केवल ब्राह्मण ही जातीय भेदभाव को बढ़ावा देते हैं,ऐसा कहना ठीक नहीं है

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-शिवराम इनानियाँ

अभी 10 जुलाई को नाड़सर(भोपालगढ़,जोधपुर)के शिक्षक साथी रुपाराम शर्मा की तबीयत का हाल-चाल जानने के लिए मैं उनके निवास पर बैठा था। बैठे-बैठे ही न जाने क्यों मैंने उनसे,उनके घर के बीच आंगन में बैठी एक बुजुर्ग महिला की वेशभूषा देखकर उनकी जाति के बारे में पूछ लिया।

जिस पर उन्होंने कहा-मेघवाल।

मैं तत्काल उनसे आंगन में बैठी महिलाओं का फोटो उतार लेने का बोलकर सीधा आंगन में पहुंचा। आंगन में उनकी पत्नी,नवनियुक्त शिक्षक बेटी तथा मेहमान महिला इस प्रकार बैठी थी जैसे सभी एक ही परिवार के सदस्य हैं।

मुझे इसलिए बेहद अचरज हो रहा था कि,मैंने अपने गांव के ब्राह्मण के घर के अंदरूनी हिस्सों में दलित तो दूर कभी किसी अन्य पिछड़ा वर्ग के व्यक्ति को भी नहीं देखा था। जबकि महज 60 किलोमीटर कि दूरी के इस गांव में…

मुझे उन दिनों की याद आई जब रूपाराम शर्मा दलित सेना के भोपालगढ़ तहसील अध्यक्ष हुआ करते थे।

मैंने उनसे कहा कि, मैं तो सदैव यही मानता रहा था कि,आप जरूर किसी आर्थिक लाभ के लिए ब्राह्मण होकर षड्यंत्रवश दलितों के संगठन “दलित सेना” के अध्यक्ष बने बैठे हैं।

मेरी दिलचस्पी बढ़ी तो मैंने उनसे पूछा कि, क्या आप बाबा साहब को भी मानते हैं…?

उन्होंने कहा कि,भोपालगढ़ में बाबा साहब की जयंती की शुरुआत ही मैंनें ही की थी। मैंने दलित जातियों में संपर्क करके उनमें आपसी सामंजस्य बैठा कर उन्हें बाबा साहब की जयंती मनाने के लिए राजी किया था।

मैंने नया प्रश्न खड़ा कर दिया कि 2 अप्रैल को बाबा साहब के अनुयायियों ने ब्राह्मणों के प्रति काफी आक्रोश प्रकट किया था।उसके बारे में आप क्या कहते हैं…? उन्होंने कहा कि यह सब भेदभाव से नाराज दलितों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया मात्र है।

बातों ही बातों में उन्होंने बताना शुरू किया कि सन 2000 में तत्कालीन भोपालगढ़ प्रधान कमसाजी मेघवाल की गांव में मीटिंग थी ,प्रधानजी का स्वागत करना था परंतु समाज में व्याप्त ऊंच-नीच के चलते गांव के तत्कालीन सरपंच प्रकाश चंद्र लोढ़ा और उनके संगी-साथी राजपूत सिरदार धर्म संकट में थे कि,दलित प्रधान का स्वागत करें,तो कौन करें अथवा किसके द्वारा करवाएं….? आखिर स्वागत करने के लिए दलित बस्ती से किसी दलित महिला को बुलाकर लाने का निश्चय किया गया।

स्वागत के इंतजार में प्रधान कमसाजी मेघवाल भी इस वाहियात कवायद को देख रही थी। ऐसी विषम परिस्थिति में मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने कहा कि,स्वागत के लिए इतनी भागदौड़ क्यों की जा रही है…? प्रधान जी का स्वागत मेरी पत्नी श्यामा कंवरी से करवा लो,वह कर देगी।

उन दिनों छुआछूत भी अपेक्षाकृत अधिक थी। मेरी बात सुनकर वहां बैठे सभी लोग भी आपकी तरह अचरज में पड़ गए।मैंने कहा आप निसंकोच उनको माला दे दें,वह पहना देगी।उस दिन गांव की भरी सभा में श्यामा कंवरी ने माल्यार्पण द्वारा प्रधान जी का स्वागत किया।

यह सुनकर चर्चा को आगे बढ़ाते हुए मैंने कहा कि कमाल है,सामाजिक व्यवस्था के चलते ब्राह्मण के घर की चाय पीने के बाद मैं मेरे झूंठे बर्तन के संबंध में संकोच कर रहा था कि कहीं अपने हाथ से इसे साफ़ किए बिना यहां रख दिया तो…?

इस पर वह फिर बोल पड़े कि,कल की ही बात है। मेरे गांव का एक मेघवाल नवयुवक,जो शिक्षक भी है,इसी कुर्सी पर बैठा था,जिस पर आप बैठे हैं तथा पड़ोस की कुर्सी पर एक पुरी जी बैठे थे। चाय पीने के बाद मेघवाल शिक्षक ने उठ कर अपनी गिलास उस वाशबेसिन में धो कर यहां रख दी।पुरी जी पहले से आए हुए थे परंतु जब तक अध्यापक जी नहीं निकले,तब तक यह कहने के लिए जमे रहे कि *ये लोग आपके घर में इस प्रकार आकर कुर्सी पर बैठ जाते हैं,आप इनको कुछ कहते ही नहीं…?*

मैंने कहा,ये कुर्सियां आने वाले मेहमानों के लिए ही रखी हुई है।

मैंने उनसे पूछा कि गांव में ब्राह्मणों के और भी परिवार होंगे,वे लोग आप पर दबाव नहीं बनाते क्या…?

उन्होंने कहा कि मेरे भाई बंधुओं के 8-10 परिवार है,परंतु न मालूम क्यों वे लोग कभी मुझे ऐसा कुछ भी नहीं कहते हैं।

वैसे रूपा राम गांव में अपनी पुश्तैनी जजमानी का काम भी करते हैं। परंतु वे अपने आप को जन्मजात श्रेष्ठ समझने की बीमारी से मुक्त है। जबकि प्रायः समस्त भारतीय (जिनमें दलित और पिछड़े वर्गों के लोग भी सम्मिलित हैं) अपने आपको जन्मजात श्रेष्ठ समझने की बीमारी से ग्रसित हैं।

मारवाड़ के इस ग्रामीण क्षेत्र में व्याप्त ऊंच नीच और छुआछूत के मद्देनजर मनुस्मृति के सबसे उच्च वर्ण तथा निम्न वर्ण की महिलाओं को किसी ग्रामीण ब्राह्मण के घर में एक साथ बैठकर घर के ही बर्तनों में चाय पीते देख कर मुझे सुकून मिला कि,आने वाले 20-30 वर्षों में जाति व्यवस्था ही समाप्त हो जाएगी।

रूपाराम के घर की ये तस्वीरें ग्रामीण परिस्थितियों के जानकार हर किसी व्यक्ति को आश्चर्यचकित करती है।

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