,जो उसे जादू—टोने और बाबा—मुल्लों तथा सम्प्रदायों की तरफ धकेलते हैं.उसका स्वयं पर से भरोसा उठ जाता है.इसलिए उसके भविष्य का फैसला वे शक्तियां करने लगती हैं,जो उसकी वर्ग—शत्रु हैं.इससे किसान आत्महत्याएं अब त्रासदी नहीं, एक खबर भर बनकर रह गयी है.देश में दलित उत्पीड़न, महिला उत्पीड़न, धर्मिक स्वतंत्रता पर हमले और जातिवादी ध्रुवीकरण को आज राज्य का प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन मिल रहा है,जो भारत की सांझी और प्रगतिशील संस्कृति के लिये खतरा बन रहा है.

ऐसे माहौल में पूंजी के संकेन्द्रण वाली वैश्विक आवारा पूंजी की ताकतों ने लेखकों को भी लुभाना शुरू कर दिया है.वे महानगरों में चकाचौन्ध वाला समारोहधर्मी साहित्य—उत्सव का आयोजन करने लगी हैं, जिनमें वे बड़े नामधारी लेखक बुलाये जाते हैं, जो पहले से ही धन–वैभव में आकंठ डूबे हुए होते हैं और मीडिया इनका एक कृत्रिम प्रभामंडल बना देता है.इनको न जन—भावनाओं से लेना—देना होता है,न उनकी तकलीफों से और न ही उनके जीवन—मूल्यों से.वे सिनेमा जैसी मनोरंजनगामी विधाओं के लेखकों और प्रचलित भावुकता भरे आयोजनों का जमावड़ा ज्यादा होते हैं, जिनके आभामंडल में जमीनी अनुभवों से सम्बद्ध लेकिन कमजोर तबियत के कुछ लेखक भी फंस जाते हैं.इन तथाकथित नामधारी उत्सवों के आयोजन पर सत्ता से मिलकर करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाया जाता है और एक चकाचौंध सी पैदा कर देने वाली भंगिमा में उनका आयोजन किया जाता है.इनके सामने धन और पूंजी का कोई संकट होता ही नहीं, वह कारपोरेट घरानों से सहज सुलभ हो जाती है.इससे उन लेखकों में भी भटकाव पैदा होता है जो बड़े मानवीय प्रयोजन से साहित्य—रचना करते हैं.

यह सब बड़ी पूंजी का खेल होता है.इस खेल की गिरफ्त में कोई भी लेखक आ सकता है,क्योंकि लगातार उन मंचों का विघटन होता गया है जो लेखक को मंच उपलब्ध कराते थे,प्रतिष्ठा भी दिलाते थे और उसे स्थापित करने का काम भी करते थे.ऐसे मंच लेखक की लेखकीय नैतिकता को बचाए रखने में उसकी मदद भी करते थे.हम जानते हैं कि हमारे ज्यादातर लेखक मध्य वर्ग से आते हैं, जो कभी किसी प्रलोभन के कुचक्र में फंस सकते हैं.सरप्लस पूंजी के मौजूदा समय में यह ख़तरा बहुत तेज़ी से बढ़ा है.इसका परिणाम यह हुआ है कि उसकी रचनाओं में बनावटी किस्म का आरोपित प्रतिरोध व्यक्त होता है,जो ज्यादातर अनुकरणधर्मी होता है.इसका परिणाम यह हुआ है कि लेखक की अपनी मौलिक जमीन का क्षरण होता जाता है.इस वजह से लेखक की प्रतिरोध शक्ति ही नहीं, उसकी जन—प्रतिबद्धता और जन-पक्षधरता की क्षमता भी कमजोर हुई है और कहीं–कहीं तो वह विघटित ही हो गयी है.

इसलिए आम आदमी की इस पीडा को समझने और स्वर देने के प्रयास के रूप में जन सहित्य पर्व, जयपुर का आयोजन हुआ.इसमें हमने ऊपर रेखांकित मुद्दो पर संवाद किया.अब इस संवाद को व्यापक बनाने की आवश्यकता है.इस आयोजन में शामिल लेखक-कलाकार सामूहिक रूप से यह घोषणा करते हैं कि जन—कला और जन-सांस्कृतिक मूल्यों को लेकर वे हर साल जनवरी माह में अपने ही संसाधनों से अपने मार्ग-व्यय का खर्चा स्वयं वहन करते हुए एक अखिल राष्ट्रीय पर्व का आयोजन करेंगे, जिसमें न केवल साहित्यिक समस्याओं पर विचार होगा, बल्कि समाज और लोकतांत्रिक मूल्यों के संदर्भ में भी गहन विमर्श और चर्चा होगी और उनके अनुसार भविष्य के फैसले होंगे.

( संयुक्त सांस्कृतिक मोर्चा द्वारा जारी )

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