यह ध्रुवीकृत जनादेश है !

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(भंवर मेघवंशी)  

भारत मे लोकसभा के चुनाव के परिणामों में एक बार पुनः  नरेंद्र मोदी को ही प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करते हुए प्रचंड बहुमत देने वाला जनादेश दिया गया है,विपक्ष के लिए बिल्कुल ही अपेक्षा के विपरीत आये परिणाम है,उसे इस प्रकार की महा पराजय की उम्मीद नही रही होगी,इसलिए प्रारंभिक प्रतिक्रिया में वे इस जनादेश को जन भावनाओं के विपरीत बताते हुए ईवीएम पर हार का दोष मढ़ सकते हैं,जिसकी छिटपुट शुरुआत भी हो चुकी है।

पर क्या वाकई यह चुनाव बिना किसी पक्षपात के हुए,क्या यह बराबरी वाली दौड़ थी,क्या सम्पूर्ण सरकारी मशीनरी सत्ता प्रतिष्ठान के प्रति पक्षपाती नहीं थी ? क्या चुनाव आयोग सत्तारुढों का समर्थन करता नजर नहीं आया,क्या उसकी भूमिका कईं मर्तबा संदेहास्पद नजर नहीं आने लगी ? आखिर क्यों ईवीएम को लेकर इतना संदेह घना होता गया और अंततः यह तथ्य स्थापित हो गया कि ईवीएम के ज़रिए हो रहे चुनाव दरअसल जनादेश का अपहरण है,इस संदेह को दूर करने का कोई गंभीर व भरोसेमंद प्रयास कें.चु.आ. ने नहीं किये,बल्कि ऐसे करतब किये कि संदेह मिटने के बजाय और घनीभूत ही हुये,आज भी पराजित दल वही शाश्वत आरोप दोहरा रहे है कि हो न हो ईवीएम में ही कुछ गड़बड़ी की गई है।

अकसर देखा जा रहा है कि जो जीतते हैं,उनको ईवीएम से कोई शिकायत नहीं रहती है,मगर पराजितों की ओर से सवाल उठते रहे है। इसमें सवाल करने वालों से भी अब जनता सवाल करना चाहती है कि जब जीतते हैं तो ईवीएम सही और हारते ही गलत,यह कैसा तर्क,कैसा पाखंडी आचरण है यह,अगर भरोसा नहीं है तो तब तक वोट मत दो जब तक बैलेट से मतदान न होने लगे,जिन जिन राजनीतिक दलों को ईवीएम पर संदेह है,वो सम्पूर्ण चुनाव प्रक्रिया का ही बहिष्कार कर दें,सड़कों पर उतर आए,तो ईवीएम जा सकती है,बैलेट आ सकते है,पर अपने ही आरोपों के प्रति भी स्वयं को ईमानदारी से साथ खड़े होना चाहिए,जो दिखता नहीं हैं।

अब सवाल यह भी किया जा रहा है कि इस ऐतिहासिक विजय ने भाजपा व उसके गठबंधन के तमाम अच्छे बुरे कामों को औचित्य की मुहर लगाकर सही साबित कर दिया है,जैसे नोटबन्दी,जीएसटी,मॉब लिंचिंग,2 अप्रेल का दलित आदिवासी दमन आदि इत्यादि ,क्या इन तमाम मुद्दों के व्यर्थ हो जाने का यह जनादेश है ? हो भी सकता है ,क्योंकि आम जन को नोटबन्दी अमीरों पर सर्जिकल स्ट्राइक जैसा महसूस हुआ है,जीएसटी को भी उसने पूंजीपतियों पर बढ़ाया गया अधिभार समझा है,उनको बढ़ती हुई मंहगाई,बेरोजगारी,15 लाख,2 करोड़ रोजगार के मुद्दों ने भावनात्मक रुप से छुआ ही नहीं ,ऐसा साफ साफ दृष्टिगोचर होता है।

इस जनादेश ने राफेल के मुद्दे को बुरी तरह से फेल करार दिया है,चौकीदार चोर है जैसे उग्र व मोदी को व्यक्तिगत तौर पर घेरने वाले इस संगठित अभियान ने मोदी के लिए नकारात्मकता बढ़ाने के बजाय उसके लिए सहानुभूति का निर्माण ज्यादा किया है,यह जो पब्लिक है ,वह सब जानती है कि चौकीदार ही नहीं बल्कि जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिकांश राजनेता चोर है,क्योंकि आज की राजनीति बिना चोरी किये चलती ही नहीं है,इसलिए शायद आम जन के लिए अब भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं रह गया है,वैसे भी सार्वजनिक जीवन मे शुचिता का आग्रह आम जन के विमर्श से गायब ही है,इसलिए यह अभियान औंधे मुंह गिरा नजर आ रहा है।

इस जनादेश का सबसे हिडन स्वर है कि यह पूरी तरह से सामाजिक बंटवारे का जनादेश है,यह चुनाव ध्रुवीकरण करते हुए लड़ा गया है,इस चुनाव के भीतर दलितों,आदिवासियों और अल्पसंख्यक मुसलमानों को उनकी औकात में रखने के लिए कुछ वर्गों की ओर से एकतरफा वोटिंग की गई है,इसमें बेशक जातिवादी सवर्ण तबके सबसे आगे रहे हैं और इसमें भ्रमित शुद्र भी शामिल कर लिए गए हैं।

रोहित वेमुला से लेकर,एट्रोसिटी एक्ट बदलने तथा उसके प्रतिरोध में उठे 2 अप्रेल के स्वतःस्फूर्त दलित आदिवासी विद्रोह को कुचलने में सफलता पाने का इनाम नरेंद्र मोदी व उनके सहयोगियों को दिया गया है.

यह जनादेश अल्पसंख्यक समुदाय के पशुपालकों व व्यापारियों को मॉब लिंचिंग के नाम पर,उनके युवाओं को लव जिहाद के नाम पर,आदिवासियों को नक्सलवाद के नाम पर और दलित बुद्धिजीवियों व मानव अधिकार कर्मशीलों को अर्बन नक्सल के नाम पर ठिकाने लगा देने का अद्भुत पराक्रम करने के पुरस्कार स्वरुप दिया गया प्रतीत होता है.

यह जनादेश भारतीय समाज को निर्मम व निकृष्ट तरीके से पोलोराइज करके विखंडित कर देने वाली नफरत की सफलता का ध्रुवीकृत जनादेश है.

इसकी ध्वनि बहुत स्पष्ट है,यह सीधे सीधे दलितों,आदिवासियों ,अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे पर टिका देने के लिए दिया गया जनादेश है,इसके बाद सत्ता काफी निरंकुश व अराजक होगी,नफरत की दन्दुभियाँ और जोर से बजेगी और संविधान बदलने तथा संवैधानिक संस्थाओं व प्रक्रियाओं को क्षत विक्षत करने का निर्बाध अभियान चलेगा,तब लोकतंत्र महज एक आवरण मात्र रह जायेगा और विपक्ष सत्तासीन दल का प्रकोष्ठ भर रह जायेगा।

यह जनादेश बहुत सारे संभावित खतरों की तरफ इशारा कर रहा है,इसका मुकाबला कैसे और कौन करेंगे,यह अभी तय होना है,पर यह जनादेश वंचित तबकों को उनकी औकात में रखने के पांच साल के सफल प्रयासों के इनाम के रूप में मोदीजी व उनके सहयोगियों को मिला है,इसमें कोई संदेह नहीं है।

भंवर मेघवंशी
( लेखक शून्यकाल के संपादक है )

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